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Saturday, 30 September 2017

प्राण वायु

प्राण वायु आदर्श की, होती दिन-दिन क्षीण|
मानवता का दम घुटा, बढ़ा स्वार्थ संकीर्ण||
बढ़ा स्वार्थ संकीर्ण, हो किस पर क्या विश्वास|
देते थे जो प्राण, छीनते आज वे श्वास||
नैतिकता औ मूल्य, घायल बिंध लालच बाण|
प्राण-वायु हर गई, अबोध शिशुओं के प्राण ||

Thursday, 28 September 2017

माया

माया को ठगिनी बता, कहते तुम दो छोड़|
मुख दौलत नदी का निज, ओर रखा है मोड़||
ओर रखा है मोड़, साधु बन कर हैं फिरते|
रहे धरम की आड़, दुष्करम सारे करते||
कितनों को ठग लिया, मोक्ष दिखला भरमाया|
काम, क्रोध, धन लोभ, न छूटी इनसे माया||

Saturday, 2 April 2016

फागुन के रंगों में रंगी दो कुण्डलियाँ

फागुन के रंगों में रंगी दो कुण्डलियाँ
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वियोग का रंग
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धरती फागुन में सजी, जोगन जी संताप।
विरहा अगनी तन जले, उड़े बूँद बन भाप।।
उड़े बूँद बन भाप, सखी की हँसी ठिठोली।
करे जिया पर चोट, धँसे जी में बन गोली।।
साजन-सजनी संग, आँख विरहन की भरती।
पड़ती रंग फुहार, रहूँ मैं धीरज धरती ।।
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संयोग का रंग
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बनठन कैसी सज गई, खिला धरा सुरचाप।
रंग फुहारें तन पड़ीं, मिटा हिया का ताप ।।
मिटा हिया का ताप, कि खेली उन संग होली।
भीज गए सब अंग, खिला मन बन रंगोली।।
मन ही मन में राग, दिखाए झूठी अनबन ।
पिया मिले जब संग, फाग मैं खेलूँ बनठन ।।
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शालिनी रस्तौगी

Sunday, 11 October 2015

सोलह सिंगार ( कुण्डलिया)


कजरा गजरा डाल कर, कर सोलह सिंगार।

गोरी बैठी सेज पर, करने को अभिसार।।


करने को अभिसार, राह पर पलक बिछाए।


पल-पल बीते पहर, बिना पलकें झपकाए।।


किस सौतन का आज, बना जादूगर गजरा।


तडपत बीती रैन, बहा नयनन से कजरा।|

कजरा नैनन से बहा ( कुण्डलिया)

कजरा नैनन से बहा, कारे पड़े कपोल।

निर्मोही पर प्रीत का, जान न पाया मोल।।

जान न पाया मोल, रहा परदेसी होकर।

गये विरह में वर्ष, रोय निज चैना खोकर||

देखी अंसुवन धार, बरसना भूले बदरा।

पिया बसे जब नैन, कहाँ ठहरेगा कजरा ||

निज भाषा ( कुण्डलियाँ)

बरसों हैं बीते मगर,मिला न वह सम्मान।
निज भाषा निज भूमि पर, झेल रही अपमान।।
झेल रही अपमान, बढ़े दिन-दिन अंग्रेजी।
भेज दिए अंग्रेज, न अब तक भाषा भेजी।।
अब तक आशा शेष, गये दिन कल, कल, परसों।
पर भाषा का राज, सहे मन कितने बरसों।।

मोहन रूप ( कुण्डलिया)


अपनी छवि बना कर जो, दर्पण देखा आज|
देख रूप अपना खुद ही, गोरी करती नाज||
गोरी करती नाज, चली इठला कर रानी|
साजन से मनुहार, कराऊंगी मनमानी||
अपनी छवि को भूल, सजन को ताके सजनी|
मोहन रूप निहार, सखी सुधि खोई अपनी ||

सजना चतुर सुजान ( कुण्डलिया)


बात करे हर ले जिया, बन भोला अनजान |
कौन कहे उनकी सखी, सजना चतुर सुजान ||
सजना चतुर सुजान, करे पल-पल मनमानी|
नैन मिला ठग जाय, ठगी रह जाय सयानी ||
पल में हिय बिध जात, अचूक है उसकी घात|
मीठा-सा हो दर्द, याद कर पिया की बात ||

Monday, 30 June 2014

अक्ल


अक्ल बिना बंधु देखो , सरै न एकौ काम |
सब जीवों में श्रेष्ठतम , मानव तेरा नाम||
मानव तेरा नाम, है यह विवेक सिखाती |
ऊँच-नीच की बात, मानवों को समझाती ||
इक जैसा हर जीव , बस जुदा-जुदा है शक्ल |
नर वानर में भेद, बताती है सिर्फ अक्ल ||

चिंतन


चिंतन की मथनी करे, मन का मंथन नित्य |
सार-सार तरै ऊपर , छूटे निकृष्ट कृत्य ||
छूटे निकृष्ट कृत्य , विचार में शुद्धि आए |
उज्ज्वल होय चरित्र, उत्तम व्यवहार बनाए||
मिले सटीक उपाय, समस्या  का हो भंजन |
चिंता भी हो  दूर , करें जब मन में चितन ||

Friday, 27 June 2014

मृगतृष्णा ( कुण्डलिया )

तृष्णा मृग की ज्यों उसे, सहरा में भटकाय |

तप्त रेत में भी उसे, जल का बिम्ब दिखाय ||


जल का बिम्ब दिखाय, बुझे पर प्यास न उसकी|


त्यों माया से होय , बुद्धि कुंठित मानव की ||


प्रज्ञा का पट खोल, नाम ले राधे - कृष्णा |


सुमिरन करते साथ, मिटेगी हरेक तृष्णा ||

Saturday, 28 September 2013

सावन संग होड़ (कुण्डलिया)

कुण्डलिया 
सावन संग आज लगी, सखी नैन की होड़|
मान हार कौन अपनी, देत बरसना छोड़||
देत बरसना छोड़, नैन परनार बहे हैं |
कंचुकि पट भी भीज , विरह की गाथ कहे हैं ||
पड़े विरह की धूप, जले है विरहन का मन|
हिय से उठे उसाँस, बरसे नैन से सावन ||

Sunday, 15 September 2013

राजनीति ( कुण्डलिया छंद)



राजनीति में चल रहा, लाशों का है खेल |
धूर्त मिले हैं धूर्त से, गिद्धों का है मेल ||
गिद्धों का है मेल,  धर्म की आँच जलाएँ|
पाने सत्ता का लाभ, देश को हैं सुलगाएँ||
लालच का तूफान, फैली हर ओर अनीति |
लोभियों  की जमात, बनी है ये राजनीति ||

Wednesday, 11 September 2013

नारी ( कुण्डलिया छंद)


नारी धुरी समाज की, जीवन का आधार|
बिन नारी जीवन नाव, डूबे रे मंझधार ||
डूबे रे मंझधार, यह गुरु प्रथम बालक की |
संस्कार की दात्री, पोषक है आदर्श की ||
नारी का अपमान, पुरुष की गलती भारी|
मानवता का बीज, सींचे कोख में नारी ||

Sunday, 17 March 2013

मनमीत (कुण्डलिया)



मनमीत से मत करियो, सखी कभी भी प्रीत|

रीता मन हो जाएगा, ऐसी है  ये  रीत  ||

ऐसी है ये रीत , हिया हर पल तडपाए |

लाख जतन करै पर , मन कहीं चैना  न पाए||

रस के हैं लोभी , उड़ जाएँ  रस के रीत|

सुन सखी भ्रमर से , होते सारे मनमीत || .

Monday, 11 March 2013

चितवन



चितवन से हर ले जिया, चितवत करै शिकार |
गोरी तेरे दो नैन,   ब्याध  बड़े  हुशियार ||
ब्याध बड़े हुशियार, जाल ये अपने कसते |
मृगनयनी को देख  , आखेट व्याघ्र का करते   ||
काम कमान सो वक्र ,  रूप-माया का उपवन |
साजन हिया  डोलत, देख   तेरी ये चितवन ||

( अब भी मात्राओं की गड़बड़ है ...)

Saturday, 9 March 2013

कुंडलिया



हिय को हारे से भला, जीवन जइयो हार |

हिय के हारे न चले, जीवन का व्यापार||

जीवन का व्यापार, रात-दिन घाटा - घाटा|

जगत-सोवत तडपे, वैद्य भी जान न पाता||

हिया  दिए न चैना, फिरोगे मारे-मारे|

निर्मोही को कदर नहीं, हम क्यों हिय को हारें || 

(छंद ज्ञान रखने वाले मित्रों से क्षमा चाहूंगी यदि कोई गलती रह गई हो तो कृपया माफ करें) 

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