Wednesday, 26 September 2018

राधिके मंथर मंथर आई



मत्तगयन्द सवैया 
पुष्प बिछा मग, मंजुल मंडप, माधव मोहक सेज सजाई|
वृक्ष, लता, तरु, पल्लव, कुञ्ज घने घिर ओट बना छातराई|
नृत्य मयूर कियो पिक गीत सुनकर की उनकी अगुआई|
बाँह पसारे खड़े बनमालि कि राधिके मंथर मंथर आई|
शालिनी रस्तौगी

मावस रात भई उजियारी


मत्तगयन्द सवैया 
सोवत ही सबके उठके चल दीं, धरती पग दाब धरा री|
नैन कहीं पर,ध्यान कहीं, उलझे पग, कैसन छाई खुमारी|
आँचल से मुख ढाँप चलीं, पहचान न जाय कोई खटका री|
पूनम चाँद चले  घुँघटा धर, मावस रात भई उजियारी |
शालिनी रस्तौगी 

Tuesday, 25 September 2018

रिझाय मुरारी



मत्तगयन्द सवैया
पाँव बढ़ाए, जरा सकुचाय, चली मिलने वृषभानुकुमारी |
चौंक घुमाय चहूँ दिशि चक्षु, हिय धड़के हर साँस हजारी|
लाज रही पग रोक खिंचा मन, है दुविधा कित जाय बिचारी|
कौन रहे बस, बाँसुरिया जब, राग बजाय रिझाय मुरारी |
शालिनी रस्तौगी 

बिछुआ छनके



पाँव बढ़े बिछुआ छनके छन, झाँझरिया उत शोर मचावे|
कंगन-चूरि करें चुगली, नथ झूमि हिले सब राज बतावे|
सास खड़ी अंगना, ननदी पहरा, उत मोहन टेर लगावे|
सोच-विचारि पड़ी अब क्या, मिलने की उनसे विधि-युक्ति लडावे|
शालिनी रस्तौगी 

Friday, 21 September 2018

पौधा क्यों कुम्हलाया


पौधा क्यों कुम्हलाया

सभी अपनी निगाहों में प्रश्नों के बाण लिए अपनी निगाहों से माली को भेद रहे थे और माली सिमटा हुआ-सा इस सोच में पड़ा था कि आखिर उससे कहाँ गलती हो गई? जैसे-जैसे इन सबने कहा था बिलकुल वैसे ही तो देखभाल की थी पौधे की .. फिर?? वह शुरू से सब बातों को क्रमबार सोचने लगा ...
जिसने पौधा रोपा था उससे पौधे की देखभाल करनी आती नहीं थी अतः उसने वह पौधा , पौधों की देखभाल करने वाली संस्था को दे दिया| माली को जब वह पौधा मिला तो उसने पौधे को अपना समझ कर अपनी पूरी काबिलियत से उसकी देखभाल शुरू कर दी क्योंकि वह जानता था कि पौधे को परवान कैसे चढ़ाया जाता है| एक दिन जब माली ने देखा कि पौधे कि एक पत्ती पीली पड़ रही है तो उसने उस पत्ते को तोड़ दिया| हेड माली ने माली को पौधे की पत्ती तोड़ते देख लिया| वह जोर से चिल्लाया, “तुमने किस हक से पौधे की पत्ती उखाड़ी ? तुम्हें पता है कि पौधे का मालिक कितना नाराज़ होगा?” “पर पीली पत्तियों को तोड़ना ज़रूरी होता है नहीं तो पौधे की बढ़त रुक जाती है” – माली ने तर्क दिया| बात संस्था प्रमुख के पास पहुंची तो उन्होंने माली को डाँटते हुए कहा – “तुम्हें ज्यादा दिमाग लगाने की कोई ज़रूरत नहीं है, अब हम बताएँगे कि पौधे की देखभाल कैसे करनी है|”
अब माली पर कड़ी निगाह रखी जाने लगी – “आज तुमने पौधे में कम पानी क्यों डाला, आज तुमने उसे धूप में क्यों रखा .... खाद थोड़ी ज्यादा डालो ... और हाँ, पौधे कि पत्ती तोड़ना तो दूर, उसे झूने की भी कोशिश मत करना|” माली पर .. पर कर्ता रह गया मगर फरमान सुनाने वाले सुना कर चले गए|
अब पौधे का मालिक जब पौधे के निरीक्षण के लिए आया तो देखा कि पौधे की पत्तियाँ पीली हो रही हैं| आगबबूला होते हुए उसने माली, हेड माली, संस्था प्रमुख सबको एक पंक्ति में खड़ा करके अल्टीमेटम दे दिया – “मैं तुम्हें पौधे की देखभाल करने के पैसे दे रहा हूँ और तुमने मेरे पौधे की पत्तियाँ पीली कर दीं,.... तुम्हारा माली किसी काम का नहीं है, मैं वन-विभाग में तुम्हारी शिकायत करूँगा .... कानूनी कार्यवाही करूँगा|”
पोधे के मालिक की चीख पर वन विभाग, पौधा संरक्षण संस्थाएँ, पुलिस, कानून सब डंडा लेकर संस्था के पीछे पड़ गए| संस्था प्रमुख ने हाथ जोड़ घिघियाते हुए कहा – “आप चिंता न करें. आपके इस पौधे को हरा-भरा करने में हम जी-जान लगा देंगे| इसके लिए हमने विदेशों से एक्सपर्ट बुलाए हैं, वे हमें सुझाव देंगे कि हमें पौडे की देखभाल कैसे करनी है|”
भारी-भरकम डिग्रियाँ लिए, आँखों पर विदेशी चश्मा चढ़ाए एक्सपर्ट ने दूर से पौधे की बारीकी से जाँच की  और कहा – “पौधे की देखभाल में प्यार की कमी है| आप अपने माली से कहिये कि वह प्रतिदिन पौधे को गाना सुनाए, उससे दिन में चार बार यह कहे कि तुम बहुत बहुत अच्छे हो, तुम बहुत बड़े पेड़ बनोगे .... पौधे को धूप में बिलकुल न निकला जाए और उसमें हर दिन यह विदेशी खाद डाली जाए|”
“पर यह तरीका यहाँ के मौसम और पर्यावरण के अनुकूल नहीं है .. और इस विदेशी खाद से पौधे की जड़ें ही गल जाएँगी .. जड़ें गल गईं तो फिर कैसे पनपेगा ” – माली बुदबुदाया| “चुप !!! तुम्हें क्या पता पौधे की देखभाल कैसे की जाती है| जैसा कहा जा रहा है वैसा करो” – चारों और से समवेत स्वर में आदेश आया| संस्था प्रमुख ने कहा – “वह पौधे की हर घंटे की प्रोग्रेस को लिखकर और ग्राफ बनाकर ऑफिस में सबमिट करे| हेड माली रोज़ तुम्हारी रिपोर्ट पौधे से लेगा कि कहीं तुम उसे कोई कष्ट तो नहीं पहुँचा रहे|”
अब माली प्रतिदिन उस पौधे को ए.सी. कमरे में गाना सुनाता है, दिन में चार बार उससे कहता है कि वह बहुत अच्छा है, ढेर सारा पानी और विदेशी खाद डालता है और हर घंटे उसकी लम्बाई चौड़ाई को नापकर रिपोर्ट तैयार करता है| परन्तु पौधा है कि दिन ब दिन कुम्हलाता ही जा रहा है|
क्या आप में से कोई बता सकता है कि पौधा क्यों कुम्हला रहा है??
शालिनी रस्तौगी

Thursday, 20 September 2018

माधव रूप धरा राधा


मत्तगयन्द सवैया 
रूप गहा जब माधव का पट पीत धरा नागरि राधा|
वेणु गही कर, श्याम छवी धर मोहक पाश बिछा बाँधा|
श्याम सलौनि छवी निरखी जब पूनम चाँद लगे अब आधा|
मोहन प्यारि, कृपा जिन पाकर, कौन सा काज नहीं कब साधा||
शालिनी रस्तौगी

मानत ना वृषभानुसुता


मत्तगयन्द सवैया 
मानत ना वृषभानुसुता कर जोरि मना उन माधव हारे|
पाँव गहे, मृदु बैन कहें किसना अपनाय अनेक सहारे|
पुष्प कदम्ब चिरौरि करै अरु गोसुत कातर नैन निहारे|
ताप तिलोक हरें हरि जो निज खातिर ढूँढ रहे हरकारे||
शालिनी रस्तौगी

Wednesday, 20 June 2018

‘दृष्टि’ महिला लघुकथाकार अंक

आदरणीय श्री अशोक जैन एवं प्रसिद्ध लघुकथाकार कांता राय जी के कुशल संपादन से सजी, लघुकथा को समर्पित अर्द्धवार्षिकी पत्रिका ‘दृष्टि’ का महिला लघुकथाकार अंक मेरे हाथों में है| इसके लिए मंजू जैन मैम का हृदय से आभार| ‘दृष्टि’ पत्रिका कि सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि यह न केवल लघुकथाकारों को एक अच्छा मंच उपलब्ध करवाती है वरन् लघुकथा की बारीकियों को बड़ी कुशलता से समझाती है| सम्पादकीय पढ़ते ही आपको इस पत्रिका का गुरुतर उद्देश्य समझ आ जाता है जहाँ लघुकथा के अस्तित्व को बचाकर इस विधा को नया जीवन व नया कलेवर देने के प्रयास स्पष्टतः समझ आते हैं| अंक के प्रारंभ में भी संपादक श्री अशोक जैन जी द्वारा लघुकथाकारों को अच्छा पाठक बनने का सुझाव इस दिशा में उठाया गया एक मजबूत कदम है|
महिला लघुकथाकार विशेषांक का अतिथि संपादन भी बेहतरीन लघुकथाकार, संपादिका एवं ‘लघुकथा के परिंदे’ नामक समूह की संचालिका कांता राय जी के दक्ष हाथों में सौंपना इस अंक के लिये सोने पर सुहागा साबित हुआ| कांता राय जी ने जहाँ एक ओर महिलाओं को केवल शौकिया लेखन से ऊपर उठकर एक जिम्मेदाराना प्रयास के लिए प्रेरित किया वहीं नारी मन में छिपी अकुलाहट व सृजनशीलता के निकास का पथ भी प्रदर्शित किया|
‘दृष्टि का सम्पादकीय एवं डॉ. अशोक भाटिया द्वारा लिखित आलेख ‘हिंदी में लेखिकाओं का लघुकथा संसार’ पढना स्वयं में एक शोध के सामान है जहाँ लघुकथा संसार में छिपी संवेदनाओं और संभावनाओं को बेहद खूबसूरती के साथ उकेरा गया है| लघुकथा कि प्रथम शोधार्थी डॉ. शकुंतला किरण जी का साक्षात्कार लघुकथा की आत्मा को शब्दों में ढालकर इतनी सहजता से प्रस्तुत करता है कि कोई संदेह शेष ही नहीं रह जाता| विशिष्ट लघुकथाकार के रूप में चित्रा मुद्गल जी कि पांच रचनाएँ बहुत प्रभावी हैं| सातवें व आठवें दशक की पांच लघुकथाकारों की रचनाएँ लघुकथा के क्रमिक विकास का ब्यौरा देती हैं|
१०० महिला लघुकथाकारों की रचनाओं से सजा ‘दृष्टि’ का यह विशेषांक नारी मन के सभी कोनलों का स्पर्श करता है | नारी मन की अकुलाहट, आत्मनिर्भरता, स्वतंत्रता की चाहत, ममता, प्रेम व स्नेह जैसी संवेदनाओं से जुड़ी रचनाएँ हैं तो सामाजिक सरोकरों से जुड़ी, भेदभाव की परिपाटी को सिरे से ख़ारिज करने का साहस रखने वाली पितृसत्तात्मक समाज के विरोध में मुखर होती रचनाएँ भी सम्मिलित हैं| जीवन के अनेक रंगों के पुष्पों को स्वयं में समेटे दृष्टि का यह अंक संग्रहणीय है| सभी लेखिकाओं, एवं संपादकों को हृदयतल से साधुवाद|
Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...
Blogger Tips And Tricks|Latest Tips For Bloggers Free Backlinks