Saturday, 7 September 2013

एक मुट्ठी आसमान

लो फिर 
समेट लिया मैंने 
अपना आसमान
अभी कल ही तो खोली थी 
अपनी मुट्ठी मैंने 
और फैला दिया था 
दूर-दूर तक 
ताने थे सुन्दर वितान 
कुछ ख्वाहिशों के रंग से 
रंग डाला था इन्द्रधनुष 
कुछ उम्मीदों की चमक से 
चमकाया सूरज का आतिशदान 
नन्हीं-नन्हीं हसरतों के सितारे टाँके 
झिलमिला उठा मेरा आकाश 
पर न क्यूँ तुम्हें 
न भाए ... 
ये रंग, ये चमक, ये झिलमिलाहट 
बुझा कर फिर हसरतों के दिए 
बेबसी की काली चादर ढाँप
जब्त कर ली सब रंगीनियाँ फिर 
फ़र्ज़ के अंधेरों में करके गर्त उन्हें फिर 
अपनी मुट्ठी में 
लो फिर 
समेट लिया मैंने अपना आसमान 

18 comments:

  1. इसे नियति कहें तो ज़्यादा सही होगा... महिलाओं को अक्सर अपना आसमान समेटना ही पढ़ता है। बहुत सुन्दर लिखा है।

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  2. नमस्कार आपकी यह रचना कल रविवार (08-09-2013) को ब्लॉग प्रसारण पर लिंक की गई है कृपया पधारें.

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  3. बहुत सुंदर अभिव्यक्ति !!

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  4. बहुत सुन्दर प्रस्तुति.. आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी पोस्ट हिंदी ब्लॉगर्स चौपाल में शामिल की गयी और आप की इस प्रविष्टि की चर्चा आज मैं रह गया अकेला ..... - हिंदी ब्लॉगर्स चौपाल - अंकः003 पर लिंक की गयी है , ताकि अधिक से अधिक लोग आपकी रचना पढ़ सकें। कृपया आप भी पधारें, आपके विचार मेरे लिए "अमोल" होंगें | आपके नकारत्मक व सकारत्मक विचारों का स्वागत किया जायेगा | सादर ....ललित चाहार

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  5. बहुत ही सुन्दर प्रस्तुती।

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  6. क्यों किसी ख़ुशी पर दुखों का दंश चुभ जाता है अक्सर

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  7. यह नजरिया प्रत्येक इंसान पाए और अद्भुत शक्ति के साथ आसमान को थामे। आसमान को मुठ्ठी में थामने की कल्पना अदम्य आत्मविश्वास को दर्शाता है। सुंदर कल्पना।

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  8. बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति.
    http://dehatrkj.blogspot.com

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  9. behud sarthak abhiwyakti hai....aasman milta bhi hai to pankh kaha majboot hoten??

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  10. कभी कभी फर्ज की आगे सब कुछ अपने अंदर ही समेटना पड़ता है ... पर मरने नहीं देना चाहिए अपना आसमां ...

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  11. वाह वाह …… लाजवाब |

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  12. Bahut khubsurat abhivykti.dr ajay

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  13. diler logon ka kam hai ye ...ati sundar ..

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  14. फर्ज़ के तो उजाले होते हैं या होती है चक्की ,

    करो फर्ज़ अपना तुम पूरा पाओ खूब तरक्की।

    रचना संसार आपका सुन्दर है। अपने सब कर्म (फर्ज़ परवरदिगार की ख़ुशी के लिए निभाओ )परमात्मा की ख़ुशी के लिए करो यही अन्धेरा उजाला बन जाएगा। ॐ शान्ति

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  15. बंद मुठ्ठी लाख की....... वाह बहुत सुन्दर

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