Wednesday, 14 November 2012

आगमन तुम्हारा


बिल्कुल अभी -अभी
एक दस्तक सी सुनी थी 
दरवाजे पर 
शायद घर के
या फिर दिल के 
बदहवास दौडी थी 
खोल द्वार देखा तो
कोई न था 
दूर - दूर तक 
पर हाँ 
बिछी थी नरम हरी दूब
सद्य पदांकित 

पूछोगे 
दूब पर पदचिह्न ?
हाँ 
क्योंकि झुके हुए थे 
गर्वोन्नत तृण शिर 
श्रद्धा नत 
पाकर पद स्पर्श 

काश!
बिछा  होता  वहाँ 
अभिमान मेरा
चरण धूलि पा
हो जाता पावन
पर नहीं था
मेरे भाग्य में 
पद स्पर्श तुम्हारा 

क्यों न खोल रखा 
द्वार ह्रदय का 
क्यों कपाट बंद कर 
लीन स्वयं में 
जान न पाई 
आकर  गमन तुम्हारा ......


43 comments:

  1. क्यों न खोल रखा
    द्वार ह्रदय का
    क्यों कपाट बंद कर
    लीन स्वयं में
    जान न पाई
    आकर गमन तुम्हारा ......सुंदर अभिव्यक्ति,,,,,,

    RECENT P0ST ,,,,, फिर मिलने का

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    1. धन्यवाद धीरेन्द्र जी!

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  2. काश!
    बिछा होता वहाँ
    अभिमान मेरा
    चरण धूलि पा
    हो जाता पावन
    पर नहीं था
    मेरे भाग्य में
    पद स्पर्श तुम्हारा .... नज़र आए चिन्ह,वही है आशीष और अभिमान कहीं नहीं

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    Replies
    1. अभिमान छोड़ कर ही उनका आगमन महसूस किया जा सकता है.... पता नहीं कभी हो पायेगा यह य नहीं ??
      धन्यवाद रश्मि जी!

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  3. प्रेम में सराबोर सुन्दर सार्थक रचना. वाह

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    1. हार्दिक आभार अरुण!

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  4. वाह....
    अद्भुत रचना....
    बहुत सुन्दर...

    अनु

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    Replies
    1. धन्यवाद अनु जी!

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  5. अभी भी समय है ... दरवाजा खोल के रखो ... आयेंगे फिर जो प्यार करते हैं ...

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    Replies
    1. :-) धन्यवाद दिगंबर जी!

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  6. कल 21/09/2012 को आपकी यह बेहतरीन पोस्ट http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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    Replies
    1. हलचल में शामिल करने के लिए शुक्रिया यशवंत जी!

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  7. प्रभावी रचना ... लाजवाब

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    Replies
    1. धन्यवाद विजय जी!

      Delete
  8. काश!
    बिछा होता वहाँ
    अभिमान मेरा
    चरण धूलि पा
    हो जाता पावन
    पर नहीं था
    मेरे भाग्य में
    पद स्पर्श तुम्हारा

    कमाल की पंक्तिय हैं शालिनी जी.

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    Replies
    1. धन्यवाद संतोष जी!

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  9. बहुत सुन्दर शालिनीजी

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    Replies
    1. पोस्ट पर ध्यान देने के लिए आभार सरस जी!

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  10. ख्याल बहुत सुन्दर है और निभाया भी है आपने उस हेतु बधाई, सादर वन्दे,,,,,,,,,

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    1. धन्यवाद मदन जी!

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  11. Replies
    1. धन्यवाद .......... जी!

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  12. क्यों न खोल रखा
    द्वार ह्रदय का
    क्यों कपाट बंद कर
    लीन स्वयं में
    जान न पाई
    आकर गमन तुम्हारा ......

    ...बहुत खूब! बहुत प्रभावी अभिव्यक्ति...

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    1. बहुत बहुत धन्यवाद कैलाश शर्मा जी!

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  13. वाह! बहुत ही सुन्दर भावमय प्रस्तुति.
    आभार,शालिनी जी.

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    Replies
    1. धन्यवाद राकेश जी!

      Delete
  14. काश!
    बिछा होता वहाँ
    अभिमान मेरा
    चरण धूलि पा
    हो जाता पावन
    पर नहीं था
    मेरे भाग्य में
    पद स्पर्श तुम्हारा

    वाह....बहुत ही सुन्दर।

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  15. धन्यवाद इमरान जी!

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  16. क्या बात है कविता और ग़ज़ल एक साथ और एक ही दिन पोस्ट। लगता है दीपावली लिखते लिखते मनायी है।बहुत सुन्दर।

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    Replies
    1. धन्यवाद आमिर.....पर यह पोस्ट पुरानी है.... आज दोबारा अपडेट की थी|

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  17. बहुत ही भावप्रवण और सुंदर अभिव्यक्‍ति । बधाई !

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    1. धन्यवाद सुशीला मैम!

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  18. आपकी सशक्त लेखनी और एक भावप्रवण हृदय हृदय से परिचित हुआ। बहुत अच्छा लगा। मेरी शुभकामनाएँ।

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    Replies
    1. धन्यवाद दिनेश जी!

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  19. कोमल भाव लिए बहुत ही सुन्दर रचना...
    आपको दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएँ....
    :-)

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  20. बहुत सराहनीय प्रस्तुति.बहुत सुंदर बात कही है इन पंक्तियों में. दिल को छू गयी. आभार !
    बेह्तरीन अभिव्यक्ति .बहुत अद्भुत अहसास.दीपावली की हार्दिक शुभकामनाये आपको और आपके समस्त पारिवारिक जनो को !

    मंगलमय हो आपको दीपो का त्यौहार
    जीवन में आती रहे पल पल नयी बहार
    ईश्वर से हम कर रहे हर पल यही पुकार
    लक्ष्मी की कृपा रहे भरा रहे घर द्वार..

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  21. वाह-वाह क्या बात है सुन्दर अति सुन्दर लाजवाब प्रस्तुति

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  22. निरभिमान होने का सुख ,कशिश इस रचना में मुखरित हुई है .

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