Tuesday, 25 September 2012

आत्ममुग्धा का आत्मविमोह


और फिर
एक साँझ
देर तक बैठे रहे
हम साथ
बहुत कुछ कहती जाती मैं
और सुनते जाते तुम
अधरों पर जाने कैसा 
मौन धरा था 
तुम्हारे
फिर दूर किसी खाई से जैसे
आती आवाज़ सुनी थी....
"नहीं संभव मिलन हमारा"
लहरों की  छाती पर 
छितराए रंग
औचक ही डूब गए थे,
और मेरे मुख पर बिखरी
स्याही, 
घुल साँझ के रंग में
कर गई उसे थी
सुरमई...
स्तब्ध खड़ी सोचती मैं
क्या मेरे ही दुःख से
हो गई प्रकृति
रंगहीन.....................

10 comments:

  1. आह!!!!
    दिल से निकली आह ने प्रकृति के रंग चुरा लिए..

    अनु

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    1. जी हाँ अनु.... दिलखुश तो प्रकृति रंगीन... जब दिल में गम तो प्रकृति के रंग भी फीके लगाने लगते हैं|...ब्लॉग पर आने के लिए शुक्रिया!

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  2. सुरमई...
    स्तब्ध खड़ी सोचती मैं
    क्या मेरे ही दुःख से
    हो गई प्रकृति
    रंगहीन.....................
    ..बहुत ख़ूबसूरत...ख़ासतौर पर आख़िरी की पंक्तियाँ....मेरा ब्लॉग पर आने और हौसलाअफज़ाई के लिए शुक़्रिया..!!

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    1. धन्यवाद संजय जी!

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  3. वाह दिल को छू कर दिल की गहराई में उतर गई आपकी ये रचना बेहतरीन बेहद उम्दा.

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    1. धन्यवाद अरुण!

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  4. लाजवाब....छोटे शब्दों में गहन पोस्ट।

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    Replies
    1. धन्यवाद इमरान जी!

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  5. दूर किसी खाई से जैसे
    आती आवाज़ सुनी थी....
    "नहीं संभव मिलन हमारा"
    लहरों की छाती पर
    छितराए रंग
    औचक ही डूब गए थे,..फिर कभी नहीं ऊपर आ सके

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    Replies
    1. रश्मि जी, रंगों को उभरने के लिए पुनः प्रभात का इंतज़ार करना होता है...
      सधन्यवाद

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