मशविरा कोई तो दो यारों कि मुश्किल बड़ी है '
इधर कूचा - ए - यार है, उधर मस्जिद खड़ी है
पी के जो ज़रा बहके कि सबक पढ़ाने लगी दुनिया
होश में रहने को यारों, ज़िंदगी बहुत ही बड़ी है
रात की खुमारी ही उतरी न थी अब तक कि
सुबह तल्ख़ सच्चाई फिर रु-ब-रु खड़ी है
दो घूँट ही चढ़ाई थी कि छिपते फिर रहे थे हम
क्या करें जनाब-ए-शेख की, नाक बहुत बड़ी है .
मैखाने के दरवाजे पे, दो पल क्या ज़रा ठहरे,
त्योरियाँ ज़माने भर की , हम पे चढ़ी हुई हैं
मयकश को सहारा दे ज़रा, घर तलक क्या पहुँचाया
बदनामियाँ ज़माने भर की अब, दरवाज़े पे आ खड़ी हैं ..
