गुमशुदा से हो गए वो, शहर छोड़े बैठे हैं
हम तो उनकी चौखट से, आस जोड़े बैठे हैं.
है गुरूर या गैरत , गैरियत है या गफलत,
अपनी है गरज फिर भी,मुँह को मोड़े बैठे हैं
अर्ज़ पर, गुज़ारिश पर भी ,खफ़ा से रहते हैं,
क्या गुमान है इतना, दिल जो तोड़े बैठे हैं .
काश अब निकल जाए, सब गुबार ये दिल का,
कितने तूफान आँखों में, दिल निचोड़े बैठे है
अब उन्हें बुलाने को कोई गुमाश्ता भेजें,
कासिदों की तो हिम्मत वो, कबकी तोड़े बैठे हैं,

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