तुम समय की धार थे, ठहरा हुआ पाषाण मैं|
न तुम रुके, न मैं बही, सजीव तुम, निष्प्राण मैं |
कण-कण घुली, रज-रज बनी, हो सूक्ष्म मैं तुममें मिली,
मिटने में थी मेरी पूर्णता, सम्पूर्णता तेरे संग चली,
अस्तित्व की कब चाह थी, तुझसे मेरी पहचान थी
न हुई पृथक न विलीन हुई तुममें, अनस्तित्व का प्रमाण मैं|


No comments:
Post a Comment
आपकी टिप्पणी मेरे लिए अनमोल है.अगर आपको ये पोस्ट पसंद आई ,तो अपनी कीमती राय कमेन्ट बॉक्स में जरुर दें.आपके मशवरों से मुझे बेहतर से बेहतर लिखने का हौंसला मिलता है.