Thursday, 2 May 2013

जो मुरली अधरान धरै सवैया (मत्तगयन्द)


जो मुरली अधरान धरै फिरि कोउ सखी संग बोलत नाहीं|
बांसुरिया संग डाह करै सखि, आह भरै पर रोवत नाहीं|
बेकल हो सुध वे बिसरा, दिन-रात जलै अरु सोवत नाहीं|
मोहक मोहन को छवि सुन्दर, देख हिया कब डोलत नाहीं|

11 comments:

  1. बहुत बेहतरीन सुंदर प्रस्तुति ,,,

    RECENT POST: मधुशाला,

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  2. बहुत बेहतरीन सुंदर सवैया छंद ,,,

    RECENT POST: मधुशाला,

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  3. बढ़िया पोस्ट

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  4. मोहन की छवि देख हृदय का डोलना सुंदर। बांसुरी के प्रति कृष्ण का प्रेम और उसके प्रति ईर्ष्या भाव पैदा होकर भी रोना नहीं केवल आह भरना चित्रमय भावना प्रकट करता है।

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    1. धन्यवाद विजय जी

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  5. मोहित कर दिया इन पंक्तियों ने

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  6. बहुत खूब ... मन तो डोलना ही है कान्हा की इस मूरत को देख के ...
    लाजवाब ...

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  7. मुरली संग डाह का मनोरम दृश्य प्रस्तुत हुआ है.बधाई.क्या बेकल को व्याकुल और दिन रात को दिन रैन में प्रतिस्थापित किया जा सकता है ?

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