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Friday, 25 September 2020

शाम से आँख में नमी-सी है : गुलज़ार

 शाम से आँख में नमी-सी है,

आज फ़िर आपकी कमी-सी है
दफ़न कर दो हमें कि साँस मिले,
नब्ज़ कुछ देर से थमी-सी है
वक्त रहता नहीं कहीं छुपकर,
इसकी आदत भी आदमी-सी है
कोई रिश्ता नहीं रहा फ़िर भी
एक तस्लीम लाज़मी-सी है।

सर्दियों की ठंडी रातों में पश्मीने की नर्म गर्माहट से भरे लफ़्ज़ों को नज्मों में पिरोने वाले हरदिल अज़ीज़ शायर गुलज़ार, चौका देने वाली उपमाओं से श्रोताओं को चमत्कृत करते , आसान पर सीधे दिल में उतर जाने वाली शायरी जो किसी को भी अपना मुरीद बना ले ऐसे फनकार गुलज़ार साहब का आज जन्मदिन है।

कोई शख्स शायद ही ऐसा होगा जो गुलज़ार की शायरी का दीवाना न हो| लाखों के महबूब शायर हरदिल अजीज़ गीतकार गुलज़ार को आज उनके जन्मदिन पर ढेरों बधाइयाँ और शुभकामनाएँ। आज ही के दिन अर्थात् 18 अगस्त 1936 को दीना, जिला झेलम (अब पाकिस्तान) में जन्मे सम्पूर्ण सिंह कालरा उर्फ़ गुलज़ार का बचपन दीना की गलियों में गुज़रा..। हिन्दुस्तान के विभाजन का ज़ख्म अपने सीने पर लिए गुलज़ार का परिवार अमृतसर आकर बस गया परन्तु गुलज़ार का अधिकतर समय दिल्ली में बिता। मुफलिसी के उस दौर में कभी पेट्रोल पम्प पर तो कभी गैराज में काम करने वाले गुलज़ार की
किस्मत में तो सबके दिलों पर राज करना लिखा था। जहाँ हाथ गाड़ियों के नट-बोल्ट कस रहे होते वहीं दिल-दिमाग शब्दों में उलझे नए नए शेर गढ़ रहे होते। कुछ समय बाद तो किस्मत उन्हें मुम्बई खींच लाई।
गुलज़ार प्रोग्रेसिव राइटर एसोसिएशन से भी जुड़ गए थे। यहीं काम करते हुए उनकी मुलाक़ात कई शायरों, नाटककारों और साहित्यकारों से हुई। इनमें से ही किसी ने गुलज़ार के पसंदीदा गीतकार शैलेन्द्र तक उन्हें पहुँचा दिया। इसी तरह उनकी मुलाक़ात संगीतकार एसडी बर्मन से भी हुई। बर्मन दा उस समय ‘बंदिनी’ फिल्म के लिए काम
कर रहे थे। शैलेन्द्र की सिफारिश पर गुलज़ार को एक गीत दे दिया गया। महताब की रौशनी की तरह उनकी प्रतिभा ने खुद ही अपना परिचय दे दिया और जीवन का पहला गीत मोरा गोरा अंग लई ले, मोहे श्याम रंग दई दे/ छुप जाऊंगी रात ही में, मोहे पी का संग दई दे.. मिला । साल था 1963 का। ख़ास बात यह थी कि गुलज़ार के सबसे पहले गीत को ही स्वर साम्राज्ञी लता मंगेशकर की आवाज़ मिली। फिर इसके बाद उन्हें
कभी पीछे मुड़कर देखने की ज़रूरत नहीं पड़ी। प्रसिद्ध गीतकार, कवि, पटकथा लेखक, फ़िल्म निर्देशक तथा नाटककार न जाने कितनी ही भूमिकाओं में एक से एक नायब शाहकार रचते हुए गुलज़ार शोहरत के उस मुक़ाम तक जा पहुँचे हैं कि उनकी तारीफ़ आफ़ताब को दिए दिखाने बराबर है।

मई 15, 1973 को अभिनेत्री राखी-गुलज़ार ने साथ जीने-मरने की कसमें खाईं, लेकिन 3 साल में ही कसमों की ये डोर टूट गई और दोनों अलग हो गए। इस बीच एक बेटी मेघना उनकी ज़िन्दगी में आई। प्यार से गुलज़ार ने उसे बोस्की नाम दिया। बरसों से अलग-अलग रह रहे पति-पत्नी, राखी-गुलज़ार के बीच फ़िलवक़्त बोस्की ही एक कड़ी है। गुलज़ार अपने एकाकीपन को ख़ामोशी से जीने के साथ-साथ इस एहसास को लफ़्ज़ों का पैरहन ओढ़ाकर नए-नए शाहकार रच रहे हैं।

ऐ ज़िन्दगी गले लगा ले
हमने भी , तेरे हरेक रंग को
गले से लगाया है …है ना… पर ज़माने रंगों को अपनी ज़िन्दगी से विदा कर सफ़ेद पैरहन को जिस्म पर सजाए गुलज़ार मानो शायरी का ताजमहल बन गए हैं।

इमरोज़ और साहिर से परे अमृता

 

इमरोज़ और साहिर से परे अमृता



आज से 100 साल पहले ऊपरवाले ने  इसी दिन जब अमृता के रूप एक नज़्म को जमीन पर उतारा तो मानो अदब की ज़मीन की कोख़ में एक ऐसा बीज बोया जिसकी फ़सल से आज भी अदब की ज़मीन सरसब्ज़ है|

आज अमृता को उनके जन्मदिन पर याद करते हुए इमरोज़ और साहिर से परे अमृता की शख्सियत के कुछ पहलुओं को देखने की कोशिश करते हैं| साहिर के लिए अमृता और अमृता के लिए इमरोज़ का इश्क़ जगजाहिर है| इश्क़ की इस कशिश ने बिलाशुबह अमृता के लफ़्ज़ों में जो दर्द और तड़प पैदा की उसे दरकिनार नहीं किया जा सकता| पर अमृता केवल साहिर के बुझाई गई अधजली सिगरटों को उँगलियों में लेकर साहिर की छुअन को ही महसूस नहीं करती वह अनचाहे रिश्तों में बंधी नारी-मन के भीतर सुलगती आग को अपनी आवाज़ देती है|   उनकी उंगलियाँ केवल इमरोज़ की पीठ पर साहिर का नाम ही नहीं उकेरतीं बल्कि एक औरत के शरीर पर अनचाही छुअन से उसके मन में उपजे लिजलिजे अहसास को भी उसी शिद्दत के साथ उकेरती हैं|  अमृता की आवाज़ केवल इश्क़ की ही आवाज़ नहीं, उनकी आवाज़ स्त्री-पुरुष संबंधों को लेकर नारी मन के विचारों को एक नए फ़लक पर प्रस्तुत करती है|

विभाजन  के दंश को झेलने वाली अमृता ने उन हज़ारों लाखों औरतों बच्चियों की तकलीफों को मानों अपने दिल के लहू से कागज़ पर उतरा है| वे औरतें जिनका बलात्कार हुआ, जिनके बच्चों को उनकी आँखों के आगे क़त्ल कर दिया गया| तब लाहौर से भारत आते हुए एक कागज़ के पुरज़े पर उस दर्द को लिखते हुए अमृता “'अज्ज आखां वारिस शाह नूँ' हीर की पीड़ा को लिखने वाले वारिस शाह से पूछती हैं आज जब इतनी हीरें रो रही हैं तो तुम अपनी कब्र से उठ कर कुछ क्यों नहीं कहते” अमृता की यह कविता आज भी वारिस शाह की मज़ार पर गाई जाती है|

चाहे पिंजर की पूरो की पीड़ा हो जिसे विभाजन के दौरान हुए दंगों में अगवा करके उससे निकाह कर लिया जाता है| पूरो को जबरदस्ती की शादी से हुए गर्भ को अनचाहे ही ढोना पड़ता है| पूरो जब अपनी ही जैसी एक लड़की को उसके अपनों तक पहुँचा देती है तब उसे लगता है कि मानो उसका जीवन सफल हुआ| चाहे प्यार के लिए किसी शर्त को बंधन मानने वाली कादंबरी, जो बिना शर्त प्यार करती है पर  प्यार के लिए शर्त रखने वाले से खुद किनारा करने की हिम्मत भी रखती है| अमृता के उपन्यास ‘धरती, सागर ते सीपियाँ’ की इस किरदार को ‘कादंबरी’ नाम से सत्तर के दशक में बनी फिल्म में शबाना आज़मी ने बखूबी निभाया|

“दुखांत यह नहीं होता कि ज़िंदगी की लंबी डगर पर समाज के बंधन अपने कांटे बिखेरते रहें और आपके पैरों से सारी उम्र लहू बहता रहे .......दुखांत यह होता है कि आप लहू-लुहान पैरों से एक उस जगह पर खड़े हो जाएं, जिसके आगे कोई रास्ता आपको बुलावा न दे|” – अमृता के ये शब्द उनके उदासियों से भरे जीवन में भी उनकी जिजीविषा और हिम्मत के परिचायक हैं| छोटी से उम्र में माँ की मौत, एक असफल शादी, साहिर से असफल प्रेम सम्बन्ध और फिर इमरोज़ के इश्क़ का पड़ाव .... जीवन के  अनेक अँधेरे-उजले गलियारों से गुज़रते हुए अमृता हारी नहीं|

घर की चारदीवारी में खुद को कैद किए औरतों के लिए अपने ख्वाब, निराश वृद्धों के लिए अपने ठहाके, सीमा पर शहीद हुए सैनिक की बेवा के लिए अपने रंग, शायरों के लिए अपने आँसू, बेटी को पढने के लिए जिस्म बेचने वाली वेश्या के लिए अपना मान, और युवाओं को अपना आक्रोश -  ऐसी वसीयत सिर्फ अमृता ही कर सकती हैं –

अपने पूरे होश-ओ-हवास में
लिख रही हूँ आज
मैं वसीयत अपनी

मेरे मरने के बाद
खंगालना मेरा कमरा
टटोलना, हर एक चीज़
घर भर में, बिन ताले के
मेरा सामान.. बिखरा पड़ा है

दे देना... मेरे खवाब
उन तमाम.. स्त्रियों को
जो किचेन से बेडरूम
तक सिमट गयी.. अपनी दुनिया में
गुम गयी हैं
वे भूल चुकी हैं सालों पहले
खवाब देखना !

बाँट देना.. मेरे ठहाके
वृद्धाश्रम के.. उन बूढों में
जिनके बच्चे
अमरीका के जगमगाते शहरों में
लापता हो गए हैं !

टेबल पर.. मेरे देखना
कुछ रंग पड़े होंगे
इस रंग से ..रंग देना उस बेवा की साड़ी
जिसके आदमी के खून से
बोर्डर रंगा हुआ है
तिरंगे में लिपटकर
वो कल शाम सो गया है !

आंसू मेरे दे देना
तमाम शायरों को
हर बूँद से
होगी ग़ज़ल पैदा
मेरा वादा है !

मेरा मान , मेरी आबरु
उस वैश्या के नाम है
बेचती है जिस्म जो
बेटी को पढ़ाने के लिए

इस देश के एक-एक युवक को
पकड़ के
लगा देना इंजेक्शन
मेरे आक्रोश का
पड़ेगी इसकी ज़रुरत
.
क्रांति के दिन उन्हें !

दीवानगी मेरी
हिस्से में है
उस सूफी के
निकला है जो
सब छोड़कर
खुदा की तलाश में !

बस !
बाक़ी बची
मेरी ईर्ष्या
मेरा लालच
मेरा क्रोध
मेरा झूठ
मेरा स्वार्थ
तो
ऐसा करना
उन्हें मेरे संग ही जला देना...!!!

 

जनाक्रोश की जलती मशाल – दुष्यंत

 

जनाक्रोश की जलती मशाल – दुष्यंत

गूँगे निकल पड़े हैं, ज़ुबाँ की तलाश में

सरकार के ख़िलाफ़ ये साज़िश तो देखिये|

जिसने अपनी कलम को तलवार बनाकर उसे तानाशाही, सामाजिक विसंगतियों और विद्रूपताओं से जलते अपने दिल के लहू में डुबोकर लोगों के भीतर दबी आग को हवा दी, वह कवि जिसकी आवाज़ सैकड़ों हजारों आन्दोलनों की आवाज़ बनी, वह जिसकी गज़लें समय सीमा के चक्र को तोड़ कालजयी हो गईं ... आज हम हिंदी साहित्य के हस्ताक्षर उस महान कवि, कथाकार, गज़लकार को अपनी श्रद्धांजलि देते हैं जिनका नाम हमेशा स्वर्णाक्षरों में अंकित रहेगा – कवि दुष्यंत|

सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं,

मेरा मकसद है की ये सूरत बदलनी चाहिए|

जिनकी कलम का उद्देश्य ही देश और समाज का सूरत-ए-हाल बदल उसे बेहतरी की तरफ ले जाना था ऐसे थे  दुष्यंत कुमार त्यागी अर्थात् कवि दुष्यंत| हिंदी ग़ज़ल को महबूबा की जुल्फों के जाल से निकाल कर सामजिक अन्याय के विरुद्ध आक्रोश की आवाज़ बना देने वाले कवि दुष्यंत की आज यानि 1 सितम्बर को जन्म-जयंती है| कवि की पुस्तकों में जन्मतिथि 1 सितंबर 1933 लिखी है, किन्तु दुष्यन्त साहित्य के मर्मज्ञ विजय बहादुर सिंह के अनुसार कवि की वास्तविक जन्मतिथि 27 सितंबर 1931 है। कवि की पुस्तकों में जन्मतिथि 1 सितंबर 1933 लिखी है, किन्तु दुष्यन्त साहित्य के मर्मज्ञ विजय बहादुर सिंह के अनुसार कवि की वास्तविक जन्मतिथि 27 सितंबर 1931 है। फिलहाल हम कवि दुष्यंत द्वारा दी गई जन्मतिथि को सही मानते हुए आज के दिन कलम के इस सच्चे सिपाही को अपने भाव सुमन अर्पित करते हैं|

कल नुमाइश में मिला वो चीथड़े पहने हुए

मैंने पूछा नाम तो बोला कि हिन्दुस्तान है|

"दुष्यंत की नज़र उनके युग की नई पीढ़ी के ग़ुस्से और नाराज़गी से सजी बनी है। यह ग़ुस्सा और नाराज़गी उस अन्याय और राजनीति के कुकर्मो के ख़िलाफ़ नए तेवरों की आवाज़ थी, जो समाज में मध्यवर्गीय झूठेपन की जगह पिछड़े वर्ग की मेहनत और दया की नुमानंदगी करती है। " – निदा फ़ाज़ली का यह कथन दुष्यंत की रचनाओं के कथ्य की पृष्ठभूमि की स्पष्ट करती है|

मत कहो, आकाश में कुहरा घना है,
यह किसी की व्यक्तिगत आलोचना है|


इस सड़क पर इस क़दर कीचड़ बिछी है,
हर किसी का पाँव घुटनों तक सना है |

 

पक्ष औ' प्रतिपक्ष संसद में मुखर हैं,
बात इतनी है कि कोई पुल बना है


रक्त वर्षों से नसों में खौलता है,
आप कहते हैं क्षणिक उत्तेजना है ।

नसों में खौलते लहू को कलम से उगलने वाले  दुष्यंत की ग़ज़लों के अश’आर कहीं मुहावरे और कहावतें बन कर लोगों की जुबां पर सजे तो कहीं आन्दोलनों में जन-आक्रोश के पैरोकार बने| युवाओं की आवाज़ बन कहीं मंच पर सजे तो कहीं नुक्कड़ नाटकों में जन-चेतना की आवाज़ बने|

आपात काल के दौरान सरकारी नौकरी में रहते हुए हुए भी सरकारी तानाशाही के खिलाफ लिखने का परिणाम उन्हें भुगतना पड़ा और वे सरकारी कोप के भाजन बने|

इस नदी की धार में ठंडी हवा आती तो है,
नाव जर्जर ही सही, लहरों से टकराती तो है।

पर अपनी जर्जर नाव के सहारे ही वे तूफानों से टकराते रहे| ग़ज़लों-संग्रह ‘साए में धूप’ उनके जीवन (जन्म-1933, मृत्यु-1975) की आख़िरी पुस्तक है| ज़िन्दगी की हर लड़ाई, आक्रोश, सामाजिक चेतना, पीड़ा से परिपक्व ग़ज़लों से सजी यह पुस्तक हर ग़ज़ल प्रेमी को अवश्य पढ़नी चाहिए| 

 

यहाँ दरख्तों के साये में धूप लगती है,

चलो यहाँ से चलें और उम्र भर के लिए।

और वास्तव में मात्र 44 वर्ष की आयु में  30 दिसंबर 1975 की रात्रि में क्रांति की मशाल का यह प्रणेता इस दुनिया को अलविदा कह गया परन्तु उसके शब्दों की मशाल आज भी जल रही है और करोड़ो युवाओं के रक्त में चेतना की ज्वाला बन जल रही है|

मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही
हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए

राधाष्टमी

 


श्री राधा जी के नाम के बिना कान्हा का नाम अधूरा है | श्री कृष्ण के नाम को सम्पूर्ण करती इस सृष्टि में प्रेम का संचार करने के लिए बरसाने में प्रकटी श्री राधे का जन्म दिन आज यानि भाद्रपद के शुक्ल पक्ष की अष्टमी को मनाया जा रहा है|

सोलह कला सम्पूर्ण श्री कृष्ण भी जिन राधिका जी के रूठने पर व्याकुल हो उन्हें मनाने का हर यत्न करते हैं | कभी हाथ जोड़ तो कभी मृदु वचन कहकर राधा जी को मनाने में असफल होकर तीन लोकों का ताप हरने वाले श्री कृष्ण अपनी बात कहने के लिए कभी कदम्ब के पुष्प तो कभी गौसुत को अपना हरकारा बना राधा जी के पास भेजते हैं| राधा जी के नाम मात्र से ही मुदित हो जाने वाले मुरारी अपनी प्राण-वल्लभा श्री राधे के बिन स्वयं को अपूर्ण मानते हैं -
मानत ना वृषभानुसुता कर जोरि मना उन माधव हारे|
पाँव गहे, मृदु बैन कहें किसना अपनाय अनेक सहारे|
पुष्प कदम्ब चिरौरि करै अरु गोसुत कातर नैन निहारे|
ताप तिलोक हरें हरि जो निज खातिर ढूँढ रहे हरकारे||
अंततः जब राधा जी को मनाने का अन्य कोई उपाय न दिखा तो सारे विश्व को अपने एक इशारे से संचालित करने वाले श्री कृष्ण स्वयं राधा जी का रूप धारण कर उन्हें रिझाते हैं-
धरा आज कान्ह जी ने, राधा जी का रूप।
राधा कान्हा हैं बनी, लीला अजब अनूप।।
लीला अजब अनूप, घाघरा कंचुकि धारी।
बंसी धर अधरान, बनी राधा बनवारी।।
लीलाधर ने अद्भुत, कैसा ये स्वांग भरा।
हरषाए सब देव, मुस्काय हो मुदित धरा।।
वस्तुतः राधा-कृष्ण दो अलग स्वरूप नहीं वरन एक ही हैं
वहीं वृषभानुसुता मोहन-प्यारी श्री राधे का नाम लेने मात्र से ही मनुष्य के समस्त काज साध जाते हैं| मोहन से एकरूप होने के लिए श्री राधा कृष्ण का रूप धर कृष्णमय हो जाती हैं| गौर वर्ण पर पीताम्बर धर, हाथ मुरली और माथे मोर पंख धर मोहन की मोहक छवि में राधा की सुन्दर छवि के सम्मुख पूनम का चाँद भी आधा नज़र आता है -
रूप गहा जब माधव का पट पीत धरा तन नागरि राधा|
वेणु गही कर, श्याम छवी धर मोहक पाश बिछाकर बाँधा|
श्याम सलौनि छवी निरखी जब पूनम चाँद लगे अब आधा|
मोहन प्यारि, कृपा जिन पाकर, कौन सा काज नहीं कब साधा||
राधा का जन्म कृष्ण के साथ सृष्टि में प्रेम भाव मजबूत करने के लिए हुआ था. कुछ लोग मानते हैं कि राधा एक भाव है, जो कृष्ण के मार्ग पर चलने से प्राप्त होता है. वैष्णव तंत्र में राधा और कृष्ण का मिलन ही व्यक्ति का अंतिम उद्देश्य माना जाता है|
राधा- कृष्ण का प्रेम तो त्याग-तपस्या की पराकाष्ठा है। अगर 'प्रेम' शब्द का कोई समानार्थी है तो वो राधा-कृष्ण है। प्रेम शब्द की व्याख्या राधा-कृष्ण से शुरू होकर उसी पर समाप्त हो जाती है। राधा-कृष्ण की प्रीति से समाज में प्रेम की नई व्याख्या, एक नवीन कोमलता का आविर्भाव हुआ। समाज ने वो भाव पाया, जो गृहस्थी के भार से कभी भी बासा नहीं होता। राधा-कृष्ण के प्रेम में कभी भी शरीर बीच में नहीं था। जब प्रेम देह से परे होता है तो उत्कृष्ट बन जाता है और प्रेम में देह शामिल होती है तो निकृष्ट बन जाता है।
'राधामकृष्णस्वरूपम वै, कृष्णम राधास्वरुपिनम;
राधाष्टमी पर जो भी सच्चे मन और श्रद्धा से राधा की आराधना करता है, उसे जीवन में सभी सुख-साधनों की प्राप्ति होती है

कैंसर से जंग : विश्व गुलाब दिवस

 ताकि

ज़िन्दगी हार न जाए ...
बहुत कठिन है डगर
बहुत कष्टकर है ज़िन्दगी ..
हर रोज़ लड़ते हैं वे दर्द से
हर रोज़ गुज़रते निराशा के पथ से ..
आओं उनकी लडाई को कुछ आसान बनाएँ..
एक गुलाब देकर उन्हें ..
कुछ आशा- विश्वास दिलाएँ ...
निराशा में डूबे हृदय में
थोडा-सा उल्लास जगाएँ....
हाँ, जंग में नहीं हैं वे अकेले
कहकर उनकी ताकत बढ़ाएं ...
ताकि कैंसर से अपनी जंग वे
बिना लड़े ही हार न जाएँ ..

विश्व गुलाब दिवस

नाम सुनकर भ्रमित मत हो जाइये| यह गुलाब दिवस

अवश्य है परंतु इसका वैलेंटाइन डे से कोई सम्बन्ध नहीं है| आज 22 सितम्बर को विश्व गुलाब दिवस के रूप में मनाया जाता है| आज का यह दिन समर्पित है कैंसर की भयानक बीमारी से ग्रसित, ज़िन्दगी और मौत के बीच झूल रहे लोगों का हौंसला बढ़ने के लिए| 

विश्व गुलाब दिवस मनाया जाता है कनाडा की मात्र 12 वर्षीय मेलिंडा रोज की याद में| मेलिंडा जो अस्किन ट्यूमर नामक एक बहुत ही दुर्लभ रक्त कैंसर ग्रसित थीं और जिसको डॉक्टरों ने भी कह दिया था कि वह २ सप्ताह से अधिक नहीं जी पाएगी| परन्तु 12 साल की इस साहसी लड़की ने अपनी जिजीविषा से न केवल डॉक्टर्स की भविष्यवाणी को झूठा साबित कर दिया और करीब 6 माह तक जीबित रही बल्कि वह अपनी हिम्मत से अन्य कैंसर पीड़ितों के मन में आशा व उत्साह का संचार करती रही| वह छोटी-छोटी कविताओ, टिप्पणियों, ई-मेल द्वारा कैंसर रोगियों को जीने की आशा देती थी| कैंसर रोगियों में खुशियों व आशा का संचार करना उसने अपने जीवन का मिशन बना लिया था|  सिंतबर के महीने में इस बच्ची ने सबका साथ छोड़ दिया और इस दुनिया को अलविदा कह दिया। यह बच्ची जिस तरह से 6 महीने तक अपनी बीमारी से लड़ती रहती। यह बात सभी कैंसर से पीड़ित लोगों के एक मिसाल बन गई। इसलिए इस दिन कैंसर से पीड़ित लोगों को गुलाब दिया जाता है और उन्हें जिंदगी से लड़ने की हिम्मत रखने का हौसला देने की कोशिश की जाती है। 

वास्तव में कैंसर जैसी भयंकर बीमारी न केवल शरीर के हौंसले पस्त कर देती है बल्कि दिलो-दिमाग पर भी अपने भय की ऐसी छाप छोड़ देती है की इस बीमारी से पीड़ित रोगी के मन से उत्साह-उमंग और जीने का चाव समाप्त हो जाता है| यह एक ऐसा दिन है जो कैंसर से लड़ रहे लोगों में आशा और प्रसन्नता फैलाने के लिए समर्पित है। जैसा कि अधिकांश कैंसर उपचार शरीर के लिए अत्यंत कष्टकर होते हैं, और साथ ही रोगी पर  गहरा मनोवैज्ञानिक प्रभाव डालते हैं, इसलिए मरीजों को खुश रखना बहुत जरूरी है, विशेषज्ञों का कहना है और इसलिए हर दिन उनके लिए एक 'रोज डे' होना चाहिए। 22 सितंबर को विश्व रोज़ डे के रूप में मनाया जाता है, कैंसर रोगियों के जीवन में खुशी लाने के लिए। यह लोगों में कैंसर के बारे में जागरूकता फैलाने का भी दिन है क्योंकि प्रारंभिक अवस्था में कैंसर का पता लगाने से अनेक प्रकार के कैंसरों का इलाज भी संभव है|

नैराश्य के अन्धकार में डूबे लोगों को गुलाब देकर यह अहसास करवाया जाता है कि जीवन अभी समाप्त नहीं हुआ है| जब तक साँसें चल रही हैं , प्रत्येक साँस को पूरे उत्साह व उमंग से जीना है| कैंसर जिंदगी का अंत नहीं है। कैंसर से लड़ा जा सकता है और लड़कर जीत हासिल भी की जा सकती है। अक्सर लोग कैंसर का नाम सुनते ही हिम्मत खो बैठते हैं। उन्हें लगता है कि अब वह ज्यादा दिनों तक नहीं जी पाएंगे। गुलाब देकर उन्हें यह महसूस कराने की कोशिश की जाती है कि उनकी जिंदगी भी फिर से गुलाब जैसी ही महक और खिल सकती है। 

विश्व रोज़ दिवस पर, यह महत्वपूर्ण है कि हम समय निकालकर कैंसर रोगियों के साथ वक्त बिताएँ। एक गुलाब कोमलता, प्रेम और देखभाल का प्रतीक है। विश्व रोज़ डे पर कैंसर के रोगियों को यह फूल देकर उन्हें यह अहसास करवाएँ कि हम उनकी कितनी देखभाल करते हैं।

मैं हिंदी हूँ

 

मैं हिंदी हूँ

मात्र एक भाषा नहीं, मैं भारत की वाणी हूँ  

दुनिया में तीसरी सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषा से अब सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषा के स्थान को प्राप्त कर चुकी हमारी हिंदी को सर्वाधिक सरल और वैज्ञानिक भाषा का गौरव प्राप्त है| दूसरी  हिंदी ही वह भाषा है  हमारी संस्कृति, सभ्यता और शाश्वत मूल्यों का संरक्षण और पल्लवन किया है| यह भी सही है कि आज विश्व में हिंदी जानने-बोलने वालों की संख्या बढ़ रही है, यहाँ तक कि विश्व में सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषा मंदारिन को टक्कर देते हुए हिंदी उसके समकक्ष ही नहीं बल्कि उसके आगे आ खड़ी हुई है| मैंगलूर के डॉ. जयंतीप्रसाद नौटियाल के शोध में यह बात सामने आई है कि अब हिंदी जानने वालो की संख्या १३०० मिलियन हो गई है| मंदारिन से 200 मिलियन ज्यादा लोग हिंदी बोलते हैं|

 वैश्विक पटल पर आज हिंदी ने अपनी एक ऐसी पहचान  बना ली है कि विश्व की महाशक्ति कहे जाने वाले देशों ने अरबों रुपयों का बजट हिंदी शिक्षण के लिए निर्धारित किया है|  भारत आज विश्व बाज़ार में जिस शक्ति व सामर्थ्य के साथ उभर के आ रहा है, जाहिर है कि बिना हिंदी को जाने यहाँ के बाज़ार में अपनी पैंठ बनाना  असंभव है तो हिंदी को जानना, समझना और बोलना ही होगा|

प्रश्न यह है कि क्या केवल बाज़ारीकरण के या व्यावसायिक रूप से अधकचरी, अंग्रेज़ी के शब्दों के भार से लदी हिंदी का इस्तेमाल करने से वास्तव में हिंदी को कोई लाभ हो रहा है। हिंदी का लचीलापन, अन्य भाषाओं को स्वयं में समाहित करने की हिंदी की विशेषता ने हिंदी को आमजन की भाषा बनाया है, परन्तु इस लचीलेपन का गलत फायदा उठाकर हिंदी को आम बोलचाल की भाषा बनाने के नाम पर हम कहीं उसके स्वरूप को विकृत करते जा रहे हैं। अनेक हिंदी  समाचार पत्र पत्रिकाओं ने तो हिंदी के आसान शब्दों को भी अंग्रेज़ी भाषा के शब्दों से बदलकर हिंदी का मज़ाक बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है| सामाजिक मीडिया पर हिंदी के बढ़ते वर्चस्व को देखकर जहाँ एक ओर प्रसन्नता होती है वहीं दूसरी ओर रचनाओं में अशुद्ध वर्तनी, शाब्दिक तथा वाक्य रचना सम्बन्धी अशुद्धियाँ मन को व्यथित भी करती हैं की हम अपनी ही भाषा को शुद्धता के साथ नहीं लिख पाते|

परन्तु गौरतलब बात यह है कि जहाँ हिंदी के बिना हमारा गुज़ारा नहीं है, वहीं को आज भी अंग्रेजी के आगे इसे दोयम दर्जे पर क्यों खड़ा रहना पड़ रहा है? हमारी मानसिकता आज भी भाषाई गुलामी में जकड़ी क्यों अंग्रेज़ी के आगे सिर झुकाए हुए है|  “मैम, इसे तो हिंदी बिलकुल ही लाइक नहीं है, इवन ही डस नॉट लाइक टू राईट इन हिंदी. व्हाट तू डू मैम ” – युवा माँ बड़े गर्व के साथ इठलाते हुए हिंदी अध्यापिका को बता रही थी और अध्यापिका दुःख मिश्रित विवशता के साथ उन माता-पिता के अंग्रेजी मिश्रित वार्तालाप को सुन रही थी| ? आज भी अंग्रेजी में संभाषण या कम से कम 50 प्रतिशत अंग्रेजी शब्दों के साथ हिंदी बोलने में लोग अपनी शान समझते हैं? कारण यह है कि जब आप के मन में हिंदी बोलने के प्रति हीनभावना है तो आप कैसे उम्मीद कर सकतीं हैं कि बच्चे के मन में अपनी भाषा के प्रति प्रेम और सम्मान पैदा होगा? जब आपका खुद का हिंदी ज्ञान अधकचरा है तो आप भला बच्चे को हिंदी कैसे पढ़ाएँगी, कैसे उसके उच्चारण को शुद्ध कर सकती हैं? जब प्रारम्भिक कक्षाओं से ही सभी विषयों का अध्ययन अंग्रेजी माध्यम से करवाया जाता है तो बच्चे को हिंदी का अध्ययन निरर्थक लगने लगता है| शिक्षा के माध्यम के रूप में हिंदी को अनुपयुक्त ठहराकर सभी विषयों की शिक्षा के लिए अंग्रेजी का चयन करना कहाँ तक उपयुक्त है?

 वे यक्षप्रश्न हैं जिनके उत्तर हमें शीघ्र ही खोजने होंगे| और इनका उत्तर भी शायद हमें अपनी अंतरात्मा से ही मिलेगा| शिक्षा में  हिंदी को अनिवार्य करने का विरोध करने वाले यह नहीं समझ रहे कि वे अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मार रहे हैं|  जितनी जल्दी हम इस बात को समझ जाएँगे कि हिंदी का तिरस्कार करके हम अपनी जड़ों से कट रहें हैं, अपनी समृद्ध सभ्यता, संस्कृति तथा मूल्यों से दूर जा रहे हैं, हमारे लिए बेहतर होगा| इस दिशा में नई शिक्षा नीति में प्रारंभिक कक्षाओं में मातृभाषा में शिक्षा का प्रावधान करके अपनी भाषाओं के प्रति सम्मान का भाव जागृत करने की पहल सराहनीय है| न केवल हिंदी वरन् अन्य भारतीय भाषाएँ भी अपने उचित स्थान व सम्मान को प्राप्त कर पाएँगी|

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