Tuesday, 25 July 2017

हसरत नई हर रोज़ ही मचलती तो है


इस मोड़ से इक राह भी गुजरती तो है
दिल से तेरे हम तक जो पहुँचती तो है .

किस्मत तो किस्मत है, यकीं न इस पे करना
किस्मत हरेक की नए रंग बदलती तो है

सिर लाख कुचलो दिल में उठती हसरतों का पर
हसरत नई हर रोज़ ही मचलती तो है

कूँचा ए मैकदे से गुज़ारना संभल के तुम
गुजरो इधर से जब नीयत बहकती तो है .

लाचारियों की राख के अन्दर दबी हुई
आक्रोश की इक चिंगारी सुलगती तो है

इन्तेहा जुल्मों की ये देख अपनी जात पे
भीतर ही भीतर ये जमीं दहलती तो है .
~~~~~~~~~~~~~
शालिनी रस्तौगी 
(चित्र गूगल से साभार)


Monday, 24 July 2017

विद्रोही स्वर


विद्रोही स्वर
मन की खामोशियों को तोड़
विद्रोही हो उठते हैं स्वर|
रगों में लहू के साथ
दौड़ती चुप्पी के विरुद्ध
आवाज़ उठाना चाहते,
हर बंधन को काट
मुक्त हो
विद्रोह करना चाहते स्वर|
चेतना के अदृश्य
बंधन से मुक्त हो
करना चाहते अनर्गल प्रलाप |
मिथ्या संभ्रांतता के
जाल से निकल
उच्छृंखल हो जाना चाहते
विद्रोही स्वर|

मज़ाक अच्छा है

जो कहूँ मैं वो गलत, तेरा बयान अच्छा है।
जाने कैसे तुम लगाते हो, हिसाब अच्छा है।
रक्स, महफ़िल, मय, हँसी के दरमियाँ सुना है ,
याद हम तुमको बहुत आए मज़ाक अच्छा है।
महफिलों में चर्चा तर्के ताल्लुक का है अपने,
आजकल मेरे रक़ीबों का मिज़ाज अच्छा है।
~~~~~~~~~~~~
शालिनी रस्तौगी

Sunday, 2 July 2017

स्वप्न और आँख

कुछ सपनों की
आंखों से नहीं बनती,
स्वप्न पूरा होने से पहले ही आंखें
खोल देती हैं पलकें
क्योंकि
आंखें हक़ीक़ी दुनिया की हैं
और सपने तिलिस्म दिखाते हैं...

Friday, 30 June 2017

सवैया गायन (video)



(आज सूरजभान डी. ए. वी. पब्लिक स्कूल , वसंतकुंज, दिल्ली में तीन दिन की शिक्षण संवर्धन कार्यशाला में शिक्षण संवर्धन कार्यशाला के दौरान कुछ हल्के फुल्के पल ) 
रस प्रीत सखी सब सूख गया, मरुभूमि बनी मन भू सगरी|
दिन-रैन झरे अँखियाँ जलधार, रहा मन शुष्क, कहाँ रस री|
मन अंकुर प्रीत फलै-पनपे, मुरझाय रहा सगरा वन री|
बदरा बन आस-निरास ठगें, झलकें, छिप जाएँ करें छल री|

Tuesday, 27 June 2017

पुर्ज़े कागज़ के नहीं, अर्ज़ियाँ हैं|

फैंक दीं तुमने जो बेकार समझ के
पुर्ज़े कागज़ के नहीं, अर्ज़ियाँ हैं|

ये जो तुम अहसां दिखा के कर रहे हो,
प्यार तो नहीं तुम्हारी खुद्गार्ज़ियाँ हैं|

कारनामें जो कल किए थे तुमने,
आज अखबारों की वो सुर्खियाँ हैं|

ज़िम्मेदारी से अभी नावाकिफ़ हो
ज़िन्दगी में अभी बेफिक्रियाँ हैं|

बाप की नज़रें जो धुंधलाईं ज़रा,
बढ़ गई बेटे की गुस्ताखियाँ हैं|

फ़िक्र समझते रहे जिसको हम,
दरअसल वो तेरी फिरकियाँ हैं|


Saturday, 24 June 2017

रंगों की पत्रकारिता

आप रंगों की पत्रकारिता करते रहिए।
प्रत्येक रंग पर 
किसी राजनैतिक दल का
ठप्पा लगाइए
और फिर रंग से जोड़कर 
घटनाओं को मनचाहा जामा पहनाइए।
रंगों के धर्म बताइए
एक रंग को दूसरे का विरोधी बताकर
आपस में और रंगों से
लड़ने के लिए उन्हें उकसाइए।
फिर वो एक रंग
जो जमीन पर बहे
उस रंग को लेकर फिर हाहाकार मचाइए।
किसी रंग को कभी चाटुकारिता का
तो किसी को आक्रामकता का
पैरोकार बताइए।
आखिर ..... ऐसे ही तो कोई धर्मनिरपेक्ष नहीं बन जाता।

हत्या या आत्महत्या ........?

पेड़ पर लटकी रस्सी
या सल्फास की गोली
नहीं थी कारण
उसकी मृत्यु का.... 
कुछ मौसमों ने साज़िश की
कुछ बाज़ार ने घेराबंदी की
कुछ वादों का जहर उसे पिलाया गया
कुछ कर्ज़ों के पत्थरों से कुचला गया
तब कहीं जाकर
किश्तों में
हत्या हुई थी उस किसान की
और नाम दिया गया
आत्महत्या....?
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