अनुभूतियाँ, जज़्बात, भावनाएँ.... बहुत मुश्किल होता है इन्हें कलमबद्ध करना .. कहीं शब्द साथ छोड़ देते हैं तो कहीं एकक अनजाना भय अपनी गिरफ़्त में जकड़ लेता है .... फिर भी अपने जज्बातों को शब्द देने की एक छोटी सी कोशिश है ... 'मेरी क़लम, मेरे जज़्बात' |
न हुनर काम आया, न अदा काम आई|
उसे सादगी पसंद थी, बस वही काम आई|
खुशियों की दौलत बटोरी उन्होंने
गमों की सौगात मिरे नाम आई
ख़ुशी का है आलम, तुम संग में हो
बड़ी मुश्किलों से है ये शाम आई