Wednesday, 8 February 2012

छोटा-सा ......ख्याल

हाँ , 
बस अभी-अभी तो आया था ,
एक ख्याल,
छोटा-सा ......ख्याल 
एक नव अंकुर कि तरह 
दिल कि ज़मीन को चीर 
सर निकाल 
बस पनपना ही चाहता था,
और ज्यादा भी क्या
चाहिए था उसे 
बस 
सांत्वना कि हलकी सी बौछार 
उम्मीद के मंद मंद झोंकों का 
हौले से सहला जाना ,
हिम्मत कि कुनकुनी धूप 
और 
दो हथेलियाँ जो उसे बचा पातीं ,
उसके नव पल्लवों को सहला 
उसके पल्लवित हो पाने का 
ख्याल के असलियत में बदल जाने का 
हौंसला दे पातीं 
पर.........
ज्यों ही तनिक अंगडाई - सी  ले 
मुंदी पलकों को खोल 
देखा जो चंहु  ओर
हर निगाह 
एक सवाल बन 
उस पर ही गढ़ी थी 
सकुचा कर समेटना चाहा उसने 
पत्तियों को भीतर अपने 
अचानक 
न जाने कहाँ से 
चारों ओर सर उठाने लगीं
बंदिशों की दीवारें 
नन्हा ख्याल ......... बेतरह डर
छिप जाना चाहता था  दोबारा 
दिल की कोख में 
जहाँ से जन्मा था वो 
तभी देखीं दो हथेलियाँ , बढती अपनी ओर
कुछ उम्मीद-सी जगी  
अपने पनप पाने  की 
पर 
सहारा देने वाली वाली
वो  हथेलियाँ 
बेदर्दी से कुचल रहीं थीं उसे 
इस तरह जन्मते ही 
फ़ना हो गया 
वो एक छोटा-सा ख्याल............

Tuesday, 7 February 2012


न शेर ओ शायरी की अक्ल , 
न गीत ओ गज़ल की समझ .
न ही कविता रचने का शऊर,
न नज़्म गढ़ पाने का माद्दा .
बस कुछ शब्द टूटे फूटे से,
कुछ भाव अनबूझे-अनकहे से.
जुबां पर लाने की जुर्रत में ,
ख्वाब कितने ही फिसल छूटे.
कहीं कल्पना की अधूरी - सी उड़ान  
कहीं असलियत का अधसिला जामा
किसे पकडें, किसे छोड़े की कशमकश में 
हर बार अधूरी रह जाती मेरी.... 'अनुभूति'   

Monday, 6 February 2012

वाकिफ़ हो तुम........

इस दिल कि हर एक धडकन से ,पल - पल बढती इस उलझन से, 
मुँह  फेर  लिया तुमने तो क्या, वाकिफ़ हो तुम भी अनजान नहीं,

जज़्बात तुम्हारे दिल में भी , सर जब-तब अपना उठाते है 
क्यों गला घोटते तुम इनका, आशिक हो,कातिल -सैयाद नहीं. 

इंतज़ार की लम्बी घड़ियों का, हिसाब तुम्हें भी हर-पल का 
अपनी ही चिट्ठी लिख के  फाड़ो, कातिब हो, अपने रकीब नहीं.

गढ़ते हर रोज़ नया किस्सा , करते हर रोज़ नया नखरा,
नहीं मिलना तो न मिलो हमसे, हम भी कुछ कम खुद्दार नहीं 

हाँ, सच है दिल पे जोर कभी , होगा न हुआ है अब तक कभी ,
ये जोर अजमाइश फिर क्यों कर , क्या खुद पे तुम्हें एतबार  नहीं.

कुछ ख्वाब अभी तक बाकी  है , उम्मीद भी शीशा ए दिल में   
तुम आओ, आके तोड़ो इन्हें, बस इतना ही अब इंतज़ार सही .


Thursday, 2 February 2012

मेरी उम्मीद ...



कुछ टूटकर बिखर- सा जाता है ,
हर बार दिल के कोने में कहीं .
कुछ चटकने की -सी 
सदा आती है 
और फिर दूर तलक 
किरच- किरच हो 
कुछ टूटकर बिखर जाता है 


 कई बार सोचा कि आखिर 
क्या शै है यह 
जो रोज टूट कर भी नहीं टूटती 
हर बार फिर 
किसी और रूप में 
फिर से 
नई सी बन 
फिर जी उठती है .....
जिंदगी के सख्त  रास्तों पे 
बढ़ने को 
फिर धकेलती है आगे 
बस उसी के जीवट के सहारे 
कटता जाता है जीवन 
 छोड़  जाते हैं कितने ही अपने 
मगर 
ये है कि 
टूट कर भी नहीं छूटती 
मेरी उम्मीद .......................

Monday, 9 January 2012

कभी यों भी हो .........

खुदा करे  कभी,  यों भी बसर हो जाये 
नींद तेरी उड़े ,और सुकून से हम सोया करें
  
तडपे तू भी  हर पल  हमसे मिलने को कभी 
बेखबर हो हम तुझसे और चैन दिल को मिले
  
एक अजीब सी ख्वाहिश जगी है दिल में आज  
वो टूट के चाहे और हम , बेवफा हो जाएँ   


उनके लब औ नाम मेरा , या खुदा कहीं सपना तो नहीं.
क्योंकर गुमाँ ये दिल को हुआ, पुकारा किसी ने हौले से सही .

हों सफर में भले तनहा ही , साया अपना मगर साथ होता है.
हमसफ़र के गुमाँ में अक्सर, सफर तनहा ही तमाम होता है .

चिर वियोग


जब मिलन से ज्यादा वियोग भाने  लगे
विरह का दर्द आत्मा में आनंद जगाने लगे
प्रतीक्षा के पल, संजोग के क्षणों पे भारी पड़ें 
प्रेम की कैसा अद्भुत  स्वप्निल यह संसार , प्रिय




किसे अभिलाषा, प्रिय  मिलन की
चिर वियोग मुझे प्यारा है
चिर मिलन की चिर प्रतीक्षा में
चिर अभिसार  मुझे प्यारा है

इक पल का मिलन औ
जीवन भर तड़पन,
इक पल संयोग फिर
तडपे विरहन
आंसू , आहें, तड़पन , उलझन
विरहन की तो बस ये थाती

कुछ पल संयोग को
क्यों कोश ये  खोना
एक एक आंसू पलकों में संजोना
यही चिरकोश मुझे प्यारा है .

अज्ञात मिलन की
अनंत प्रतीक्षा में
सपनों को बुन, आस पिरोना
पलक - पावड़े बिछा के पथ पे
पल पल अपलक
बाट संजोना
व्याकुलता ही बस अब गहना
धीर धरना अब किसे प्यारा  है

किसे चाहिए मिलन प्रिय
चिर वियोग ही मुझे प्यारा है ...

  

Sunday, 8 January 2012

ख़ामोशी

ख़ामोशी

 कब से खामोश पड़ी है ये कलम ,
कब से चुपचाप हैं ख्यालात मेरे ,
दिल पे छाया है कब से  कोहरा घना
सर्द आहों से बर्फ बन गए अश्क मेरे

जुबां से निकलते अल्फाजों को
बंदिश  हज़ार हर तरफ से घेर लेती है
जज्बातों की सुलगती आंच को
राख जिम्मेदारियों की बुझाये  देती  है

अपनी ही आवाज़ सुनाने को
हर साँस- साँस अकुलाती है
चीख सन्नाटे की कानों को चीर
दिल  की गहराई में  समा जाती है

हलक में दम तोडती आवाज़ अब
चीख बन चिल्लाना चाहती है
हर गुनगुनाहट अब राग बन
लबों पे सज जाना चाहती है

घने कुहासे के पीछे, धीमी  ही,  मगर
रह - रह चमक उठती एक लौ  कहीं
घुट रही पल-पल अँधेरे में मगर
लपट बन भडकना चाहती है




Wednesday, 23 November 2011

देह से परे

देह की सीमा से परे
बन जाना चाहती हूँ
एक ख्याल
एक एहसास ,
जो होते हुए भी नज़र न आये
हाथों से छुआ न जाए
आगोश में लिया न जाए
फिर भी
रोम - रोम पुलकित कर जाए
हर क्षण
आत्मा को तुम्हारी
विभोर कर जाए


वक्त की सीमा से परे
बन जाना चाहती हूँ वो लम्हा
जो समय की रफ़्तार तोड़
ठहर जाए
एक - एक गोशा जिसका
जी भर जी लेने तक
जो  मुट्ठी से
फिसलने न पाए


तड़पना  चाहती हूँ
दिन - रात
सीने में
एक खलिश बन
समेट लेना चाहती हूँ
बेचैनियों का हुजूम
और फिर
सुकून की हसरत में
लम्हा लम्हा
बिखर जाना चाहती  हूँ


बूँद नहीं
उसका गीलापन  बन
दिल की सूखी ज़मीन  को
भीतर तक सरसाना
हवा की छुअन बन
मन के तारों को
झनझना
चाहती हूँ गीत की रागिनी  बन 
होंठों पे बिखर - बिखर जाना 


जिस्म 
और जिस्म से जुड़े 
हर बंधन को तोड़ 
अनंत तक ..........असीम बन  जाना 
चाहती हूँ 
बस........................................................
यही चाहत 



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