Saturday, 24 June 2017

रंगों की पत्रकारिता

आप रंगों की पत्रकारिता करते रहिए।
प्रत्येक रंग पर 
किसी राजनैतिक दल का
ठप्पा लगाइए
और फिर रंग से जोड़कर 
घटनाओं को मनचाहा जामा पहनाइए।
रंगों के धर्म बताइए
एक रंग को दूसरे का विरोधी बताकर
आपस में और रंगों से
लड़ने के लिए उन्हें उकसाइए।
फिर वो एक रंग
जो जमीन पर बहे
उस रंग को लेकर फिर हाहाकार मचाइए।
किसी रंग को कभी चाटुकारिता का
तो किसी को आक्रामकता का
पैरोकार बताइए।
आखिर ..... ऐसे ही तो कोई धर्मनिरपेक्ष नहीं बन जाता।

हत्या या आत्महत्या ........?

पेड़ पर लटकी रस्सी
या सल्फास की गोली
नहीं थी कारण
उसकी मृत्यु का.... 
कुछ मौसमों ने साज़िश की
कुछ बाज़ार ने घेराबंदी की
कुछ वादों का जहर उसे पिलाया गया
कुछ कर्ज़ों के पत्थरों से कुचला गया
तब कहीं जाकर
किश्तों में
हत्या हुई थी उस किसान की
और नाम दिया गया
आत्महत्या....?

Thursday, 22 June 2017

यूँ अचानक आज इक मिसरा हुआ|

इश्क पर ज्यों ज्यों कड़ा पहरा हुआ|
रंग इसका और भी गहरा हुआ|

कह रहे थे तुम कि गुनती जाती मैं|
यूँ अचानक आज इक मिसरा हुआ|

मुस्कुराते तुम कि झड़ते जाते गुल|
चुन रही थी मैं अजी गजरा हुआ|

यूँ  रुका आँसू पलक की कोर पर ,
फूल पर शबनम का कण ठहरा हुआ|

चाह कर भी कह न पाए राज़े-दिल,
इस जुबां पर लाज का पहरा हुआ|

ज़िन्दगी को रू-ब-रू पाया कभी,
यूँ लगा कि मीत हो बिसरा हुआ|

नदिया के जैसी रवानी चाहिए,
सड़ने लगता आब है ठहरा हुआ|

कौन समझाए किसे, फुरसत कहाँ,
घर बुजुर्गों के बिना बिखरा हुआ|

पीछे कमरे में पड़े माँ-बाप हैं,
ज्यों कबाड़ या कि फिर कचरा हुआ|

सुनते थे इन्साफ है अंधा मगर,
साथ में शायद है अब बहरा हुआ|

था विवश कर्जे से पहले ही कृषक

मार से मौसम की अब दुहरा हुआ|

प्रश्न पूछते डरता है मन

प्रश्न पूछते डरता है मन
कि उत्तर मिला ... न मिला!
अगर मिला भी
और मन के अनुकूल न हुआ तो ?
हाँ, उत्तर तो चाहता है
पर सत्य को ...
न सुनना चाहता
न स्वीकारना |
चाहता तो बस अनुकूलता
प्रतिकूलता से घबराता है
इसलिए
प्रश्न पूछते डरता है मन...

Monday, 12 June 2017

कामनाएँ

कामनाएँ
कभी नष्ट नहीं हो पातीं,
चाहे अचेतन की गहराई में दफनाओ, 
या चेतना की आग में जलाओ
अपनी ही राख से
फिर-फिर पैदा हो जाती हैं ...
फिनिक्स जैसी|
कितनी ही बार
अपने ही हाथों क़त्ल किए जाने पर भी
अपने ही रक्त में,
फिर पनप जाती हैं
रक्तबीज-सी|
कामनाएँ .... अमरता का
न जाने कौन-सा वरदान ... या
अपूर्णता का
कौन-सा अभिशाप
साथ लेकर जन्मती हैं|
छिन्न-विछिन्न
अपने घावों को संग लिए
घिसती-भटकती है
अश्वत्थामा-सी
 ..................कामनाएँ

शालिनी रस्तौगी

तू मेरे जीवन का अमृत


तू मेरे जीवन का अमृत, तू  ही है जीवन हाला|
तू ही मधुरस है जीवन का, तू ही है विष का प्याला|
हैं कैसे तार जुड़े तुमसे, क्यों स्वर ये एकाकार हुए,
बन जीवन का गीत कभी, तुम मुझमें साकार हुए,
मन वीणा के तार छेड़, अंतर को झंकृत कर डाला|
तू मेरे जीवन ............
कभी टूटे सुर-से रूठे तुम, कभी मधुयामिनी राग हुए,
प्रीत रंग-रस सरसे तो, कभी जोगी बन विराग हुए,
शीतल मंद बयार कभी, दहके बन करके ज्वाला|
तू मेरे जीवन का अमृत ......

शालिनी रस्तौगी

Sunday, 11 June 2017

आवरण

आवरण
ढूँढ़ते हैं 
छिपाने को 
आदिम रूप हर चीज़ का
डरते हैं 
कहीं प्रकट न हों जाएँ
कामनाएँ
अपने आदिम रूप में
पहना देते हैं उन्हें
सुन्दर, आकर्षक, दिखावटी शब्दों का
भारी-भरकम जामा|
क्योंकि देह हो या विचार
किसी भी हाल
नग्नता स्वीकार्य नहीं ......
समाज को चाहिए
आवरण 

रिक्तता

रिक्तता से भरा मन         

अक्सर
बहुत शोर मचाता है|
जब न कहने को कुछ
न सुनने को बाक़ी हो,
तब अपने-आप से ही
बोलता बड़बड़ाता है|
खुद के दिए तर्क
खुद ही काटता|
बेवजह की सोच पर
वज़ह के किस्से बाँचता,
ख़लिश से कभी
तो कभी ख़ला से
घबराता, खुद से टकराता है|
कितनी बार खुद में डूब-उतर कर
फिर खाली लौट आता है|
जब रिक्त होता है ये मन
 तो जाने क्यों भर जाता है?
शालिनी रस्तौगी 
Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...
Blogger Tips And Tricks|Latest Tips For Bloggers Free Backlinks