Friday, 2 February 2018

समर्पण

तुम्हें पाना असंभव है शायद
या कुछ कमी साधना में है मेरी।
शायद पूर्ण नहीं समर्पण मेरा
आधी-अधूरी है शायद
आराधना मेरी।
क्यों बोल मेरे  नहीं  जाते तुम तक
क्यों शून्य में लय हो जाती
पुकार है मेरी?
क्यों अर्पण मेरा अस्वीकृत होता,
क्यों तिरस्कृत हो जाती
भेंट है मेरी?
तुम ही कहो अब, मेरे देवता !
क्या प्रिय तुम्हें जो
कर पाऊँ मैं?
किस विधि, किस पूजा,
किस उपक्रम से
प्रसन्न प्रिय कर पाऊँ तुम्हें ?
क्या राधा का मैं वेश धरूँ
या मीरा सी जोगन बन जाऊँ मैं?
बन दीपक मैं प्रतिपल जलूँ या
बन शलभ क्षण में जल जाऊँ मैं।
किस राह धरूँ पग, जिस पर चलकर,
हे प्रिय! मैं पा जाऊँ तुम्हें
~~~~~~~~~~~~~
शालिनी रस्तौगी

Saturday, 27 January 2018

शिव ... कैसे हो पाता है संभव तुमसे

शिव
कैसे हो पाता है संभव तुमसे
एक साथ होना
संहारक और संरक्षक
वैरागी और सांसारिक
प्रेम में लिप्त होते हुए निर्लिप्त
सब में होते हुए भी निस्पृह
सम्पूर्ण होते हुए भी असम्पृक्त
जीवन का अमृत, मृत्यु गरल
धारण करना एक साथ 
कैसे हो पाता है संभव तुमसे
शिव .....

Tuesday, 23 January 2018

तुम ही चक्र, तुम ही धुरी। 
तुम ही पथ, तुम ही गति।
मेरे पथ का आदि तुम,
तुम ही हो हर पथ की इति।
अपूर्णता का तुमसे भान,
संपूर्णता का तुम निधान।
मेरा हरेक विधान तुमसे,
तुम ही हो हर एक विधि।
क्यों नहीं उलटता क्रम यह,
क्यों नहीं पलटती यह नियति।
कभी तुम मेरी करो परिक्रमा 
कभी बन रहूँ मैं तुम्हारी धुरी।
~~~~~~~~~
शालिनी रस्तौगी

अभिमन्यु

अभिमन्यु
बनता जा रहा
आज का युवा
अपने ही चारों ओर
अपने ही द्वारा रचित
चक्रव्यूह में
अपने अंतर्द्वंद्वों को झेलता,
खुद से लड़ता,
स्वयं हथियार बन वार करता
स्वयं ढाल बन बचता।
स्वयं छिन्न-भिन्न हो, निशस्त्र होता।
स्वयं रथचक्र बन
स्वरक्षा हेतु घूमता ,
बनता जाता
क्या नियति के हाथों
इस बार भी धराशायी होगा?
या रण विजेता बन
लौटेगा सदर्प?
अभिमन्यु !!
~~~~~~~
शालिनी रस्तौगी

Thursday, 21 December 2017

विदेह


आकर्षित करता है सदा
देह त्यज
विदेह हो जाना
सीमाओं के पार
वर्णन के परे
वचनों के जाल से मुक्त
अनिर्वचनीय, अवर्णनीय, असीमित बन जाना
एक शून्य से
विस्तार अनंत तक
तृषा, क्षुधा, कामना,
दृश्य, गंध, स्पर्श .... इन्द्रियों से मुक्त
चिंतन अनंत बन जाना
कुछ पल, दिन, वर्षों से
काल अनंत बन जाना
आकर्षित करता है .....
~~~~~~~~~~~~~
shalini rastogi 
  


Wednesday, 20 December 2017

सतरंगी है इश्क़ तेरा

सतरंगी है इश्क़ तेरा
जिस्मानी काले से
रूहानी सफ़ेद तक,
हार रंग में सजा है
इश्क़ तेरा
कभी सूफियाना बन
हरा कर देता है दिल की ज़मीं को,
कभी पूजन बन
केसरिया मन कर जाता है|
कहीं मिलन का लाल,
कहीं जुदाई का धूसर,
कभी जलन में जामुनी रंग जाता है
इश्क़ तेरा ...
कहीं आसमानी बन
सागर औ फ़लक तक बिखर जाता है,
कभी गुलाबी मुस्कान बन
होंठों में सिमट आता है,
कभी सितारों की चमक लिए
आँखों में झिलमिलाता है,
कहीं सरसों की पीली बाली-सा
दिल को सरसराता है,
चूनर की धानी धनक से
पायल की रुपहली खनक तक,
हर रंग में नज़र आता है
इश्क़ तेरा
हाँ, सतरंगी है इश्क़ तेरा ....
शालिनी रस्तौगी 
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Tuesday, 3 October 2017

हाइकू

1.
व्याकुल मन
लगे अनगिनत
जिह्वा बंधन|
2.
छाया वसंत
विरहन के मन
पीर अनंत|
3.
जग समझा,
सजन हरजाई
समझत नाहीं|
4.
मुख दर्पण
प्रतिविम्बित होता
मन आँगन|
5.
पीर पराई
समझे जग नाहीं
हँसी उड़ाई|
6.
छिन्न मस्तक
माँगते प्रतिशोध
वीरों के शव|
7.
अपने हाथ
निज शरीर पर
करें आघात|
8.
अलगाववाद
विष बन के फैला
घोर विषाद|
9.
पर भाषा से
निज भाषा की हार
हैं शर्मसार|
10.
भष्टाचरण
मिटे समूल तब
हो जागरण|
11.
राष्ट्र उत्थान
पूर्ण विकास का
हो आह्वान|
12.
हाथ बढ़ा के
माँगते सब हक़
न जाने फ़र्ज़|




Saturday, 30 September 2017

प्राण वायु

प्राण वायु आदर्श की, होती दिन-दिन क्षीण|
मानवता का दम घुटा, बढ़ा स्वार्थ संकीर्ण||
बढ़ा स्वार्थ संकीर्ण, हो किस पर क्या विश्वास|
देते थे जो प्राण, छीनते आज वे श्वास||
नैतिकता औ मूल्य, घायल बिंध लालच बाण|
प्राण-वायु हर गई, अबोध शिशुओं के प्राण ||
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