Wednesday, 19 March 2014
Saturday, 15 March 2014
निमित्त और नियंता
नियंता
बनना चाहता है क्यों
जबकि ज्ञात तुझे भी
है यह सत्य
मात्र निमित्त है तू
नियंता तो है कोई और
फिर क्यों जीवन रथ की लगाम
थामने की कोशिश
बार-बार
पगले! नहीं जानता तू
नहीं सधेंगे तुझसे
ये भाग्य अश्व
अपनी गति से चलेंगे
अपनी दिशा में मुड़ेंगे
हाँ! इन अश्वों की वल्गा
थामे है वो नियंता
तू पार्थ
तू मात्र कर्म का अधिकारी
ताज भाग्य का मोह
अब खींच कर्म प्रत्यंचा भ्रुवों तक
रख लक्ष्य केंद्र में
मस्तक पर छलकें स्वेद हीरक
तब जगमग होगा भाग्य स्वतः
कर्म निर्मित रेखाएं देख
बदलेगा भाग्य तुम्हारा
स्वयं नियंता
Monday, 24 February 2014
Tuesday, 18 February 2014
प्रेम पगी रस में लिपटी, हर बात (सवैया - मत्तगयन्द)
Monday, 10 February 2014
औपचारिकताएँ
औपचारिकताओं में अक्सर
खो जाता है .... अपनापन
सम्बन्ध खोने लगते हैं मायने
मंद पड़ जाती है
रिश्तों की ऊष्मा
दम तोड़ देती है ..आत्मीयता
और शेष रह जाती हैं
सिर्फ
ठंडी, उबाऊ
औपचारिकताएँ ....
Monday, 3 February 2014
उपेक्षित
देखा है कभी
किसी दरख़्त को
जीवन का रस खो
ठूंठ में बदलते हुए
गर्वोन्मत्त शाखाएँ
जब एक एक कर होती
हैं
हरित श्री से विहीन
कैसे होता है
मान-मर्दन उसका
पीली पड़ती पत्तियां
जब
छोड़तीं साथ एक-एक कर
कैसे पल-पल छीजता है
उसका अस्तित्व
जमीन छोड़ देती है
जब साथ जड़ों का
उभर आती हैं धरती की
त्वचा पर
बुढ़ापे में उभरी
नसों-सी
फिर भी न जाने
किस जिजीविषा से
अपनी कंपकपाहट को
टाँगों में समेट
खड़ा रहता है मूक
दर्शक बन
परिवार के उपेक्षित
वृद्ध सम
मानो पूछता हो
हमेशा दिया ही तुमको
क्या माँगते हुए
देखा है कभी
Sunday, 2 February 2014
मैं शायर तो नहीं (ग़ज़ल)
अश्कों की स्याही से, दिल के जज़्बात
लिखते हैं,
कभी अपने तो कभी ज़माने के हालात लिखते हैं,
कौन कहता है कि अपनी ही धुन में मगन हैं वो
हर वाकये पे नज़र रखते, ख्यालात लिखते हैं .
ग़मों का चलाते हैं कभी मुसल्सल कारवाँ,
तो कभी ढेर खुशियों कि बारात लिखते हैं.
मुआमला सियाती हो, रूहानी कि जज्बाती,
हर मामले पे शायर तो, हजरात लिखते हैं .
बेखबर खुद से हों चाहें न खबर हो अपनों की,
ज़माने भर कि मगर ये, मालूमात लिखते हैं.
फूलों कि महक, हवा के रंग, दरिया की रवानगी
कागज़ के टुकड़े के सारी, कायनात लिखते हैं ..
कभी अपने तो कभी ज़माने के हालात लिखते हैं,
कौन कहता है कि अपनी ही धुन में मगन हैं वो
हर वाकये पे नज़र रखते, ख्यालात लिखते हैं .
ग़मों का चलाते हैं कभी मुसल्सल कारवाँ,
तो कभी ढेर खुशियों कि बारात लिखते हैं.
मुआमला सियाती हो, रूहानी कि जज्बाती,
हर मामले पे शायर तो, हजरात लिखते हैं .
बेखबर खुद से हों चाहें न खबर हो अपनों की,
ज़माने भर कि मगर ये, मालूमात लिखते हैं.
फूलों कि महक, हवा के रंग, दरिया की रवानगी
कागज़ के टुकड़े के सारी, कायनात लिखते हैं ..
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