दोबारा
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अगर हम कभी दोबारा मिलेंगे
क्या बातों के पैबंद
जख्मों को सिलेंगे?
रिश्तों की गाँठें कड़ी होंगी या फिर
टूटे सिरे खुल के बिखरेंगे ?
शिकवों की उलझन और
पेचीदा होगी या
रिश्तों के धागे थोड़े सुलझेंगे?
अजनबीपन से बोझिल नज़र न उठेगी
या अपनेपन के दरिया बहेंगे ?
एक चुप्पी पसरी रहेगी दरम्यां या
बातों के दौर लम्बे खिचेंगे?
बिछड़ने को होगा ये मिलना हमारा
या हमेशा को मिलने को हम मिलेंगे?

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