Monday, 23 March 2026

संबंधों का सफ़र

  

समाप्ति की क़गार पर खड़े

बोझिल संबंधों के कदम,

छटपटाते बेचैन हो,

दहलीज पार करने को,

लुभा रहा जो आकर्षण,

बाहर की दुनिया का,

तो चेता रहे ,

रोक रहे बंधन रिश्तों के

समझाते बार-बार ..

उस ओर बेशक है खुला आसमान

परवाज़ को असीमित दिशाएँ

यह आज़ाद हवा के झोंके

जो खींचते बरबस

देते आमंत्रण

बाहें फैला बुलातीं

क्षितिज की फैली बाहें

पर

आतुर क़दमों को थाम

ज़रा करो तो विचार

धरती आसमाँ का यह आलिंगन

कितना सत्य, कितना है छद्म

सोचो यह आभासित मिलन

रच एक भ्रामक संसार

मृगतृष्णा का फैलाता जाल

जिसमें फँस

लाँघी जाती है जाने कितनी

अलंघ्य दह्लीजें

जिनके पार .... है बस भटकाव

अंतहीन अंतरिक्ष के

शून्य में , निर्वात में

और स्याह घुप्प अँधेरे में पसरे

अजनबी शोरगुल के ब्लैक होल में

गर्क़ हो जाते हैं

सारे संबंध ....

 

 

 

 

 

सादगी

 

न हुनर काम आया, न अदा काम आई|

उसे सादगी पसंद थी, बस वही काम आई|

 

खुशियों की दौलत बटोरी उन्होंने

गमों की सौगात मिरे नाम आई

 

ख़ुशी का है आलम, तुम संग में हो

बड़ी मुश्किलों से है ये शाम आई

होश या ख़ुमारी

 

होश है या कोई ख़ुमारी है?

है सुकूँ या कि बेक़रारी है?

 

तेरा होना अजाब था दिल पे,

तू नहीं तब भी दिल ये भारी है|

 

रतजगे बन गए नसीब उनका,

वस्ल में शब जो इक गुजारी है|

 

ज़ख्म अपना हरेक गिनते हो,

जो दिए उनकी कब शुमारी है?

 

तंज, ताने शिकायतें शिकवे,

इश्क है याकि जाँख़ुआरी है|

 

आँख से बूँद पैमाने में गिरी,

सारी मय अब तो खारी-खारी है|

 

हर दगा दोस्तों से पाई है,

देख लो कितनी पक्की यारी है|

 

तल्ख़ लहज़ा हमें भी आता है,

बस जुबां पे लिहाज़ तारी है|

 

अपना सामान ध्यान से रखना,

सूचना जन के हित में जारी है |

 

 

 

 

 

 

Thursday, 19 February 2026

दोबारा

 

दोबारा

~~~~~~~~~

अगर हम कभी दोबारा मिलेंगे

क्या बातों के पैबंद

जख्मों को सिलेंगे?

रिश्तों की गाँठें कड़ी होंगी या फिर

टूटे सिरे खुल के बिखरेंगे ?

शिकवों की उलझन और

पेचीदा होगी या

रिश्तों के धागे थोड़े सुलझेंगे?

अजनबीपन से बोझिल नज़र न उठेगी

या अपनेपन के दरिया बहेंगे ?

एक चुप्पी पसरी रहेगी दरम्यां या

बातों के दौर लम्बे खिचेंगे?

बिछड़ने को होगा ये मिलना हमारा

या हमेशा को मिलने को हम मिलेंगे?

कविता का जन्म

 

क्या ठहरे जल के भीतर 

लहरें उत्ताल तड़पती हैं ?

क्या शांत मन से कभी

कविता कोई जन्मती है?

न हो जब तक,

मन विह्वल, ह्रदय व्याकुल

भावों का अतिरेक न जब तक

प्राणों को कर डाले बोझिल |

हृदय के उदगार न जब तक

शब्दों में ढल जाने को मचलें|

आँखों की पीड़ा, आँसू में घुल

जब तक कागज़ पर न उतरे|

प्रसव वेदना बिना क्या जननी

बालक को जन पाती है?

जब ह्रदय कसकता दारुण दुःख से

तब कविता रच पाती है|

गुमशुदा

 गुमशुदा से हो गए वो, शहर छोड़े बैठे हैं

हम तो उनकी चौखट से, आस जोड़े बैठे हैं.

है गुरूर या गैरत , गैरियत है या गफलत,
अपनी है गरज फिर भी,मुँह को मोड़े बैठे हैं

अर्ज़ पर, गुज़ारिश पर भी ,खफ़ा से रहते हैं,
क्या गुमान है इतना, दिल जो तोड़े बैठे हैं .

काश अब निकल जाए, सब गुबार ये दिल का,
कितने तूफान आँखों में, दिल निचोड़े बैठे है

अब उन्हें बुलाने को कोई गुमाश्ता भेजें,
कासिदों की तो हिम्मत वो, कबकी तोड़े बैठे हैं,

आरक्षण

 

आरक्षण

~~~~~~

छोटे-बड़े पक्षी’

सब भर रहे थे,

अपनी-अपनी उड़ानें |

अपने पंखों की हैसियत से,

दे रहे थे चुनौती गगन को,

बना रहे थे अपनी पहचानें|

तभी कुछ सियारों ने उन्हें आवाज़ लगाई,

पूरी तल्लीनता से परवाज़ भरने की कोशिश में लगे

कुछ छोटे कमज़ोर पक्षियों को बात समझाई |

देखो!

यह आकाश ... है भेदभाव से भरा

बड़े पक्षियों ने जमाया है ... अधिकार यहाँ ,

सदियों से आसमां पर राज करते ये बड़े पंछी,

नहीं भरने देंगे तुम्हें उड़ानें,

हर तरफ अपना हक़ जमाए बैठे ये सयाने|

पर अब तुम्हें डरने की नहीं ज़रूरत,

मत घबराओ देख अपनी कमज़ोर हैसियत|

कमज़ोर-छोटे पंख तुम्हारे,

क्यों उठाएँ भला उड़ने की ज़हमत?

सदियों से इन बड़े पक्षियों ने जो

किए हैं तुम पर अत्याचार,

आसमान में तुम्हारे आगे खड़ी की जो दीवार,

उसे तुम्हारे आगे से हम हटाएँगे,

इनके द्वारा किए गए भेदभाव से,

मुक्ति हम दिलाएँगे|

इस वर्ण-व्यवस्था के खिलाफ़,

हम तुम्हें देंगे ‘संरक्षण’,

इस आसमान में उड़ने को,

तुम्हें अब मिलेगा ‘आरक्षण’ |

न – न ,

तुम्हें अपने पंखों को कोई तकलीफ़ नहीं पहुँचाना है,

बस....  अब से छाती पीट चिल्लाना है –

इन ऊँचे उड़ने वालों ने हमें

सदियों से सताया है,

हमारे पंखों पर पहरा लगाया है|

तुम्हारा रोने को हम ऐसी चीख बनाएँगे |

इन ऊँची उड़ान भरने वालों के पंख कटवाएँगे|

अब ये बाज , तुमसे ऊँची परवाज़ नहीं भर पाएगा|

तुम्हारी छोटी उड़ान के नीचे उड़ना ही

इसकी नियति बन जाएगा|

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

राम पिया


 

मन चकोर


 

समय की धार

 तुम समय की धार थे, ठहरा हुआ पाषाण मैं|

न तुम रुके, न मैं बही, सजीव तुम, निष्प्राण मैं |
कण-कण घुली, रज-रज बनी, हो सूक्ष्म मैं तुममें मिली,
मिटने में थी मेरी पूर्णता, सम्पूर्णता तेरे संग चली,
अस्तित्व की कब चाह थी, तुझसे मेरी पहचान थी
न हुई पृथक न विलीन हुई तुममें, अनस्तित्व का प्रमाण मैं|
अदृश्य तुम जग के लिए, मैं मूर्त हो बंधन बँधी ,
स्पर्श तेरा था अदृश्य, मैं दृश्य हो हर क्षण दिखी,
मेरे अणु-अणु का रीतना, कण-कण हरेक क्षण छीजना ,
निर्मोही तुम अविकल रहे, अनुदिन घटी परिमाण मैं |

Friday, 3 January 2025

किन भावों का वरण करूँ मैं?

 हर पल घटते नए घटनाक्रम में,

ऊबड़-खाबड़ में, कभी समतल में,
उथल-पुथल और उहापोह में,
किन भावों का वरण करूँ मैं ?
एक भाव रहता नहीं टिककर,
कुछ नया घटित फिर हो जाता|
जब तक उसको मैं सोचने बैठूँ,
किसी और दिशा कुछ ले जाता|
क्या-कुछ-कब-कैसे-कितना के ,
चक्कर में कब तक भमण करूँ मैं?
किन भावों का वरण करूँ मैं?
विद्रूप-विकट कुछ घट जब मन में,
विद्रोह-विषाद-विरक्ति लाता |
सब तहस-नहस कर नव रचना को,
हो अधीर मन है अकुलाता|
कर चिंतन एक नई आस का,
नैराश्य-त्रास का क्षरण करूँ मैं|
किन भावों का वरण करूँ मैं?
कुछ मेरे अंतस के सपने,
सपनों में धूमिल होते अपने|
अपनों को चुनना या सपने बुनना,
किसको पाने में छूटे कितने |
हानि-लाभ क्या गणन करूँ मैं ?
किन भावों का वरण करूँ मैं?
~~~~~~~~~~
शालिनी रस्तौगी

सरस्वती (दूसरे पक्ष का पक्ष)

 सरस्वती (दूसरे पक्ष का पक्ष)

~~~~~~~~
स्त्री ने पुरुष से कहा-
‘तुमने ही दिया है मुझे
.....सारा दर्द-सारी पीड़ा’|
फिर उसने खोली,
अपने आरोपों की पोटली,
और एक-एक कर गिनवाए,
वे सभी ज़ख्म,
जो दिए थे पुरुष ने उसे ... कभी |
उन आरोपों की झड़ी और
स्त्री आँखों से बहती गंगा-जमुना में,
भीगा पुरुष ... अपराधबोध से ग्रसित,
सिर झुका सुनता रहा ... बहुत देर तक,
चुपचाप .... अपनी पीड़ा को समेटे|
पर .... उसके पास भी थे अपने दर्द,
कुछ अनकही शिकायतें,
कुछ बहुत पुराने ज़ख्म ...
उसके अंतस में बह रही थी,
दर्द की एक नदी .... जो,
आँखों से बह निकलने को,
उफनी, मचली, बार-बार टकराई ...
उस उपरी चट्टानी परत से,
जिसे रचा था पुरुष ने ही,
अपने चारों ओर..... पर,
न तोड़ पाई वह ... आँखों पर बँधे बाँध |
और फिर एक बार,
पुरुष का दर्द ....
बन गया उसकी चिल्लाहट,
जो दुनिया ने सुनी |
फिर नज़र नहीं आई किसी को
स्त्री की आँखों से बहती,
गंगा-जमुना की बाढ़ के आगे,
पुरुष अंतस में,
अदृश्य हो बह रही ...
सरस्वती !!
~~~~~~~~
शालिनी रस्तौगी

सनातन

 अपने देवी- देवताओं को हमने,

नहीं बनाया ,
अपनी प्रेरणा का स्रोत,
मात्र श्रद्धा और आस्था का केंद्र बनाकर,
लीन हो गये भक्ति में…..
हमने देखे ,
केवल अभय मुद्रा में उठे ,
उनके हाथ ,
और उनको अपनी रक्षा की ज़िम्मेदारी सौंप,
स्वयं हो गए,
निष्क्रिय ….
नहीं देखे हमने,
अस्त्र-शस्त्र से सज्जित,
उनके दूसरे हाथ।
नहीं दिखे हमें,
उनके चरणों में पड़े ,
शिरछिन्न असुर ।
कुछ तो ली होती प्रेरणा,
कुछ तो अपनाया होता उनका चरित्र ,
तो आज नहीं कहते ,
ख़तरे में है …….
सनातन

मन मेरा किस पार चला

 


मन मेरा किस पार चला

छोड़कर अपना किनारा,
तोड़कर बंधन यह सारा,
खोलकर चिंतन की नौका,
ले मनन पतवार चला
मन मेरा किस पार चला ...
१.
न कोई दिशा, न कोई लक्ष्य है,
न पथ कोई, न पता समक्ष है,
किस मार्ग से जाऊँ, बताए,
कौन गुरु जो ऐसा दक्ष है ?
अनसुलझे प्रश्नों का ये, सिर पे ले अंबार चला
मन मेरा किस पार चला
२.
कौन अपनी ओर खींचता?
वहाँ कौन है मुझको बुलाता ?
किस आकर्षण से बँधी जो,
अज्ञात होकर भी लुभाता ?
अप्रत्यक्ष को पाने को मन यह, देखो तज के संसार चला|
मन मेरा किस पार चला ....
३
ये जग कब-कैसे छूटेगा?
ये बंधन कैसे टूटेंगे?
माया-मोह और जड़ता ये,
दस्यु कब तक मन लूटेंगे?
विद्रोह, विरक्ति, व्याकुलता, द्वंद्व यह अपरंपार चला|
मन मेरा किस पार चला ....
~~~~~~~~~~~~~~
शालिनी रस्तौगी

सोऽहं

 

सोऽहं

मैं एक कण , मैं ब्रह्माण्ड,

इस सृष्टि में, सृष्टा का मान |

सूक्ष्म से भी अति सूक्ष्म मैं,

और व्यापक से व्यापक परिमाण |

यत्र-तत्र-सर्वत्र मैं ही

और मैं ही अकिंचनता का भान |

मेरी परिधि में विश्व बँधे और

मैं एक बिंदु, शून्य समान |

मैं कर्ता, मैं ही हूँ कर्म,

मैं ही कर्मों का परिणाम |

मैं कारक हूँ, मैं कारण हूँ,

मैं बीज तत्त्व, मैं वृक्ष समान|

क्या देह समझते हो मुझको ....?

मैं आत्म तत्त्व, परमात्म अंश,

सृष्टा से परे कब, मेरी पहचान |

~~~~~~~~~~~~  

द्वारा शालिनी रस्तौगी

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