Friday, 19 April 2013

मुख़्तसर रात


मुख़्तसर रात थी, लम्हा-लम्हा ढलती रही 
खत्म अफ़साने हुए न, दास्ताँ चलती रही .

न तेरी आँख में अश्क कम,पुरनम चश्म भी मेरे 
रुखसारों पर तेरे मेरे, एक धार सी ढलती रही .

मुहब्बत की दास्ताँ, कैद थी नम पलकों तले 
कतरा कतरा आँख से, कहानियाँ पिघलती रहीं

मंजिलों से फासला अपना रहा यूँ उम्र भर 
हम कदम बढ़ाते रहे, मंजिल परे हटती रही .

तारे टूट गिरते रहे, छीजता रात का दमन रहा, 
ता-शब मेरी सर्द आहों से, चाँदनी जलती रही . 


28 comments:

  1. are waaaah bhot khub ...kya kheni waaaaaah

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    1. धन्यवाद अशोक जी !

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  2. लाज़वाब ग़ज़ल..हरेक शेर बहुत उम्दा...

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    1. शुक्रिया कैलाश जी!

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  3. वाह वाह ,,,शालिनी जी बहुत सुंदर गजल,,,

    RECENT POST : प्यार में दर्द है,

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  4. सुंदर रचना जीवन में घटित हो रहे समय का
    सच
    उत्कृष्ट प्रस्तुति
    बधाई

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    1. धन्यवाद ज्योति खरे जी!

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  5. वाह....
    हर शेर नर्म ,मुलायम से एहसास लिए....
    बहुत सुन्दर ग़ज़ल.

    अनु

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    1. हार्दिक आभार अनु ...

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    1. धन्यवाद संगीता जी

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    1. धन्यवाद मानव जी

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  8. एक दूसरे के साथ जुड कर मन की कहानियां सुनाना और दांस्ताएं सुनाना परिपूर्ण प्रेम की अभिव्यक्ति है जहां गहरा प्यार वहां यह संभव। मंजिले कितनी भी परे हटती जाए कोई फर्क पडता नहीं अगर किसी का साथ हो तो। सुंदर।

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    1. धन्यवाद विजय जी ...

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    1. धन्यवाद सुरेश जी ...

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  10. कतरा कतरा आँख से कहानियां पिघलती रहीं ...
    वाह ... बहुत ही लाजवाब शेर है ...

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    1. दिगंबर जी ... बहुत बहुत धन्यवाद!

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  11. बहुत ही सुन्दर गजल...
    :-)

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  12. ला -ज़वाब प्रस्तुति .हर अशार ख़ास अंदाज़ और अर्थ पूर्ण .

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  13. आज तक बहुत शायरों को पढ़ा
    जो रवानी आपकी शायरी में है
    किसी में नहीं
    आपको सादर प्रणाम

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