Sunday, 17 March 2013

मनमीत (कुण्डलिया)



मनमीत से मत करियो, सखी कभी भी प्रीत|

रीता मन हो जाएगा, ऐसी है  ये  रीत  ||

ऐसी है ये रीत , हिया हर पल तडपाए |

लाख जतन करै पर , मन कहीं चैना  न पाए||

रस के हैं लोभी , उड़ जाएँ  रस के रीत|

सुन सखी भ्रमर से , होते सारे मनमीत || .

28 comments:

  1. वाह क्या बात है शालिनी वर्तमान प्रेम को बहुत ही सुन्दरता से परिभाषित किया है आपने सुन्दर कुण्डलिया आदरेया हार्दिक बधाई

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    1. अरुण जी ...आपका ह्रदय से आभार व्यक्त करती हूँ ...

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  2. बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति शालिनी जी,आभार.

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  3. मनमीत से प्रीत अपने आप ही लग जाती है ...चाहे जितने जातां करो ...

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    1. mai bhi aapki baat se poorntaya sehmat hu :-)

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    2. सहमत हूँ आपसे दिगंबर जी ...

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  4. बहुत सुंदर कुण्डली...बधाई शालनी जी,

    मन से लोभी सभी है,कभी न करियो प्रीत
    देखत फूल गुलाब का,सूंघन की है रीत
    सूंघन की है रीत,भौंरें काटते चक्कर
    करते है रसपान,भाग जाते है चखकर
    रखो हमेशा दूर,बचाओ इनको तन से
    कभी न करियो प्रीत,सभी है लोभी मन से,,,,

    Recent Post: सर्वोत्तम कृषक पुरस्कार,

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    1. धन्यवाद सर ...आपका मार्गदर्शन मिलते रहना चाहिए बस...

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  5. सुंदर रचना
    बधाई

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    1. धन्यवाद ज्योति खरे जी

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  6. बहुत सुद्नर आभार अपने अपने अंतर मन भाव को शब्दों में ढाल दिया

    आज की मेरी नई रचना आपके विचारो के इंतजार में
    एक शाम तो उधार दो

    आप भी मेरे ब्लाग का अनुसरण करे

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  7. एकदम सटीक और सार्थक प्रस्तुति आभार

    बहुत सुद्नर आभार अपने अपने अंतर मन भाव को शब्दों में ढाल दिया
    आज की मेरी नई रचना आपके विचारो के इंतजार में
    एक शाम तो उधार दो

    आप भी मेरे ब्लाग का अनुसरण करे

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  8. प्रीत की रीत ही कुछ ऐसी है... मन रीता सा हो जाता है......
    ~सादर!!!

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    1. सही कहा अनीता जी!

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  9. सुंदर भावनायें .बेह्तरीन अभिव्यक्ति.शुभकामनायें.

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    1. बहुत बहुत शुक्रिया मदन जी!

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  10. वाह......कुछ अलग सा इस बार ।

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    1. बस प्रयास है इमरान जी!

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  11. तुम आते मेरे प्राण विकल हो जाते,
    तुम जाते मेरे गान सजल हो जाते |
    तुम आते जाते घर सूना का सूना,
    तुम रहते फिर भी दुःख दूना का दूना,
    है जिसका पता न कब गरजे कब बरसे,
    तुम वही मेघ सावन के सजल घने हो,
    तुम खुले नयन के सपने हो |

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    1. धन्यवाद शेखर मिश्र जी!

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  12. तुम आते मेरे प्राण विकल हो जाते,
    तुम जाते मेरे गान सजल हो जाते,
    तुम आते जाते घर सूना का सूना,
    तुम रहते फिर भी दुःख दूना का दूना |
    है जिसका पता न कब गरजे कब बरसे,
    तुम वही मेघ सावन के सजल घने हो,
    तुम खुले नयन के सपने हो |

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  13. bahut hi khoobsurat rachna lagi mujhe man ke taar ched dene wali holi ke mauke par ekdum upyukt badhai aisi sundar rachna ke liye :-)

    कविता दिवस पर विशेष Os ki boond: कविता की खोज में ......

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  14. सुन्दर शब्द रचना..।

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  15. बहुत सराहनीय प्रस्तुति.बहुत सुंदर . आभार !

    ले के हाथ हाथों में, दिल से दिल मिला लो आज
    यारों कब मिले मौका अब छोड़ों ना कि होली है.

    मौसम आज रंगों का , छायी अब खुमारी है
    चलों सब एक रंग में हो कि आयी आज होली है

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