Friday, 12 April 2013

नैन


सवैया  (मत्तगयन्द )

कोटि कला कित सीखि सखी, इन नैनन ने नित वार करै की|
कौन अहेरि सिखाय दियो सखी, ऐसन युक्ति सिकार करै की|
बैनन सीख रहे नव जानत, मूक कला तकरार करै की|
बान कमान अनंग छुटै जब, जाय लगे हिय मार करै की|

20 comments:

  1. बहुत उम्दा सुंदर प्रस्तुति,आभार

    Recent Post : अमन के लिए.

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  2. बहुत ही बढ़िया मैम


    सादर

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  3. दीदी लिखा बड़ा अच्छा है ,लेकिन इसका अर्थ भी लिखना था ,ताकि मेरे जैसे भी समझ सकते। थैंक्स।

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    1. धन्यवाद आमिर ... इस सवैये में एक सखी दूसरी से पूछ रही है कि तेरे इन नयनों ने करोड़ों तरह से वार करने की कलाएँ कहाँ से सीखी हैं .. किस शिकारी ने इन्हें यह शिकार करना सिखाया है ..ये तेरे नयन नई भाषा सीख रहे हैं जो ये चुप रह कर भी तकरार करते हैं .... जब कामदेव की कमान से निकले बाणों की तरह जब ये कटाक्ष मारते हैं तो सीधे हृदय को भेद जाते हैं ...

      इस सवैये का अर्थ सरल भाषा में करने का प्रयास किया है ..आशा है आपको समझ आ गया होगा अब|

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  4. बेहतरीन उम्दा प्रस्तुति....

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  5. शालिनी जी भाव अच्छे। पुरूषों की अपेक्षा नारियों में नैनों के बान चलाने की क्षमता अद्भुत होती है। हृदय पर घांव करने की क्षमता उसमें(सखी और नारी) रहती है। सहज भाव पर इसे सवैया में बांधना जरूरी था? यहीं अभिव्यक्ति आप सरलता से करते तो और अधिक शक्ति पा सकती थी। कविता को कलापक्ष का कृत्रिम जामा पहनने की जरूरत नहीं हैं। हां यह अगर सहजता से बना है तो कोई बात नहीं। यह मेरा विचार है, आप अलग राय भी रख सकती हैं, नहीं तो आप नाराज हो जाएंगी।

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    1. विजय जी , सर्वप्रथम तो आपका धन्यवाद करना चाहूंगी कि आपने इस पोस्ट को ध्यान से पढ़ा और अपनी राय भी दी ... देखिए कृत्रिमता और सहजता के विषय में अपनी-अपनी अलग राय हो सकती है ...हो सकता है जो आपको कृत्रिम लग रहा है वह मेरे व अन्य लोगों के लिए सहज हो ... जहाँ तक बात इसे सवैया छंद में बाँधने की है... जो जो सौंदर्य इस छंद में उत्पन्न हुआ है मेरे विचार से वह छंदमुक्त में संभव ही नहीं था... ये छंद अत्यंत सहज व सीधे दिल से निकलते हैं ..इसमें कलापक्ष को कृत्रिमता का जामा नहीं पहनाया गया है वरन उसमें लास्य उत्पन्न किया गया है ...शायद आपने कभी पूरी लय के साथ सवैया पढ़ा नहीं है ..अन्यथा ऐसा नहीं कहते ..ये हमारे अपने भारतीय छंद हैं ... इनमें स्वाभाविकता है बनावट नहीं ... वैसे आप अपनी राय रख सकते हैं ... नहीं तो आप नाराज़ हो जाएँगे ... आशा है मेरे विचारों को अन्यथा न लेते हुए प्रत्युत्तर के रूप में स्वीकारेंगे..

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    2. बिल्कुल अन्यथा नही ले रहा हूं। मैं गलत था और गलती स्वीकारने में कोई अपमान भी नहीं मान रहा हूं। उसका कारण यह है कि आपका आज प्रकाशित और एक सवैया पढा एहसास हो गया कि आप के भीतर से स्वाभाविक अभिव्यक्ति हो रही है उसमें कोई शक नहीं।

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    3. विजय जी ... यह एक स्वस्थ परिचर्चा है ..और ऐसी ही परिचर्चाओं के माध्यम से हम सीखते हैं ... आपको कुछ नहीं लगा तो आपने इंगित कर दिया ... और मुझे जो सही लगा प्रत्युत्तर दे दिया ... आपका बहुत बहुत आभार व्यक्त करती हूँ कि आपने इस पोस्ट पर इतना समय दिया ... बहुत बहुत धन्यवाद !

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  6. आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार (14-04-2013) के चर्चा मंच 1214 पर लिंक की गई है कृपया पधारें. सूचनार्थ

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  7. बहुत सुन्दर....बेहतरीन प्रस्तुति
    पधारें "आँसुओं के मोती"

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  8. सुंदर भाव शालिनी जी बधाई
    मेरे अंगना कब आओगे
    ''माँ वैष्णो देवी ''

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  9. नवरात्रों की बहुत बहुत शुभकामनाये
    आपके ब्लाग पर बहुत दिनों के बाद आने के लिए माफ़ी चाहता हूँ
    बहुत खूब बेह्तरीन अभिव्यक्ति!शुभकामनायें
    आज की मेरी नई रचना आपके विचारो के इंतजार में
    मेरी मांग

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  10. नवरात्रों की बहुत बहुत शुभकामनाये
    आपके ब्लाग पर बहुत दिनों के बाद आने के लिए माफ़ी चाहता हूँ
    बहुत खूब बेह्तरीन अभिव्यक्ति!शुभकामनायें
    आज की मेरी नई रचना आपके विचारो के इंतजार में
    मेरी मांग

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  11. सहज सोंदर्य पैदा हो रहा है इस प्रकार के छंद प्रयोग में ...
    विजय जी का कहना अपनी जगह है पर हर विधा का अपना महत्त्व है ... ओर अपने अपने भाव अनुसार दोनों में ही सुंदरता है ...

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  12. mujhe ye technical jankari to hai nahi ki sawaiya kisko kahte hain...bas itna bata sakte hain.. bhaw ubhar kar aaya hai :)

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  13. बेहतरीन प्रस्तुति शालिनी जी ... बधाई !

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  14. नव संवत्सर की हार्दिक बधाई और शुभकामनाएँ!! बहुत दिनों बाद ब्लाग पर आने के लिए में माफ़ी चाहता हूँ

    बहुत खूब बेह्तरीन अभिव्यक्ति

    आज की मेरी नई रचना आपके विचारो के इंतजार में
    मेरी मांग

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