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Thursday, 2 January 2020

Wednesday, 26 September 2018

राधिके मंथर मंथर आई



मत्तगयन्द सवैया 
पुष्प बिछा मग, मंजुल मंडप, माधव मोहक सेज सजाई|
वृक्ष, लता, तरु, पल्लव, कुञ्ज घने घिर ओट बना छातराई|
नृत्य मयूर कियो पिक गीत सुनकर की उनकी अगुआई|
बाँह पसारे खड़े बनमालि कि राधिके मंथर मंथर आई|
शालिनी रस्तौगी

मावस रात भई उजियारी


मत्तगयन्द सवैया 
सोवत ही सबके उठके चल दीं, धरती पग दाब धरा री|
नैन कहीं पर,ध्यान कहीं, उलझे पग, कैसन छाई खुमारी|
आँचल से मुख ढाँप चलीं, पहचान न जाय कोई खटका री|
पूनम चाँद चले  घुँघटा धर, मावस रात भई उजियारी |
शालिनी रस्तौगी 

Tuesday, 25 September 2018

रिझाय मुरारी



मत्तगयन्द सवैया
पाँव बढ़ाए, जरा सकुचाय, चली मिलने वृषभानुकुमारी |
चौंक घुमाय चहूँ दिशि चक्षु, हिय धड़के हर साँस हजारी|
लाज रही पग रोक खिंचा मन, है दुविधा कित जाय बिचारी|
कौन रहे बस, बाँसुरिया जब, राग बजाय रिझाय मुरारी |
शालिनी रस्तौगी 

बिछुआ छनके



पाँव बढ़े बिछुआ छनके छन, झाँझरिया उत शोर मचावे|
कंगन-चूरि करें चुगली, नथ झूमि हिले सब राज बतावे|
सास खड़ी अंगना, ननदी पहरा, उत मोहन टेर लगावे|
सोच-विचारि पड़ी अब क्या, मिलने की उनसे विधि-युक्ति लडावे|
शालिनी रस्तौगी 

Thursday, 20 September 2018

माधव रूप धरा राधा


मत्तगयन्द सवैया 
रूप गहा जब माधव का पट पीत धरा नागरि राधा|
वेणु गही कर, श्याम छवी धर मोहक पाश बिछा बाँधा|
श्याम सलौनि छवी निरखी जब पूनम चाँद लगे अब आधा|
मोहन प्यारि, कृपा जिन पाकर, कौन सा काज नहीं कब साधा||
शालिनी रस्तौगी

मानत ना वृषभानुसुता


मत्तगयन्द सवैया 
मानत ना वृषभानुसुता कर जोरि मना उन माधव हारे|
पाँव गहे, मृदु बैन कहें किसना अपनाय अनेक सहारे|
पुष्प कदम्ब चिरौरि करै अरु गोसुत कातर नैन निहारे|
ताप तिलोक हरें हरि जो निज खातिर ढूँढ रहे हरकारे||
शालिनी रस्तौगी

Sunday, 11 June 2017

रस प्रीत सखी सब सूख गया (सवैया)


रस प्रीत सखी सब सूख गया, मरुभूमि बनी मन भू सगरी|
दिन-रैन झरे अँखियाँ जलधार, रहा मन शुष्क, कहाँ रस री|
मन अंकुर प्रीत फलै-पनपे, मुरझाय रहा सगरा वन री|
बदरा बन आस-निरास ठगें, झलकें, छिप जाएँ करें छल री|

Friday, 9 June 2017

सखियाँ (सवैया)


दिन ग्रीष्म बड़े, नहिं काट कटें,मिल बैठ करें सगरी बतियाँ|
परिहास करें, मुख जोरि हँसें, हिय बात बताय रहीं सखियाँ|
कह बात पिया से हुई कब क्या, कह संग बिताइ कहाँ रतियाँ|
सनदेस पिया पहुँचाय रहीं,हिय बैन लिखें, मिल के पतियाँ||
शालिनी रस्तौगी

Sunday, 14 May 2017

नार मनोहर



सवैया 
सोहत नार मनोहर मोहक, मोह लियो मन सारि गुलाबी।
बैन बने महुआ मदिरा सम, चैन चुरावत नैन शराबी।
चाल चले मनमोहक वेणि हिले कटि ठाठ दिखाय नवाबी।
कौन सखी तुझ-सा बतला अब कौन मिले तुझसा रि जवाबी।
~~~~~~~~~
शालिनी रस्तौगी

Friday, 12 May 2017

सवैया - मनभावन फागुन



सवैया 
मनभावन फागुन झूम रहा, सर बोल रही चढ़ भाँग सखी।
सरकी सर से चुनरी बहकी, अब ढंग तजा, सब लाज रखी।
हरषाय लखे सजना सजनी, मुसकाय खड़ी पिय प्रेम लखी।
कचनार कपोल भए जब रंग, मले सजना भर अंग सखी।
shalini rastogi 
(चित्र गूगल से साभार)

सवैया - ले गगरी निकली पनिहारिन




सवैया 
ले गगरी निकली पनिहारिन, छैल सभी निकले घरसे।
मंथर सी गति, चाबुक सी कटि, पैर धरे भू मन हुलसे।
नाजुक हाथ कलाइ मुड़ी, घट नीर भरा न गया उनसे।
रूप भरी छलकी गगरी, मन प्यास बुझी नयना हरसे।
शालिनी रस्तौगी

(चित्र गूगल से साभार)

Sunday, 17 July 2016

हास करे, परिहास करे

सवैया 


हास करे, परिहास करे मन की गति वो समझे नहिं मेरी।

आय, सताय,रुलाय,मनाय,करे मन की सुनता नहिं बैरी।

लाज भरी इनकार करूँ झट बात बना करके मति फेरी।

लेकर सौं इक बात कहूँ अब बात न मानु कभी पिय तेरी।।

Wednesday, 2 September 2015

नैन ( सवैया )

नैन लड़ें अरु नैन मिलें, कब रार करें कब मीत बनाएँ |

प्रीत सुधा बरसाय कभी, विष बान बनें हिय में बिध जाएँ|


ढीठ बने अड़ जावत तो भर लाज कभी नयना सकुचाएँ|


बैन बने हिय की बतियाँ, रह मौन सखी सगरी बतलाएँ

Shalini Rastogi


Saturday, 24 January 2015

वसंत

वसंत पर एक सवैया 
~~~~~~~~~~~~~
देख सजी धरती धर चूनर खेत हुए सगरे अब पीले|


पीत भई पगड़ी सज के मन, देख लुभावत लोग सजीले|


झाँक रहे छिप चूनर ओट, सखी सजना दुइ नैन रसीले|


आय गए सज ठाठ दिखा,मन लेत लुभाय वसंत छबीले||



Wednesday, 19 March 2014

कान्हा खेलत होरी ( सवैया )


सवैया

 
रंग लगावत, अंग लगावत, ऐसन ढीठ करै बरजोरी

,
भीज गयो सब अंग भई सतरंग सखी ब्रज की सब छोरी,


पाकर स्पर्श रही हरषा उन संग बँधी अब प्रीत रि डोरी ,


रंग छुटे तन ते मन ते उतरे नहिं ये विनती सुन मोरी.

Monday, 24 February 2014

बाँसुरिया बन जाऊँ, सवैया ( मत्तगयन्द )

सवैया ( मत्तगयन्द )

~~~~~~~~~~~~



आ अधरान मुझे धर मोहन मैं फिर बाँसुरिया बन जाऊँ |

स्पर्श करो तुम रंध्र हिया जब मैं तब बाँबरिया बन जाऊँ |

मान तजूँ तुझ में मिल के तुझ सी अब साँवरिया बन जाऊँ |

आस नहीं मन कंठ लगूँ पग में पड़ झाँझरिया बन जाऊँ ||

Tuesday, 18 February 2014

प्रेम पगी रस में लिपटी, हर बात (सवैया - मत्तगयन्द)

सवैया (मत्तगयन्द)

प्रेम पगी रस में लिपटी, हर बात पिया सुन लागत तेरी|

लाज हया बिसराय सबै, फिरती अब काठ भई मति मेरी |

मोहन मोह लियो जब जी, तन भी गह ले अब कैसन देरी|

जीवन जाय अकारथ ये सगरा तुमने अँखियाँ जदि फेरी ||

Sunday, 2 February 2014

राधा अलबेली ( सवैया - मत्तगयन्द)

सवैया - मत्तगयन्द 



माखन की मटकी भर शीश रखी चल दी सुधि भूलि अकेली |


कोय न संग चली लचका कटि वे वृषभानुसुता अलबेली |


सम्मुख आय गए किसना मग में बन ज्यों रहि एक पहेली |


औचक चूम लियो मुख औ महकाय गई तन कोइ चमेली ||

Friday, 18 October 2013

सवैया ( सुंदरी )


सवैया ( सुंदरी )
सगण x 8 + 1 गुरु 
हर रोज़ सुनाय कथा नव साजन, रोज़ करै नव एक बहाना|
सखि हार गई अब तो उनते, कह झूठन का कित कोय ठिकाना |
पल में फिरि जाय न याद रखे, कब जानत है वह बात निभाना |
अभिसार किये नित राह तकूँ, वह जानत सौतन सेज सजाना ||
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