Tuesday, 26 February 2013

अनगढ़-सी इबारत




सोचती हूँ 
कह दूँ 
तुम मेरी जिंदगी के सफहे पर लिखी 
कोई तहरीर तो नहीं 
वक्त-ए-तन्हाई में 
उबकर 
या कुछ बेख्याली में
यूँही
हाशियों पर जो खींच दी जाती है
कोई अनगढ़-सी इबारत
या कुछ बेमतलब सी लकीरें
तुमको पढूँ तो कैसे
कोई मतलब निकालूं तो कैसे
कि होश में तो तुम्हे लिखा ही नहीं
और अब
बार बार बाँचती तुम्हें
जतन करती हूँ
कोई मतलब निकलने का
कि तुम हो तो मेरी जिंदगी की किताब में
पर क्या तआर्रुफ़ कराऊं तुम्हारा
सोचती हूँ

39 comments:

  1. Replies
    1. धन्यवाद दिनेश जी!

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  2. बहुत ही भावपूर्ण एवं सार्थक कविता,आभार शालिनी जी.

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    1. शुक्रिया राजेन्द्र जी!

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  3. बहुत उम्दा ..भाव पूर्ण रचना .. बहुत खूब अच्छी रचना इस के लिए आपको बहुत - बहुत बधाई

    आज की मेरी नई रचना जो आपकी प्रतिक्रिया का इंतजार कर रही है

    ये कैसी मोहब्बत है

    खुशबू

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  4. कई रिश्ते ..अनगढ़े..अनबूझे ही रह जाते हैं...
    उनका अस्तित्व तो होता है ...
    पर नाम..
    शायद हम भी नहीं जानते हैं

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    1. धन्यवाद सरस जी!

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  5. शालिनी जी इतनी सुन्दर रचना रची है की पढ़ते पढ़ते कहीं खो गया. शानदार रचना बधाई

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  6. बहुत खूब ... कुछ न होते हुवे भी जो होते हैं उसका परिचय कराना आसान नहीं ...

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    1. दिगंबर जी ..बहुत बहुत शुक्रिया!

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  7. ह्म्म्म......कुछ अलग सा।

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    1. धन्यवाद इमरान....

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  8. बहुत अद्भुत अहसास.बहुत खूब,

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    1. शुक्रिया मदन मोहन जी!

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  9. दिनांक 28 /02/2013 को आपकी यह पोस्ट http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जा रही हैं.आपकी प्रतिक्रिया का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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    1. हलचल में शामिल करने के लिए आभार यशवंत जी!

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  10. सुंदर प्रस्तुति!
    कुछ रिश्ते,कुछ लोग... होते हैं...तो बस होते हैं..! उन्हें किसी तार्रुफ की ज़रूरत नहीं होती शायद... या कहा जाए...उन्हें शब्दों में समाया नहीं जा सकता..
    ~सादर!!!

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    1. हमने देखी है इन आँखों कि महकती खुश्बू
      हाथ से छू के इसे रिश्तों का इलज़ाम न दो
      सिर्फ अहसास है ये रूह से महसूस करो ...... धन्यवाद अनीता!

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  11. Replies
    1. धन्यवाद निहार रंजन जी!

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  12. बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति ...

    आप भी पधारें
    ये रिश्ते ...

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    1. धनयवाद प्रतिभा जी!

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  13. "बार-बार बांचती तुम्हें .....क्या तारुफ़ कराऊं तुम्हारा "...गहरी संवेदनाओं की अभिव्यक्ति

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    Replies
    1. शुक्रिया शिखा जी ..

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  14. "बार-बार बांचती तुम्हें .....क्या तारुफ़ कराऊं तुम्हारा "...गहरी संवेदनाओं की अभिव्यक्ति
    अपने ब्लॉग का पता भी छोड़ रही हूँ .......यदि पसंद आये तो join करियेगा ....मुझे आपको अपने ब्लॉग पर पा कर बहुत ख़ुशी होगी .
    http://shikhagupta83.blogspot.in/

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    1. आपका ब्लॉग पसंद आया ..ज्वाइन भी कर लिया है!

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  15. Replies
    1. शुक्रिया जनाब!

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  16. Replies
    1. धन्यवाद मानव जी!

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  17. jindgi ke kitab pr hastakshr hi kisi ki pahachan ke liye sabse behtareen nishani hai .......behad khoob soorat rachana ke liye aabhar .

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    1. आपका स्वागत है नवीन जी!
      धन्यवाद!

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  18. सुन्दर,ऐसी रचना का तो इंतजार रहता है.आभार.

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    1. धन्यवाद डॉ. साहब!

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  19. एहसासों को खुद के एक हिस्से को कई मर्तबा नाम दे पाना बड़ा मुश्किल हो जाता है .ये भाव जगत भी बड़ी अजीब शह(शै )है .बहुत खूब -सूरत रचना .

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    Replies
    1. सही कहा वीरेंद्र जी...धन्यवाद!

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  20. Replies
    1. बहुत बहुत धन्यवाद सर!

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आपकी टिप्पणी मेरे लिए अनमोल है.अगर आपको ये पोस्ट पसंद आई ,तो अपनी कीमती राय कमेन्ट बॉक्स में जरुर दें.आपके मशवरों से मुझे बेहतर से बेहतर लिखने का हौंसला मिलता है.

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