Wednesday, 23 November 2011

देह से परे

देह की सीमा से परे
बन जाना चाहती हूँ
एक ख्याल
एक एहसास ,
जो होते हुए भी नज़र न आये
हाथों से छुआ न जाए
आगोश में लिया न जाए
फिर भी
रोम - रोम पुलकित कर जाए
हर क्षण
आत्मा को तुम्हारी
विभोर कर जाए


वक्त की सीमा से परे
बन जाना चाहती हूँ वो लम्हा
जो समय की रफ़्तार तोड़
ठहर जाए
एक - एक गोशा जिसका
जी भर जी लेने तक
जो  मुट्ठी से
फिसलने न पाए


तड़पना  चाहती हूँ
दिन - रात
सीने में
एक खलिश बन
समेट लेना चाहती हूँ
बेचैनियों का हुजूम
और फिर
सुकून की हसरत में
लम्हा लम्हा
बिखर जाना चाहती  हूँ


बूँद नहीं
उसका गीलापन  बन
दिल की सूखी ज़मीन  को
भीतर तक सरसाना
हवा की छुअन बन
मन के तारों को
झनझना
चाहती हूँ गीत की रागिनी  बन 
होंठों पे बिखर - बिखर जाना 


जिस्म 
और जिस्म से जुड़े 
हर बंधन को तोड़ 
अनंत तक ..........असीम बन  जाना 
चाहती हूँ 
बस........................................................
यही चाहत 



Wednesday, 26 October 2011

कविता............


दिल के उद्गारों का दमन कर
भावनाओं को पीछे छोड़
विचार पूर्वक लिखी गई
सप्रयास कविता

दिमाग के बोझ से दबी
ह्रदय की दबी – दबी आह सी
भारी भरकम शब्दों के बोझ से
कहराती कविता

बहुत कुछ कह पाने की
कोशिश में
कुछ भी न कह पाती
मन की छिपे भावों को
प्रकट करने को
अकुलाती कविता

अदम्य इच्छाएँ......



रह - रह कर सर उठती हैं 
अदम्य इच्छाएँ 


अचेतन से निकल 
अपने आदिम रूप में ही 
प्रकट होना चाहती हैं 
अदृश्य इच्छाएँ 


तोड़ने को हर बंधन 
रहती हैं आतुर हर पल
बिन सोचे इसका प्रतिफल 
संतुष्टि चाहती हैं 
भ्रम्य इच्छाएँ 


सुनहले ख़्वाब दिखा 
अपने जाल में उलझा 
अजनबी दुनिया में पहुंचा 
मन को भरमाना चाहती हैं 

सुरम्य इच्छाएँ 

Saturday, 8 October 2011

हे करुणामय

करुणामय
करुणा कर , दो विश्वास 
अपनी करुणा के अजस्र स्रोत से 
एक बूँद प्रेम - अमय उपहार 
हाथ थाम तेरी करुणा का 
अज्ञान तिमिर कर जाऊं पार 
करुणा कर , दो यह  विश्वास 

प्रतिपल मन में  फन फैलाते 
अहंकार के विषमय व्याल 
सिर झुकते ही सिर उठाता 
ज्ञान फैला कर माया जाल 
आँख मूंदते ही खुल जाता 
मन में भ्रम का छदम् संसार 

सरल समर्पण सिखला कर तुम 
तोड़ दो ये झूठा  भ्रमजाल 
करुणा कर , दो यह  विश्वास 

बस यूँही



 
जो भी गुज़रा दिल की रहगुज़र से
निशान ए पा अपने छोड़ गया 
हर एक जख्म इस कदर गहरा था कि
ता उम्र  टीस बन रिसता रह गया

Friday, 30 September 2011

अहल्या







एक ऐसी स्त्री की गाथा जिसे संसार ने पाषाण समझ लिया ... वह स्त्री जिसका दोष न होने पर भी उसे पति द्वारा शापित हो वर्षों का एकांतवास झेलना पड़ा ..... समाज के लांछन व पति की उपेक्षा की  झेलती वह अहल्या पत्थर के सामान हो गई 

उसी के बारे में मेरे कुछ उदगार .........


अहल्या
हाँ ,पाषाण नहीं थी वो
श्वास , मद्धम ही सही
चलती तो थी
ह्रदय में हल्का ही सही
स्पंदन तो था
फटी-फटी सी आँखों में भी
एक मौन क्रंदन था......
हाँ,
पाषाण नहीं थी वो.......

खाली दीवारों से टकराकर
जब लौट आती थी ध्वनि उसकी
निर्जन वन में गूँज गूँज
गुम जाती हर पुकार उसकी
धीरे धीरे भूल गए बोलना
मौन अधरों पर फिर भी
एक अनजान आमंत्रण था
हाँ,
पाषाण नहीं थी वो..........

रौंद गया एक काम -रुग्ण
उसकी गर्वित मर्यादा को
कुचला गया था निर्ममता से
उसकी निष्कलंक निर्मलता को
छटपटाती पड़ी रह गयी वह
बाण बिंधी हिरनी सी
चतुर व्याध के जाल में जकड़ी
अकाट्य जिसका बंधन था
हाँ
पाषाण नहीं थी वो ......

हा!      
समाज का कैसा न्याय
पीड़ित पर ही आरोप लगाये
था कौन व्यथा जो उसकी सुनता
अपनों ने भी जब   
आक्षेप लगाए
कितना पीड़ाहत उसका मन था
बतलाती वो क्या किसको
विह्वल चीखों पर भी तो
समाज का ही तो नियंत्रण था

हाँ
पाषाण नहीं थी वो ......

धीरे-धीरे सूख गया फिर 
भाव भरा मन का हर स्रोत  .
शुष्क हुए भावों के निर्झर 
रसहीन हृदय ज्यों सूखी ताल ,
दबा दिया फिर शिला  तले
हर कामना का नव अंकुर  .
साथ किसी का पाने की 
इच्छा का किया उसने मर्दन था 

हाँ
पाषाण नहीं थी वो ......

चहुँ ओर से जब मिट गई 
आशा की क्षीणतम ज्योति भी 
हर मुख पर फ़ैल गई जब 
विरक्तता की अनुभूति  सी 
हर पहचान मिटा कर अपनी 
कर लिया स्वयं को पाषण समान 
पर उसके अंतस में ही
हाँ 
धधक रहे थे उसके प्राण 
निराशा के छोरों के मध्य 
मन करता उसका अब दोलन था 

हाँ
पाषाण नहीं थी वो ......

हुई राममय ,
रमी राम में ,
राम भरोसे सब तज डाला .
नहीं किसी से कुछ भी आशा 
अब और नहीं कुछ संबल था 

तप की चिता में तप-तप 
तन उसका हुआ जैसे कुंदन था 
हाँ
पाषाण नहीं थी वो ......


नहीं सुनी दुनिया ने उसकी
करुण कथा पर दिए न कान 
कोई समझे या न समझे 
पर समझे वो दयानिधान  
करुणा कर, करुनानिधान ने 
किया कलुष सब उसका दूर 
निज निर्मल स्पर्श से उसका 
शाप  कर दिया पल में चूर 
शिला खंड में मानो जैसे 
लौट आये थे फिर से प्राण 
हाँ .......................अब पाषण नहीं थी वो 














Friday, 23 September 2011

मसरूफियत.......



मसरूफियत के इस दौर में यारों!
दोस्ती भी इतनी आसान नहीं होती .
सामना भी हो जाए गर कभी तो 
नज़रें मिलती हैं  पर बात नहीं होती .


दूसरों से शिकायत क्या करें ,
क्या करें न मिलने का शिकवा.
अब तो हालात ये हैं कि अपनी भी,
खुद से ही मुलाकात नहीं होती.


कौन सुने  औरों के अफ़साने  
वो किस्सागोई, वो यारों की मजलिस 
यहाँ दिमाग दिल की नहीं सुनता
और दिल की दिमाग से गुफ्तगूं नहीं होती .

Sunday, 18 September 2011

हमारी हिंदी

      एक मित्र ने हिंदी बोलते समय कुछ अंग्रेजी शब्दो के प्रयोग पर कड़ी आपत्ति की, मन  को यह बात बहुत चुभी, हिंदी कोई मृत भाषा नहीं .....यह तो अत्यंत जीवंत भाषा  है जिसमें अनेक भाषाओँ के शब्दों को स्वयं में समाहित करने की क्षमता है ....अन्य भाषाओँ के  शब्दों को हटा दिया जाए हो हिंदी ही न बचे .......किसी भाषा से उसकी व्यावहारिकता का गुण छीनना एक अपराध है ...........

संस्कृत की गंगोत्री से निकली 
हिंदी गंगा की धारा
अमय रस से अपने 
जन- मन सिंचित कर डाला
सब को समाहित कर स्वयम् में
हुई विस्तृत इसकी धारा 
किसी भाषा ने  इसके 
प्रवाह में अवरोध न डाला,
फिर क्यों कुछ रूदियों में बांध कर 
इसकी गति में रोध हम डाले 
भाषा से सहजता का गुण छीन 
क्यों किलिष्ट उसे कर डाले

कितनी ही जलधाराओं को 
खुद में समेट
गंगा गंगा ही रहती है 
वैसे ही कुछ शब्दों के प्रभाव से 
हिंदी क्या हिंदी न रहती
तो
संकुचित  मानसिकता को त्यज 
भाषा को दें व्यावहारिक रूप 
सुन्दर है यह भाषा इतनी 
ना बनाएँ इसको दुरूह 





  

Sunday, 28 August 2011

ये मशाल न बुझने देना 

मंजिल नहीं ये एक कदम है 
दूर लक्ष्य और जटिल डगर है
थक कर रुकना अभी नहीं संभव है
दूर गगन छूने  से पहले 
ये परवाज़ न रुकने देना

युगों तक छाये  घोर तिमिर की
लंबी काली अमावस रात्रि 
मानस को कर चुकी ग्रसित है
जो सुलगी है इस निशा नाश को
ये मशाल न बुझने देना 

आज चले  जो कदम अनगिनत 
कोटि कंठों से फूटी स्वरधारा 
हर दिल से अब  गूँज रहा है
वन्दे मातरम का ही नारा 
जन जन में अलख जगाने को
ये इन्कलाब न दबने  देना

पूर्ण परिवर्तन के वास्ते, 
जन प्रतिकार अभी चाहिए.
करने को संधान लक्ष्य का,
सतत तपस्या अभी चाहिए.
जब आग न पूरी भड़के ,
चिंगारी मद्धम न होने  देना.

ये मशाल न बुझने देना 

Saturday, 23 July 2011

जो मैं भी कविता लिख पाती


मन के उलझे से भावों का
इक ताना बाना बुन पाती ,
साँसों की सरगम पे कोई
गीत नया सा रच पाती ,
तो मैं भी कविता लिख पाती ......

पर पारे जैसे भाव मेरे , हाथ कहाँ आ पाते हैं .
रेत पे बनती रेखाओं से , बनते - मिटते जाते हैं .
कल्पना के घन कानन में , कस्तूरी मृग सा भटकाते हैं.
प्रतिपल रूप बदल अपना , माया से  भरमाते हैं ,

इन्द्रधनुष का छोर पकड़ , जो मैं भी ऊपर चढ पाती
तो मैं भी कविता लिख पाती ........

मरुस्थल में जल के  भ्रम से , दूर कहीं दिख जाते हैं .
चंचल चपला से चमक दिखा , घन अवगुण्ठन में छिप जाते हैं ,
इक पल लगता कि हाथ बढ़ा के , मुट्ठी में भर पाऊँगी,
पर कागज तक आते -आते, फिर शब्द कहीं खो जाते हैं 

इन आडी तिरछी रेखाओं से , जो चित्र कोई में रच पाती ,
तो मैं भी कविता लिख पाती ......... 


Monday, 4 July 2011

स्वेच्छाचारी विचार

लहरों की तरह मन में 
सर उठाते विचार
घन बीच तड़ित से
कौंधते बार बार.
सिरा पकड़ने की कोशिश में
हर बार हाथ से
सिकता ज्यों फिसल जाते
 जल में  मीन बन जाते
हाथ न आते विचार

एक  दूसरे  को  काटते 
मचाते घमासान द्वंद्व
मन की कोमल भावनाओं  पर  
करते  जाते कठोर प्रहार


 तोड़ कर नियंत्रण की हर सीमा 
पागल, बेलगाम अश्व से,
बेखौफ पार कर जाते 
हर बंध,   हरेक दीवार.


सोचती मैं कभी तो,
 रख पाऊँगी इन्हें अपने वश में,
मुंह चिढ़ा आगे बढ़ जाते
छोड़ जाते मुझे लाचार .


न कोई आदि है इनका न अंत
न कोई सीमा न बंध
कामनाओ  के  विस्तृत नभ  में
पक्षियों से स्वेच्छाचारी विचार


Saturday, 11 June 2011

अवसाद के पल
 अवसाद .... या dipression ... हर शख्स अपनी ज़िन्दगी  में कभी न कभी मायूसी के कुछ लम्हात को झेलता ही है ... तब तमाम कायनात उसे फीकी सी नज़र आती है .... इस क्षण को कविता के रूप में

आखिर कब तक

जीने का अर्थ
क्या सिफ जीना
और सांस लेते जाना
उधर मांगे से पलों में
एक सांस भी अपनी न पाना
अपनी ही लाश
कंधे पर लादे
सफ़र ख़त्म होने के इंतज़ार में
बस चलते चले जाना
हमसफ़र के धोखे में
अकेले ही
सफ़र तय करते जाना
मायूसी की   सियाह रात में ,
रोशनी का एक कतरा तलाशते हुए 
बदहवास से जागते जाना
एक सवाल
जो हरदम मुंह बाएं खड़ा रहता है
उससे नज़रे चुरा
बच के निकल जाना
आखिर कब तक
उठाएंगी बोझ साँसें
इस उधार की  गठरी का
कभी तो थकेगा ये तन
जीने का दिखावा करते करते

 

Friday, 10 June 2011

आफताब हूँ


आफताब हूँ ,ताउम्र झुलसता - जलता रहा हूँ
पर सौगात चांदनी की तुझे दिए जा रहा हूँ मैं .
रातों के सर्द साए तेरे आंचल पे बिछा,
खुद फलक से दरिया में छिपा जा रहा हूँ मैं .
जलें न मेरी रौशनी  कहीं चश्म ए तर तेरे ,
सितारों की बारात सजाये  जा रहा हूँ मैं.


Tuesday, 7 June 2011

                        

फूला पलाश 

प्रिये!
जब तुम प्रथम बार मिले थे,        
तब भी फूल रहा था
जंगल में चहुँ ओर पलाश 
रक्तिम पुष्प
बने थे साक्षी,
अपने प्रथम मिलन के
पुष्पों की लाली  छितर गई थी,
दोनों के आनन पे
दूर तक फैले पेड़ों के
गलियारे में,
फूलों के गलीचे पे
साथ-साथ चहल कदमी करते,
जब कभी छू जाता था
औचक ही हाथ तुम्हारा,
सिहर सिहर उठता था ये तन,
पुलकित हो रहता मन बंजारा 
हवा के एक चंचल झोके ने
लाल पुष्प एक ,
अटका दिया था 
केशों में मेरे जब,
सम्मोहित हो, वो अपलक
देखना तुम्हारा,
और मेरा खुद में ही 
सिमट - सिमट जाना
याद अभी हैं वो बेसुध शामें,
काटी थी अक्सर
इसी पलाश तले
एक दूजे की आँखों में खोये,
कुछ न कह, सब कुछ कहते
यही पलाश तो रहा हमारे
मूक प्रेम का , मूक साक्षी
दिन बदले, मौसम बदले
ऋतु आई और ऋतु बीती
फिर आने का वादा कर
जो गए प्रिये तुम एक बार
कितनी ही बार
फूला और झरा है 
इस जंगल में
लाल पलाश
                                                  

Sunday, 5 June 2011

तुम कहते हो

तुम कहते हो तो......        
झूठ ही होगा   
 साँसों की  हलचल, दिल की धड़कन
जीने का सलीका हम क्या जाने ?
नज़रों में तुम्हारी  था महज़ जुनूँ एक 
तो  प्यार नहीं   दीवानापन  होगा 

वो कसमें वादे, शिकवे वो शिकायत
आहें भरना ,  भरोसा  दिलाना
दिल नहीं दिमाग का  खेल था वो 
तुम कहते हो तो  शायद सौदा  ही होगा

( उर्दू शायरी मेरे लिए कुछ नहीं बहुत मुश्किल है .... फिर भी एक प्रयास किया है ....)

जीवन की परीक्षा में



परीक्षा में बैठे , परीक्षार्थियों से 
प्रश्न पत्र को उलटते पलटते 
उत्तरों को अपनी यादों में टटोलते 
कभी खिन्न , कभी प्रसन्न.
घडी की सुइयों के साथ दौड़ लगाते
परिणाम की कभी आशा 
और कभी आशंका लिए 
परीक्षार्थियों से हम 
जीवन रुपी परीक्षा में
पल पल परीक्षा देते
अंतर मात्र इतना ही
उनके सामने हैं प्रश्न पत्र
और ज़िन्दगी हमारे आगे
रोज़ एक नया प्रश्न उठाती
और बिना पूर्व तैयारी के ही
उतर पड़ते हैं मैदान में
हर क्षण अनुत्तीर्ण होने की
आशंका लिए
करते जाते हैं हल
ज़िन्दगी के अनोखे
अनुत्तरित पल ........


Saturday, 4 June 2011

पागल मन



कितना अच्छा होता ,
जो खाली होता ये मन
अनंत, अनादि, शून्य गगन सा,
न कोई हलचल न कोई तड़पन

पर व्योम नहीं ये तो सिन्धु है,
भावों के रत्न लिए अंतस  में,
हरदम  मंथन  को  प्रस्तुत,

चढ़े ज्वार की उन्न्मत्त लहरों सा 
सानिध्य चन्द्र का पाने को आतुर 

व्याकुलता के ज्वालामुखी में 
पल पल तडपे , पल पल सुलगे 
कुछ पल मैं भी चैन से जीती 
छोड़ता जो ये पागलपन 

कितना अच्छा होता..........   

Wednesday, 1 June 2011

अनजानापन





न देखा तुझे , न जाना , न पूछा तेरा पता कभी,
न मिलने की  कोई तमन्ना , न वफ़ा की आरज़ू कोई, 

जान- पहचान की अनगिनत बंदिशों  को तोड़ के,  
अनजानापन ही तेरा, अब  बन गई तेरी पहचान नई

न कोई चाहत का जज्बा , न वादा  फरोशी की तमन्ना 
न बेवफाई  का शिकवा   , न वफ़ा  की उम्मीद  कोई .

उम्र ए रहगुज़र पे फकत चाँद लम्हात का हम सफ़र 
गुफ्तगूँ के कुछ हसीं किस्से , दिलफरेबी की कुछ कहासुनी .

आवाज़ की एक अनजानी दुनिया , चेहरों की भीड़, जिस्मों का हुजूम 
रिश्तों की अनगिनत दीवारों में , खुल गई खिड़की अनदेखी नई  

कैनवास


मन का कैनवास 

कभी रंगीनियों से भरा
हर तरफ खुश रंग ख्यालों से सजा 
कभी काले धूसर उदास से सायों से घिरा  
कभी हर रंग पर बेरंग
 वितान तन जाते हैं 
और कभी इन्द्रधनुष से 
शादाब गुल खिलखिलाते हैं 
कभी बीते  लम्हें निशाँ
 अपने छोड़ जाते हैं 
तो कभी आने वाले पल 
खाका अपना खींच जाते हैं 
पर यह  कैनवास 
कभी कोरा नहीं रहता 
साँसों की डोर से बंधी ये कठपुतलियां
नाचती रहती हैं 
टूटती नहीं जब तक
साँसों की डोर   

Saturday, 28 May 2011

समय

समय


रेत की मानिंद
हाथों से फिसल जाता है
कभी बन के  पत्थर
राह में अड़ जाता है


कभी बीत जाते है सालों
ज्यों बीता हो एक पल
कभी एक पल बीतने में
 सालों लगाता है


बन कभी मरहम ये
भर देता है पुराने ज़ख्म
कभी कुरेद पुराने ज़ख्मों को
ये नासूर बना जाता है


जीता वही शख्स जिसने
पा लिया इसपे काबू
वर्ना तोह यही लोगों को
अपना गुलाम बनाता है


यही वख्त  कभी बढ़ के खुद
खोल देता है नई राहें
और कभी हरेक राह पर
दीवार नई उठाता है


क्यों कर ना हो मगरूर
क्यों किसी के आगे झुके
ए दोस्त हर शै को ये
सामने अपने झुकाता है

Friday, 27 May 2011

दम तोड़ती संवेदनाएँ


सुना है 
संवेदनाओं का युग                                     
समाप्ति की कगार पर खड़ा 
खड़ा कर रहा है इंतजार 
अपने ख़त्म होने का 
विह्वल हो देख रहा 
लोगों में 
दम तोडती संवेदनाएँ 

बीच सड़क,  निर्वस्त्र पड़ी  

घायल  लड़की के 
जिस्म से टपक रहे खून को 
नज़रंदाज़ कर 
आगे बढ़ गई थी तब 
आज क्यों उबाल पर हैं 
इस कायर समाज की 
नपुंसक  संवेदनाएँ

अबोध बालिका के साथ

बलात्कार की  खबर को ,
सरसरी निगाह से पढ़कर 
अखबार में छपी 
अधनंगी तस्वीरों पर 
आँखों से लार टपकाती 
कुत्सित भावनाएँ 

खाने की मेज़ पर , 
जायकों के बीच
टी.बी. पर आते समाचारों में 
बम धमाके में घायल हुए 
लोगों की चीखों को 
निर्मम हो सुन रहीं 
बहरी संवेदनाएँ 

सड़क पर  पड़े 
घायल अधमरे इंसान के 
चारों  ओर इकट्ठे हुजूम में 
किसी एक हाथ के बढ़ने के इंतज़ार में 
आँख मूँद रही ज़िन्दगी के साथ 
अंतिम साँसें गिन रहीं 
मरणासन्न संवेदनाएँ

भूख से  व्याकुल  कुलबुलाते पेटों पर ,
बम धमाके से उड़ते चीथड़ों पर ,
आग में जले सुलगते जिस्मों पर,
निज क्षुद्र स्वार्थ की रोटियां  सेकते नेताओं की 
माँस पर झपटते गिद्धों  सी 
वीभत्सतर होती जाती 
घृणित संवेदनाएँ

Thursday, 26 May 2011

विश्वास .........

विश्वास 
जब कभी  टूटने लगती है 
विश्वास की डोर 
और भ्रमित मन 
बेलगाम भागने लगता है 
उलझती सी जाती है  अनगढ़ आस्था 
गर्वोंन्मत्त  मस्तिष्क
तर्क वितर्क वांचने लगता है
डगमगाने सी लग जाती है 
अटूट भक्ति जब 
दुस्साहस भर मन प्रश्न उठाता
उस अदृश्य शक्ति पर 
तब 
उस अज्ञान तिमिर में 
कौंध जाते बन ज्ञान रश्मि तुम
और अंतहीन भटकाव को दे जाते
आस्था का सहारा तुम
हौले से सहला अपने अमृत स्पर्श से
श्रद्धा को दे जाते नवजीवन
हर पल हर कण में तुम उपस्थिति   को अपनी
तुम आभासित कर जाते हो
विश्वास के टूटते छोर
और कस जाते हो
    हाँ ................. मैं हूँ 
                          यह विश्वास दिलाते हो !!!

Wednesday, 25 May 2011

.संशय


जब हमारी कल्पना शक्ति संकल्प शक्ति में परिणत   हो  जाती है, तो मन कल्पवृक्ष बन इच्छित फल देने लगता है और  जब तक मन में संशय रहता है तब तक हम संकल्प नहीं ले पाते........... इन्हीं भावों को कविता के रूप में प्रस्तुत करने का एक प्रयास ...............संशय
जीवन के वृक्ष से लिपटी 
संशय कि बेल
साथ लिए दुविधा के फल
बांध  देती है कितने ही
जीवन के अनमोल सरस पल
और आशंका की जकड़ में  
घुटता रह जाता है ........... व्याकुल मन 
भविष्य की चिंता में
फिसल जाते हैं हाथ से                                      
वर्तमान के कितने ही
मधुर- मधुर, मदिर क्षण 
आशंका के काले घन
छिपा लेते है घनी ओट में 
आशा की क्षीण रुपहली किरण 
संशय को तोड़
आशंका को छोड़
जो तोड़ पाते हैं ये बंधन 
उनके लिए ही फैला है ............उन्मुक्त गगन का............ विस्तृत आँगन
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