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Friday, 10 August 2012
Saturday, 21 May 2011
नव सृजन
हे प्रभु
सृजन का दो वरदान
युग युग के गहन तिमिर को तोड़
हो आलोकित मेरे प्राण
वाणी में शक्ति
अर्थ में मुक्ति
भावों में गहन सागर अपार
प्रभु , सृजन का दो वरदान
कल्पना को मेरी पंख प्रदान कर
दो अनंत विस्तृत उड़ान
शब्दों के कल्प तरु से
मैं पाऊं इच्छित वरदान
प्रभु , सृजन का दो वरदान
निश्छल भावों की मणियों से
भर दो आज ये झोली खाली
लौटे फिर वही भोला बचपन
फिर अधरों पर मृदुल मुस्कान
प्रभु , सृजन का दो वरदान
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