Saturday, 7 July 2012
Friday, 6 July 2012
अजनबी
कोई तो मिले
अजनबी
देख जिसे, उपजे जिज्ञासा
विस्फारित हों नैन
नए प्रश्न कुलबुलाएँ
सर उठायें मन में
बात-मुलाकात करने को
उत्सुक हो मन
अजनबी देश के, अजनबी लोगों के
अनगिनत किस्सों में
दूर तक साथ साथ चलते
बस बीतातें जाएँ
दिन - रैन
न बेकार के शिकवे
न बेवज़ह शिकायतें
न परिचय की अड़चन
न रिश्तों के बंधन
दोस्ती-दुश्मनी, जान-पहचान से परे
खुशबू की तरह
जन्मे, बिकसे, पोषित हो
अनजानापन
जो कुछ दिल कहना चाहे
बिन सकुचाए
निर्द्वन्द्व, खोल कर रख दें
अंतस............
Monday, 2 July 2012
तन्हाई
आज
न जाने कितने दिन बाद
खुद अपने साथ
अकेली हूँ मैं
कितने ही चेहरों-आवाजों,
किस्सों- कहानियों,
शिकवों शिकायतों,
हँसी-ठहाकों के बीच
खुद से मुलाकात ही
कहाँ हो पायी थी
कितना कुछ था कहने को,
बताने को , बतियाने को
पर इस जमघट में
कहाँ सुनोगी तुम अब मेरी
बस यही सोच,
झिझक में
दूर खड़ी
करती रही इंतज़ार
इस चिरपरिचित
तन्हाई का
जब सिर्फ मैं ही
अपने साथ में हूँ ........
Tuesday, 29 May 2012
कितनी बार
कितनी ही बार
बना कर मिटाई है
तुम्हारी तस्वीर
शायद तुम ऐसे दिखते होगे
या वैसे
सदा भ्रम में ही रही
कितनी ही बार सुनी है
एक जानी-पहचानी
मगर.... अपरिचित आवाज़
और फिर.....
अनगिनत अनुमान
किसकी होगी यह ध्वनि?
क्या तुम्हारी?
क्या तुम्हीं अक्सर, कानों में
धीरे से फुसफुसाकर
एक अनजान आमंत्रण दे
कर जाते विभोर
कितनी ही बार तुम्हारा
अनछुआ स्पर्श
धीरे से सहला
कर जाता स्पंदित
रस सराबोर
वो ध्वनि, वो तस्वीर, वो स्पर्श
क्या तुम्हारा ही है
या मन है थामे
कोरी कल्पना की डोर
क्यों खींच रखे हैं तुमने
भ्रम के परदे चहुँ ओर
कुछ दीखता, कुछ अनदेखा
धुंधलापन
तोड़ क्यों नहीं देते अब ये भ्रमजाल
देकर दरस कर क्यों नहीं देते
उद्धार !!!
Saturday, 26 May 2012
वो तुम ही तो थे न.....
वो तुम ही तो थे न.....
आज प्रातः ही
वातायन से भेजी थी तुमने
इक स्वर्णिम किरण
प्रेम- पगे संदेसे के साथ
हौले से छूकर जो
जगा गई थी मुझे
उनींदी आखों को मलते हुए देखा तो
हाथों में थामे तुम खड़े थे
अरुणिम पारिजात
सद्य प्रस्फुटित
किरण-कोंपलों से
नहा रहा था जग जिसमें
वो अरुणाभ बखेरते
कर रहे थे मेरी ही प्रतीक्षा
वो तुम्हीं तो थे न ......
दूर कहीं मयूर की केकी से
अचानक चौंका दिया था तुमने
तन्द्रा तोड़ देखा तो
सघन हरितिमा में
उस नील-नवल तन में
वो तुम्हीं तो थे न ......
प्रकृति के कण कण में
तुम हो रहे थे भासित
पक्षियों के कलरव में
भ्रमर की गुँजार में
हवा की सरसराहट में
पत्तों की खड़खड़ाहट में
सद्य स्नात तृणों की
भीगी सी पुलक में
वो मृदु स्नेहिल स्पर्श
तुम्हारा ही था न ....
अमलतास के पीताभ गुच्छों में
चलते रहे तुम मेरे साथ-साथ
फैलाकर अपनी शाख- बाहें
कर रहे थे मेरा आह्वान
पर मैं तो मगन थी अपने में ही
दिनभर के जोड़-घटा,हिसाब-किताब में
पगली मैं , जान भी न पायी
अमूल्य पूंजी लुटा बैठी थी
न देख पायी
तुम्हारा मुस्कुराना, खिलखिलाना
न ही सुन पाई
वो तुम्हारा मधुर गुनगुनाना
हाथों से कैसे फिसल गया
तुम्हारा वो सलोना रूप
अब सोचती बारम्बार
श्याम
हाँ, वो तुम ही थे ....
चित्र : साभार गूगल
आज प्रातः ही
वातायन से भेजी थी तुमने
इक स्वर्णिम किरण
प्रेम- पगे संदेसे के साथ
हौले से छूकर जो
जगा गई थी मुझे
उनींदी आखों को मलते हुए देखा तो
हाथों में थामे तुम खड़े थे
अरुणिम पारिजात
सद्य प्रस्फुटित
किरण-कोंपलों से
नहा रहा था जग जिसमें
वो अरुणाभ बखेरते
कर रहे थे मेरी ही प्रतीक्षा
वो तुम्हीं तो थे न ......
दूर कहीं मयूर की केकी से
अचानक चौंका दिया था तुमने
तन्द्रा तोड़ देखा तो
सघन हरितिमा में
उस नील-नवल तन में
वो तुम्हीं तो थे न ......
प्रकृति के कण कण में
तुम हो रहे थे भासित
पक्षियों के कलरव में
भ्रमर की गुँजार में
हवा की सरसराहट में
पत्तों की खड़खड़ाहट में
सद्य स्नात तृणों की
भीगी सी पुलक में
वो मृदु स्नेहिल स्पर्श
तुम्हारा ही था न ....
अमलतास के पीताभ गुच्छों में
चलते रहे तुम मेरे साथ-साथ
फैलाकर अपनी शाख- बाहें
कर रहे थे मेरा आह्वान
पर मैं तो मगन थी अपने में ही
दिनभर के जोड़-घटा,हिसाब-किताब में
पगली मैं , जान भी न पायी
अमूल्य पूंजी लुटा बैठी थी
न देख पायी
तुम्हारा मुस्कुराना, खिलखिलाना
न ही सुन पाई
वो तुम्हारा मधुर गुनगुनाना
हाथों से कैसे फिसल गया
तुम्हारा वो सलोना रूप
अब सोचती बारम्बार
श्याम
हाँ, वो तुम ही थे ....
चित्र : साभार गूगल
Friday, 25 May 2012
Tuesday, 22 May 2012
अब छोड़ भी दे, मन
बहुत हुआ
अब छोड़ भी दे, मन
तृष्णा की डोर से बंधी
आस की मृगी को
मुक्त कर बंधन से
मृगमरीचिका में भटकती
इस व्याकुल उलझन को
अब छोड़ भी दे, मन
कहाँ, कितना और कब तक
यूँही बेमकसद भटकेगा
नागफनी सी उगती
कामनाओं के जंगल में
लहूलुहान हो
कहाँ-कहाँ सर पटकेगा
बेबसी के पिंजरे को
अब खोल भी दे मन .
अनंत विस्तार है
अथाह गहराई
न कोई ओर, न कोई छोर
धुंधलके में फिरते सायों सी
पल पल बनता मिटता वजूद
कब तक दौड़ेगा इन छलावों के पीछे
झूठ-मूठ के भ्रमों को
अब तोड़ भी दे मन
अब छोड़ भी दे, मन
तृष्णा की डोर से बंधी
आस की मृगी को
मुक्त कर बंधन से
मृगमरीचिका में भटकती
इस व्याकुल उलझन को
अब छोड़ भी दे, मन
कहाँ, कितना और कब तक
यूँही बेमकसद भटकेगा
नागफनी सी उगती
कामनाओं के जंगल में
लहूलुहान हो
कहाँ-कहाँ सर पटकेगा
बेबसी के पिंजरे को
अब खोल भी दे मन .
अनंत विस्तार है
अथाह गहराई
न कोई ओर, न कोई छोर
धुंधलके में फिरते सायों सी
पल पल बनता मिटता वजूद
कब तक दौड़ेगा इन छलावों के पीछे
झूठ-मूठ के भ्रमों को
अब तोड़ भी दे मन
Friday, 18 May 2012
सिर्फ लिखने के लिए लिखना
सिर्फ लिखने के लिए लिखना
कितना सार्थक है
कितना है निरर्थक
बिन सोचे, बिन जाने
सिर्फ कुछ कागज रंगना
हर बार का धोखा
हर बार गलतफहमी
शायद इस बार
बात दिल की हमने
लफ्ज़ ब लफ्ज़
बिलकुल सही कह दी
वाकई
क्या उकेर पाते है हम
अपने ज़ज्बातों को
पोशीदा ख्यालातों को
जानते है हम भी कि
कलम कि नोक तक आते
हज़ार रंग बदल लेती है ख्वाहिशें
बात बदलती है तो
रुख नया इख्तियार
करती है हैं हसरतें
फिर भी करते हम दावा
दिल बात जहाँ को
समझाने का
शब्दों से खिलवाड़ कर
शायर, कवि, लेखक
बन जाने का
काश!
इतनी कुव्वत देता खुदा
इंसान कर पाता जो खुद को बयां
कम से कम
एक इंसान दूसरे को तो समझ पाता............
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