Wednesday, 3 June 2015

तल्खियाँ ( gazal)


हालात अक्सर ज़ुबानों पर, तल्खियाँ रख देते हैं,
रेशमी से अहसास पर ये, चिंगारियां रख देते हैं .
मुश्किल नहीं इस कदर यूँ तो, ये बयाँ जज़्बात का
ये लफ्ज़ आ बीच में क्यों, दुश्वारियाँ रख देते हैं.
मासूमियत छीन कर ज़ालिम, दाँव ये ज़माने के
भोले भाले से चेहरों पर, अय्यारियां रख देते हैं.
इक बार फिर जी लें जी भर, बचपन का वो भोलापना.
कुछ पल को इक ओर अपनी, हुशियारियाँ रख देते हैं.
दीवार क्यों ये अना की, आए हमारे बीच में,
कुछ भूल जाओ तुम, परे हम, खुद्दरियाँ रख देते हैं. 

Wednesday, 15 April 2015

बेमौसम बरसात (दोहे)



धरती माँ की कोख में, पनप रही थी आस |

अग्नि बन नभ से बरसा, इंद्रदेव का त्रास ||



व्याकुल हो इक बूँद को, ताके कभी आकास|

कभी बरसते मेह से, टूटे सारी आस ||

Friday, 27 March 2015

उथल - पुथल


उथल पुथल तो होनी ही थी
आखिर
बाशिंदे थे हम 
दो अलग दुनियाओं के 
न कभी एक थी हमारी धुरी 
न एक क्षितिज अपना 
अपने अपने केंद्र के गिर्द ही 
घूम रहे थे हम| 
प्रत्याकर्षण 
न नियति थी अपनी 
न प्रकृति 
अपने गुरुत्वाकर्षण के विरूद्ध जा 
तोड़े थे हमने नियम 
तो 
सारी कायनात में 
मचनी थी 
उथल पुथल 

Tuesday, 10 March 2015

सूत्र

कितने सूत्र 
गुंथे परस्पर 
और बन गयी 
एक डोरी 
बंध गए 
मजबूत बंधन 
और फिर किसी एक बात पर 
ज़रा से अविश्वास पर 
चटक कर टूटा क्या एक सूत्र 
ढीले पड़ गए सब 
रिश्तों के बंध 
बेगाने बनते गए यूँ सम्बन्ध
लो देख लो कैसे 
एक एक कर 
टूट गए 
जाने कितने सूत्र 


मैं चल रही थी


मैं चल रही थी 
साथ लिए 
न जाने कितने भँवर 
पैरों में 
और कितने सैलाब 
आँखों में
सर उठते थे मन में
न जाने कितने तूफां
हर बार
भीतर से उठती लहर कोई
बहा ले जाती मुझे
मुझसे ही दूर ... बहुत दूर
आशंकाओं के झंझावात तो
उठ रहे थे भीतर
सब कुछ उथल पुथल
सब बिखरा हुआ
वर्ना बाहर तो था सब
शांत , अडोल, अविचल
बस एक अकेली ... मैं
चल रही थी 

Friday, 27 February 2015

मैं देह , तुम प्राण

मैं देह , तुम प्राण
अनुभव होता है आजकल 
देह का प्राण से विलग होना 
बड़ी ही जटिल है ..  यह प्रक्रिया
आखिर रोम-रोम हम बंधे  हैं साथ 
हर बंध टूटने का अहसास 
तड़पा देता है 
कर देता विह्वल 
हर साँस देह में अटक कर 
कुछ और रुक जाना चाहे है 
थाम लेना चाहती है देह 
प्राणों के संसर्ग को 
कुछ और पल .... कुछ और क्षण 
जैसे तुम्हारे कदमों से बंधे हैं 
मेरी साँसों के धागे 
दूर जाता तुम्हारा हर कदम 
क्षीण कर जाता जीवन की आस 
आखिर .. मैं देह , तुम प्राण !


Thursday, 26 February 2015

आत्म साक्षात्कार


आत्म साक्षात्कार
मुश्किल होता है बड़ा
करना अपना सामना
दूसरों का सामना तो फिर भी
बखूबी कर लेता इंसान
कुछ दिखावटी व्यवहार,
कुछ बनावटी मिठास
वो आत्मीय मुस्कराहट
न जाने कितनी सामग्रियों से सज़ा कर
पेश करते खुद को
दुनिया के दस्तरख्वान पर
एक लज़ीज़ पकवान की तरह
लगाता नुमाइश अपनी
गिनवाता अपनी खूबियाँ
अपने आदर्श, सभ्य, नैतिक  रूप के पीछे
छिपा जाता हर बार
अपना वह आदिम मूल स्वभाव
पर खुद से कहाँ छिपा पाता है खुद को
यह वो आइना  है जहाँ
वह और उसकी आदिम इच्छाएँ
होते हैं रू-ब-रू  ... बे-लिबास
जहाँ खुद के आदर्श, मूल्य, नैतिकता
उसे ढोंगी ठहरा करते हैं अट्टहास
खूबसूरत मुखौटे
नोच फैंकती हैं  उंगलियाँ
तब वह खुद ही आइना और खुद ही अक्स बन जाता
खुद अपनी ही आवाजें
कसती हैं तंज
तब खुद को ही बहला- फुसला कर
किसी तरह चुप करा कर
मन की कब्र के नीम अँधेरे में
कर देते हैं दफ्न
क्योंकि मुश्किल बड़ा है
खुद को देखना,सुनना
और करना आत्म-साक्षात्कार







Monday, 23 February 2015

मैं मौन बाँचती हूँ


तुम शब्द ढूँढते हो, मैं मौन बाँचती हूँ |
शब्दों की कैद में कब, मैं भाव बांधती हूँ |

शब्दों के दायरे में, भावों को बांधना क्यों?
नाप-तोल करके, ये प्रेम आंकना क्यों ?
तुम प्रेम-प्रेम कहते, मैं मन में झांकती हूँ |
तुम शब्द ढूँढते हो, मैं मौन बाँचती हूँ |

सागर की लहरों पर ज्यों बाँध का बनाना ,
आँधियों  को  जैसे,  हो  रास्ता  बताना ,
भावों पे शब्दों के, कब पाल तानती हूँ ?
तुम शब्द ढूँढते हो, मैं मौन बाँचती हूँ |


तुम आँखों से प्रेम कहना, आँखों से मैं सुनूँगी'
उस मूक प्रेम पल को, रह मूक ही गुनूँगी ,
मोती सा हरेक पल वो, आँचल में टाँकती हूँ|
तुम शब्द ढूँढते हो, मैं मौन बाँचती हूँ 

शब्दों की स्याही जब, भाव पे जम जाए,
दिन से उजले भावों को, रात-सा बनाए,
दिन उजाला करने को मैं रात माँझती हूँ|
तुम शब्द ढूँढते हो, मैं मौन बाँचती हूँ 

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