Thursday, 26 May 2011

विश्वास .........

विश्वास 
जब कभी  टूटने लगती है 
विश्वास की डोर 
और भ्रमित मन 
बेलगाम भागने लगता है 
उलझती सी जाती है  अनगढ़ आस्था 
गर्वोंन्मत्त  मस्तिष्क
तर्क वितर्क वांचने लगता है
डगमगाने सी लग जाती है 
अटूट भक्ति जब 
दुस्साहस भर मन प्रश्न उठाता
उस अदृश्य शक्ति पर 
तब 
उस अज्ञान तिमिर में 
कौंध जाते बन ज्ञान रश्मि तुम
और अंतहीन भटकाव को दे जाते
आस्था का सहारा तुम
हौले से सहला अपने अमृत स्पर्श से
श्रद्धा को दे जाते नवजीवन
हर पल हर कण में तुम उपस्थिति   को अपनी
तुम आभासित कर जाते हो
विश्वास के टूटते छोर
और कस जाते हो
    हाँ ................. मैं हूँ 
                          यह विश्वास दिलाते हो !!!

Wednesday, 25 May 2011

.संशय


जब हमारी कल्पना शक्ति संकल्प शक्ति में परिणत   हो  जाती है, तो मन कल्पवृक्ष बन इच्छित फल देने लगता है और  जब तक मन में संशय रहता है तब तक हम संकल्प नहीं ले पाते........... इन्हीं भावों को कविता के रूप में प्रस्तुत करने का एक प्रयास ...............संशय
जीवन के वृक्ष से लिपटी 
संशय कि बेल
साथ लिए दुविधा के फल
बांध  देती है कितने ही
जीवन के अनमोल सरस पल
और आशंका की जकड़ में  
घुटता रह जाता है ........... व्याकुल मन 
भविष्य की चिंता में
फिसल जाते हैं हाथ से                                      
वर्तमान के कितने ही
मधुर- मधुर, मदिर क्षण 
आशंका के काले घन
छिपा लेते है घनी ओट में 
आशा की क्षीण रुपहली किरण 
संशय को तोड़
आशंका को छोड़
जो तोड़ पाते हैं ये बंधन 
उनके लिए ही फैला है ............उन्मुक्त गगन का............ विस्तृत आँगन . 

Sunday, 22 May 2011

मन की आह

मन की आह, जब राह नहीं पाती
भटकती सी फिरती है
चौराहे पर खड़ी
दिग्भ्रमित सी
चहुँ ओर तकती है राह
हर दिशा है अन्जानी
हर गली है बेगानी सी
गैरों से पूछती है पता कभी
गलियारों में घूमती बेवज़ह कभी
और कभी
मील के पत्थर पर बैठ कभी
राहगीरों के पदचिह्न गिनती है
कोई तो राह होगी
जो मंज़िल तक ले जायेगी
और चैन पा जाएगी
ये मन की आह..............

Saturday, 21 May 2011

नव सृजन


हे प्रभु 
सृजन का दो वरदान 
युग युग के गहन तिमिर को तोड़ 
हो आलोकित मेरे प्राण 
वाणी में शक्ति 
अर्थ में मुक्ति 
भावों में गहन सागर अपार 
प्रभु , सृजन का दो वरदान 

कल्पना को मेरी पंख  प्रदान कर 
दो अनंत विस्तृत उड़ान
शब्दों  के कल्प तरु से 
मैं पाऊं इच्छित वरदान
प्रभु , सृजन का दो वरदान

निश्छल भावों की मणियों से
भर दो आज ये झोली खाली
लौटे फिर वही भोला बचपन
फिर अधरों पर मृदुल  मुस्कान
प्रभु , सृजन का दो वरदान 

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