हर पल घटते नए घटनाक्रम में,
Friday, 3 January 2025
किन भावों का वरण करूँ मैं?
मन मेरा किस पार चला
मन मेरा किस पार चला
सोऽहं
सोऽहं
मैं एक कण , मैं ब्रह्माण्ड,
इस सृष्टि में, सृष्टा का मान |
सूक्ष्म से भी अति सूक्ष्म मैं,
और व्यापक से व्यापक परिमाण |
यत्र-तत्र-सर्वत्र मैं ही
और मैं ही अकिंचनता का भान |
मेरी परिधि में विश्व बँधे और
मैं एक बिंदु, शून्य समान |
मैं कर्ता, मैं ही हूँ कर्म,
मैं ही कर्मों का परिणाम |
मैं कारक हूँ, मैं कारण हूँ,
मैं बीज तत्त्व, मैं वृक्ष समान|
क्या देह समझते हो मुझको ....?
मैं आत्म तत्त्व, परमात्म अंश,
सृष्टा से परे कब, मेरी पहचान |
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द्वारा शालिनी रस्तौगी
Thursday, 19 September 2024
ढूँढ़ता किसे भला ?
इस लोक से परे
किस लोक में
होकर व्याकुल है चला ...
यह ढूँढ़ता किसे भला ?
अज्ञात, अनाम, अदृश्य जो,
उसे खोजता है क्यों भला ?
मन यह व्याकुल मनचला,
होकर व्याकुल है चला |
रहस्यमय आवरण की परतें
प्रतिपल घनीभूत हो आएँ|
एक झलक उस पार की,
न छिप पाए ... न दिख पाए|
कौन-सी दृष्टि मिले जो
भाव दृष्टा के जगाए|
सृष्टा जो इस सृष्टि का
उसके सृजन के पास लाए |
भ्रमित पथिक -सा
चकित, थकित -सा
पाने को भटके
कोई दिशा|
होकर व्याकुल है चला
यह ढूँढ़ता किसे भला ?
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शालिनी रस्तौगी


