Tuesday, 2 April 2013

इक आह ...




मुद्दतों, कौन सी शै थी जो , मचलती-सी रही.
तेरे इलज़ाम पे हर साँस,  अटकती सी रही .

प्यास कैसी थी जो तड़पाती रही तिल-तिल मुझको ,
 उम्र मैखाने कि गलियों में , भटकती-सी रही .

हम न  शायर थे कि जज़्बात जुबां पर लाते
फांस सी दिल में हरेक बात,  खटकती-सी रही .

उनसे बावस्ता हुए यों कि न बिछड़े  न मिले  ,
जुस्तजू में ही तेरी, ज़ीस्त ये  कटती-सी रही


क्या तेरी  बज़्म में , इलज़ाम लगाते तुझपर ,
आह सीने में ही उठती सी, दुबकती -सी रही .

हम थे आवारा कि दर-दर यूँही भटका ही किए 
रास न आया जहाँ , उम्र फिसलती -सी रही .

आस की शम्मा सरे शाम से, जलाई हमने,
कतरा-कतरा मगर उम्मीद, पिघलती-सी रही .



23 comments:

  1. आपने बड़े ख़ूबसूरत ख़यालों से सजा कर एक निहायत उम्दा ग़ज़ल लिखी है ।

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    1. बहुत - बहुत धन्यवाद संजय जी ......

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  2. आपके लेखन ने इसे शानदार बना दिया है....

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  3. वाह !!! वाह बहुत खूबशूरत गजल,,,शालिनी जी बधाई,,,

    Recent post : होली की हुडदंग कमेंट्स के संग

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    1. बहुत -बहुत आभार सर!

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  4. बहुत बढ़िया ग़ज़ल......
    क्या तेरी बज़्म में इलज़ाम लगाते तुझ पर..
    आह सीने में ही उठती सी,दुबकती सी रही....
    वाह!!!

    अनु

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    1. शुक्रिया अनु...

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  5. हम थे आवारा ..... वाह बहुत खूब





    पधारिये :  किसान और सियासत

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    1. धन्यवाद रोहितास जी ...

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  6. वाह वाह......बेहद उम्दा शेरों से सजी एक खुबसूरत सी ग़ज़ल.....दाद कबूल करें इसके लिए ।

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  7. उनसे बावस्ता हुए यों कि न बिछड़े न मिले ,
    जुस्तजू में ही तेरी, ज़ीस्त ये कटती-सी रही

    ये अशआर पढ़ते समय रेखा के फोटो पर नज़र गयी , ऐसा लगा की जैसे रेखा के अपने जज्बात पढ़ रहा हूँ।

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    1. शुक्रिया आमिर!

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  8. बहुत ही बेहतरीन जज्बात को प्रदर्शित करती ग़ज़ल,आभार.

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    1. धन्यवाद राजेन्द्र जी

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  9. बहुत खूब ... सच है उनकी मफिल में उनपे ही इलज़ाम ...
    हर शेर लजवाब ...

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  10. Replies
    1. शुक्रिया महेंद्र जी..

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  11. shalini ji hr sher lajbab laga ,,,,,,,bilkul padhate padhate bhav vibhor ho utha ,,,,,,,khas taur pr neeche se doosra sher bahut hi lajbab laga .......ak behtareen gazal pr hardik badhai sweekaren .

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    1. नवीन जी ..आपका हार्दिक आभार व्यक्त करती हूँ ..

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  12. वाह शैलिनी...
    हर शेर दिल में उतरता सा गया
    अह्सासे बेकराँ की सरहद न रही

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  13. रूप वाद(फॉर्म ) और अर्थ की गुणवत्ता लिए बढ़िया बुनावट की गजल .

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