Saturday, 13 April 2013

देखि ढिठाइ ..सवैया ( मत्तगयन्द)



देखि ढिठाइ कभी उनकी, तनि लाज भरी सकुचाय खड़ी हैं|
आँचल सो मुख ढाँपि लियो, नत नैन करै शरमाय जड़ी हैं|
ऊपर-ऊपर रार करैं पर, भीतर वे हरषाय बड़ी हैं|
कान्ह लखी सखियाँ सगरी, उनपे सब नेह लुटाय पड़ी हैं|

Friday, 12 April 2013

नैन


सवैया  (मत्तगयन्द )

कोटि कला कित सीखि सखी, इन नैनन ने नित वार करै की|
कौन अहेरि सिखाय दियो सखी, ऐसन युक्ति सिकार करै की|
बैनन सीख रहे नव जानत, मूक कला तकरार करै की|
बान कमान अनंग छुटै जब, जाय लगे हिय मार करै की|

Thursday, 11 April 2013

रिश्ते ... ( श्रंखला -3 )


रिश्ते ...
गीली मिट्टी से 
समय के चाक पर धरे 
गढे जाते हैं 
बहुत प्यार से 
अनुभव की उँगलियों से 
आकार पाते
भीतर - भीतर
भावों से सहार पाते
गढे जाते हैं
रिश्ते
घर-परिवार के आवे में
पकते
सौंधी सी महक फैलाते
धीमे-धीमे
पकते जाते हैं
रिश्ते .....

Sunday, 7 April 2013

तो क्या ...........


पैरहन हो बादशाही, चेहरा नूरानी तो क्या ,
रूह में वहशत हो अगर, फिर ज़िस्म इंसानी तो क्या .

बेरुखी का क्यों दिखावा, क्यों जुबां पे तल्ख़ नश्तर,
है जिगर में इश्क तेरे , त्योरियाँ पेशानी तो क्या .

राज़ खोले आँख क्यों ये, दर्द सीने में भले हो 
हो लबों पे मुस्कराहट, आँख में हो पानी तो क्या .

हाथ में तस्बीह लेकर, लूटते हो चैन सबका,
ख्वाब में दौलत जहाँ की, बात गर रूहानी तो क्या.

मंजिलें भी ढूँढ लेती, हैं पता उस शख्स का खुद,
पैर रख तो हौंसले से, राह हो अंजानी तो क्या .

है जुदा अंदाज़ तेरा, हैं  निराले   तेरे ढंग

हर तरफ़ है बात तेरी, है हमें हैरानी तो क्या . 

Tuesday, 2 April 2013

इक आह ...




मुद्दतों, कौन सी शै थी जो , मचलती-सी रही.
तेरे इलज़ाम पे हर साँस,  अटकती सी रही .

प्यास कैसी थी जो तड़पाती रही तिल-तिल मुझको ,
 उम्र मैखाने कि गलियों में , भटकती-सी रही .

हम न  शायर थे कि जज़्बात जुबां पर लाते
फांस सी दिल में हरेक बात,  खटकती-सी रही .

उनसे बावस्ता हुए यों कि न बिछड़े  न मिले  ,
जुस्तजू में ही तेरी, ज़ीस्त ये  कटती-सी रही


क्या तेरी  बज़्म में , इलज़ाम लगाते तुझपर ,
आह सीने में ही उठती सी, दुबकती -सी रही .

हम थे आवारा कि दर-दर यूँही भटका ही किए 
रास न आया जहाँ , उम्र फिसलती -सी रही .

आस की शम्मा सरे शाम से, जलाई हमने,
कतरा-कतरा मगर उम्मीद, पिघलती-सी रही .



Sunday, 31 March 2013

लम्हा लम्हा



लम्हा लम्हा


रात रिसती रही 




आँखों की कोर से 




न नींद ही आई



न ख्वाब कोई 




एक-एक सितारा 




टूट कर गिरता रहा 




ज़मीन पे 




भोर होते न होते 




न तारे बचे आसमां के पास 




न नमी 




आँखों में 




रह गए तो बस 




सूख कर चटके हुए



कुछ ख्वाव 




समेटते रहे टुकड़े जिनके 




तमाम दिन 




लम्हा लम्हा

Monday, 25 March 2013

रातरानी से झरें हम.



जुस्तज़ू में जीने की अब, क्यों हर घड़ी मरें हम
 दरकिनारे डर को करके, फैसला कोई करें हम.

या खुदा तेरा जहाँ ये, क्या अजब है क्या गज़ब है.
हर कदम पे देख धोखे, आह सदमें से भरें  हम.

रास आया ना जहाँ ये, है रिवायत क्या यहाँ की,
बंदिशों में कैद इनकी, फैसले क्योंकर करें हम.

इश्क ने तेरे बनाया, न थे काफ़िर कभी भी,
उस खुदा को छोड़ तेरी, यूँ इबादत अब करें हम.

रंग औ बू से दुनिया महरूम हो तेरी कभी ना.
राह महकाएँ तेरी हम, रातरानी से झरें हम.


Sunday, 17 March 2013

मनमीत (कुण्डलिया)



मनमीत से मत करियो, सखी कभी भी प्रीत|

रीता मन हो जाएगा, ऐसी है  ये  रीत  ||

ऐसी है ये रीत , हिया हर पल तडपाए |

लाख जतन करै पर , मन कहीं चैना  न पाए||

रस के हैं लोभी , उड़ जाएँ  रस के रीत|

सुन सखी भ्रमर से , होते सारे मनमीत || .

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