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Friday, 3 January 2025

सरस्वती (दूसरे पक्ष का पक्ष)

 सरस्वती (दूसरे पक्ष का पक्ष)

~~~~~~~~
स्त्री ने पुरुष से कहा-
‘तुमने ही दिया है मुझे
.....सारा दर्द-सारी पीड़ा’|
फिर उसने खोली,
अपने आरोपों की पोटली,
और एक-एक कर गिनवाए,
वे सभी ज़ख्म,
जो दिए थे पुरुष ने उसे ... कभी |
उन आरोपों की झड़ी और
स्त्री आँखों से बहती गंगा-जमुना में,
भीगा पुरुष ... अपराधबोध से ग्रसित,
सिर झुका सुनता रहा ... बहुत देर तक,
चुपचाप .... अपनी पीड़ा को समेटे|
पर .... उसके पास भी थे अपने दर्द,
कुछ अनकही शिकायतें,
कुछ बहुत पुराने ज़ख्म ...
उसके अंतस में बह रही थी,
दर्द की एक नदी .... जो,
आँखों से बह निकलने को,
उफनी, मचली, बार-बार टकराई ...
उस उपरी चट्टानी परत से,
जिसे रचा था पुरुष ने ही,
अपने चारों ओर..... पर,
न तोड़ पाई वह ... आँखों पर बँधे बाँध |
और फिर एक बार,
पुरुष का दर्द ....
बन गया उसकी चिल्लाहट,
जो दुनिया ने सुनी |
फिर नज़र नहीं आई किसी को
स्त्री की आँखों से बहती,
गंगा-जमुना की बाढ़ के आगे,
पुरुष अंतस में,
अदृश्य हो बह रही ...
सरस्वती !!
~~~~~~~~
शालिनी रस्तौगी

सनातन

 अपने देवी- देवताओं को हमने,

नहीं बनाया ,
अपनी प्रेरणा का स्रोत,
मात्र श्रद्धा और आस्था का केंद्र बनाकर,
लीन हो गये भक्ति में…..
हमने देखे ,
केवल अभय मुद्रा में उठे ,
उनके हाथ ,
और उनको अपनी रक्षा की ज़िम्मेदारी सौंप,
स्वयं हो गए,
निष्क्रिय ….
नहीं देखे हमने,
अस्त्र-शस्त्र से सज्जित,
उनके दूसरे हाथ।
नहीं दिखे हमें,
उनके चरणों में पड़े ,
शिरछिन्न असुर ।
कुछ तो ली होती प्रेरणा,
कुछ तो अपनाया होता उनका चरित्र ,
तो आज नहीं कहते ,
ख़तरे में है …….
सनातन

मन मेरा किस पार चला

 


मन मेरा किस पार चला

छोड़कर अपना किनारा,
तोड़कर बंधन यह सारा,
खोलकर चिंतन की नौका,
ले मनन पतवार चला
मन मेरा किस पार चला ...
१.
न कोई दिशा, न कोई लक्ष्य है,
न पथ कोई, न पता समक्ष है,
किस मार्ग से जाऊँ, बताए,
कौन गुरु जो ऐसा दक्ष है ?
अनसुलझे प्रश्नों का ये, सिर पे ले अंबार चला
मन मेरा किस पार चला
२.
कौन अपनी ओर खींचता?
वहाँ कौन है मुझको बुलाता ?
किस आकर्षण से बँधी जो,
अज्ञात होकर भी लुभाता ?
अप्रत्यक्ष को पाने को मन यह, देखो तज के संसार चला|
मन मेरा किस पार चला ....
३
ये जग कब-कैसे छूटेगा?
ये बंधन कैसे टूटेंगे?
माया-मोह और जड़ता ये,
दस्यु कब तक मन लूटेंगे?
विद्रोह, विरक्ति, व्याकुलता, द्वंद्व यह अपरंपार चला|
मन मेरा किस पार चला ....
~~~~~~~~~~~~~~
शालिनी रस्तौगी

सोऽहं

 

सोऽहं

मैं एक कण , मैं ब्रह्माण्ड,

इस सृष्टि में, सृष्टा का मान |

सूक्ष्म से भी अति सूक्ष्म मैं,

और व्यापक से व्यापक परिमाण |

यत्र-तत्र-सर्वत्र मैं ही

और मैं ही अकिंचनता का भान |

मेरी परिधि में विश्व बँधे और

मैं एक बिंदु, शून्य समान |

मैं कर्ता, मैं ही हूँ कर्म,

मैं ही कर्मों का परिणाम |

मैं कारक हूँ, मैं कारण हूँ,

मैं बीज तत्त्व, मैं वृक्ष समान|

क्या देह समझते हो मुझको ....?

मैं आत्म तत्त्व, परमात्म अंश,

सृष्टा से परे कब, मेरी पहचान |

~~~~~~~~~~~~  

द्वारा शालिनी रस्तौगी

Thursday, 22 December 2022

इल्लियाँ और तितलियाँ

 बेचैन हैं कुछ इल्लियाँ
तितलियाँ बन जाने को
कर रही हैं पुरज़ोर कोशिश
निकलने की
कैद से अपने कोकून की।
वे काट कर चोटियाँ,
लहरा रही हैं ,
आज़ादी का परचम।
गोलियाँ और गालियाँ खाकर भी
कर रही हैं आवाज़ बुलंद ।
वे लड़ रही हैं अँधेरे से,
हिजाब के पहरे से,
इल्म औ अना की रोशनी से,
जगमगाना चाहती हैं ,
अपना आसमाँ,
जिसमें उड़ सकें वे ,
अपने रंगबिरंगे पंख फैलाए,
बेख़ौफ़।
हाँ, अब तितलियाँ बन जाना चाहती हैं,
कुछ इल्लियाँ।
वहीं बेचैन हैं कुछ तितलियाँ ,
फिर से इल्लियाँ बन जाने को।
वे खुद पोत रही हैं,
जहालत और ज़िल्लत की स्याही
अपने रंगीन पंखों पर।
वे गुम हो जाना चाहती हैं फिर
ग़ुलामी के गुमनाम गलियारों में,
दफ़न हो जाना चाहती हैं
कट्टरता के मकबरों में ,
फिर तान लिए उन्होंने
हिजाब के काले शामियाने
खुले आसमानों तले,
वो फिर अपने परों को समेट,
अपने कोकून में घुस
इललियाँ बन जाना चाहती हैं ..... कुछ तितालियाँ।
~~~~~~~~
शालिनी रस्तौगी

औरत की कहानी

 औरत की कहानी


~~~~~~~~~
एक औरत ने,
औरतों के लिए ,
एक औरत की कहानी लिखी |
कुछ आशाएँ, थोड़े सपने, कुछ बेगाने, थोड़े अपने
धड़कती छतियाँ, अकेली रतियाँ, अधूरी बतियाँ , कुछ प्रेम की पतियाँ ,
ख्वाहिशें जानी-पहचानी सी कुछ, कुछ थीं जो अनजानी लिखीं|
एक औरत ने, औरतों के लिए, एक औरत की कहानी लिखी.... कुछ बचपन के उल्लास बिखेरे,
कुछ यौवन के अनुराग उकेरे,
थोड़े प्रौढ़ हुए - से सपने, कुछ किशोर नादानी लिखी |
कभी न बीता जो बचपन, पल में बीती वो जवानी लिखी |
एक औरत ने, औरतों के लिए, एक औरत की कहानी लिखी ....

हँसते होंठो के पीछे उदासी की परत ,
पनीली आँखों के सपनों की झलक ,
लहराती लटों में रातों की स्याही
कहीं जुल्फों पर जो, चाँदी थी उतर आई ,
रंगत आबनूसी, कहीं सुनहरी – रुपहली - आसमानी लिखी |
कहीं तरुणाई की चमक , तो कहीं झुर्रियों भरी पेशानी लिखी |
एक औरत ने, औरतों के लिए, एक औरत की कहानी लिखी ......

आटे गूँधते गूँधी गई संग ख्वाहिशें,
रोटी की संग आँच पर सुंध महक उठीं चाहतें,
बुहारी लगाते बुहार दीं जो, मन से बाहर हसरतें,
ऊन से सलाइयों पर, ख़्वाबों की उतरीं बुनावटें ,
मसरूफियत का खालीपन , बेचैनियों की इत्मिनानी लिखी
जो कही नहीं थी कभी किसी से, उस बात की तर्जुमानी लिखी |
एक औरत ने, औरतों के लिए, एक औरत की कहानी लिखी ......

बखूबी निभाए जा रहे रिश्तों का खोया अपनापन,
फ़र्ज़ का निभाव करते, मन में उतरा सूनापन,
करवट बदलती रात में, मीठी नींद का ख्वाब,
अपने घर में, अपने लिए एक कोने की तलाश ,
सर्वस्व समर्पण का सुकून, सब खोने की परेशानी लिखी|
कहीं मुश्किलों की इबारतें, कहीं चैन – आसानी लिखी|
एक औरत ने, औरतों के लिए, एक औरत की कहानी लिखी ......
~~~~~~~~~~
शालिनी रस्तौगी

उलझन

 मैं उलझी हूँ सुलझाने में

उलझे से ताने-बाने में,
ये दुनिया या वो दुनिया
गुत्थी समझ न पाने में।
गुथ चुके सिरे आपस में यूँ
ओर-छोर न मिल पाए
कैसे बुन पाऊँ प्रेम चदरिया
रास्ता कोई तो दिखलाए,
दो दुनियाओं के बीच फँसी,
दुविधा में कैसी आन पड़ी,
न इस जग में रह पाने में,
न उस जग में जा पाने में।
अज्ञात खींचता धागा तो
ढीले पड़ते दुनियावी धागे
दुनिया के धागे तानूँ तो
टूटे जाते उससे नाते,
यहाँ वहाँ, इसके - उसके
गुच्छों को सुलझाने में,
उस तक जाऊँ तो जग छूटे
जग को चाहूँ तो वो रूठे,
किससे जोड़ूँ, किससे तोड़ूँ
किसको पाऊँ , किसको छोडूँ
कैसे दो जग के तार जुड़ें,
ये समझने में, समझाने में
~~~~~~~~~~
शालिनी रस्तौगी

जाने क्यों एकाकी मैं?

 


जाने क्यों एकाकी मैं?

जीवन की इस भीड़-भाड़ में,

रेलमपेल औ भाग-दौड़ में,

कहीं बची न बाकी मैं|

जाने क्यों एकाकी मैं?

साँझ ढले जब वज़्म सजे,

प्याले दर प्याले दौर चले,

कहीं दर्द में भीगी-भीगी शायरी,

कहीं सुर-लय-ताल से ग़ज़ल सजे|

कभी रेत कभी शबनम बन बिखरे,

जज्बातों से अल्फाज़ सजे |

कहीं मय छलके, कहीं अश्क़ बहे,

हँसी, ठहाके, आँसू पीड़ा,

सब हुए शराबी बहके-बहके|

पर अपनी मधुशाला में,

मय, मीना न साक़ी मैं !

सुबह-शाम-दिन-दोपहरी,

जाने क्यों एकाकी मैं?

~~~~~~~~

शालिनी रस्तौगी

22/12/2022

बेकार की बातें

काम की बातें ,
अक्सर कर देती हैं बोझिल ...
मन और माहौल को
तो चलो,
फिर कुछ बेकाम-बेकार सी बात करते हैं
किसी बात पर, बेबात ठहाके लगाते हैं,
किसी बात पर होंठ दबाकर मुस्कुराते हैं
कुछ अटपटी बातों को
खट्टी-मीठी गोली की तरह
मुँह में घुमाते हुए
चटकारे लगा खुलकर खिलखिलाते हैं...।
सारे दिन की थकन से,
बेमतलब-सी अनबन से
किसी की बात के कसैलेपन से
जो घुल गई है मुँह में कड़वाहट
चूरन-सी चटपटी बातों के चटाखे लगा
कसैलापन भुलाते हैं।
बातों के गोलगप्पों में ,
मज़ाक की चटनी लगा,
चटपटे चुटकुलों का पानी भर
आज बातों के चटोरे बन जाते हैं।
चलो दोस्त
कुछ बेकार की बातें बनाते हैं💝😘
~~~~~~~~~
शालिनी रस्तौगी
12/12/22
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Sunday, 11 December 2022

प्रेम कहानियाँ

 मैं प्रेम कहानियाँ सुनाती हूँ

सुनोगे .......?
हर तरह की प्रेम कहानियाँ हैं मेरे पास
बताओ, किस तरह की कहानियाँ पसंद हैं तुम्हें?
लैला-मजनू, हीर-राँझा, शीरी-फरहाद
बताओ, क्या सुनाऊँ
शुरू से आख़िर तक, हरेक कहानी
याद है मुझे मुँह-ज़ुबानी
क्या कहा? ... ये सभी कहानियाँ है आधी-अधूरी
आँसू, कसक, आहें, तड़प ,
कभी न मिल पाने की इनमें छिपी मजबूरी|
अरे जनाब! अधूरी हैं, तभी तो हैं प्रेम कहानियाँ !
मुकम्मल हो जातीं तो न बचता प्रेम, न बचती ये कहानियाँ|
चलो फिर, सफ़ेद संगेमरमर के मकबरे में,
चाँदनी की शीतल चादर में लिपटी प्रेमकथा सुनोगे ?
प्रेम ... और उस कथा में ... रहने भी दो !
असलियत का के आफ़ताब में सच्चाई को देखो ..
उफ्फ, बहुत डिमांडिंग हो तुम तो ...
चलो छोडो पुराने किस्से, कुछ नई कहानियाँ भी हैं मेरे पास
ऐसी कहानियाँ .. जिन्हें बड़े सँभालकर,
टुकड़ों-टुकड़ों में काट, पोलीथिन में लपेट
बर्फ की तहों में जमाया गया है|
कहीं तालाबों की गहराइयों में छिपाया,
कहीं तन्दूरों में सुलगाया,
कहीं पेड़ों पर लटकाया गया है|
जंगल-जंगल बिखेरा है, टुकडे-टुकड़े प्रेम,
तो देख रहे हो ना,
हर जगह है प्रेम ....
आखिर कुछ भी हो
कमी नहीं पड़नी चाहिए प्रेम की
जगलों में बिखरे उन टुकड़ों को चुनकर
मैं हर उस रिसते, गलते, जलते, गंधाते टुकड़े से
पूछती हूँ उसके प्रेम के किस्से
आखिर, सुनानी हैं जो तुम्हें
प्रेम कहानियाँ ....
~~~~~~~~~~~
शालिनी रस्तौगी
11/12/22
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