Tuesday, 4 December 2012

पैगाम

1.
आज हौले से मेरा नाम कहीं, तेरे लबों पे चला आया है,
सरसराहट ने हवा की ये पैगाम.हम तलक पहुँचाया है.


याद  करके  मुझे, तूने  कहीं,  ठंडी  आह  भरी  है
दरिया के दामन पे बिछी,चांदनी ने ये  पैगाम दिया है.


सूरज की तपिश में थी, तेरे  जिस्म की हरारत 
लिपट के किरणों ने दामन से,तेरा अहसास दिया है .


कल तलक गैर था जो, आज है हमनवां मेरा 
तूने  न सही,  हमने ये हक़  खुद को दिया है 


2.



सरसराहटों में हवा की थी
एक मदहोश  सी खनक,
भूले  से  कहीं तूने
मेरा नाम लिया होगा

हिचकियाँ हैं कि
रुकने को तैयार नहीं हैं,
ज़िक्र मेरा कहीं तूने
सरेआम किया होगा .

शाख-ए-गुल लिपट कदमों से  
रोकती थी जाने से हमें
शायद जाते - जाते तूने 
मुड़ के हमें देख लिया होगा. 

पेश कदमी को तो तूने भी 
कोशिश हर बार  की 
हर बार किसी हिचक ने 
जुबां को रोक लिया होगा. 





20 comments:

  1. हिचकियाँ हैं की रोकने को तैयार नही हैं ,
    जिक्र मेरा कहीं तूने सरे आम किया होगा।
    इस शेर पर तो आपको अवार्ड मिलना चाहिए।
    बहुत ही सुन्दर नक्षा खिंचा है, ख़ास कर ये शेर को मैंने कई बार पढ़ा।

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    1. धन्यवाद आमिर भाई! आपकी सराहना से हमेशा ही हौंसला अफजाई होती है.

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  2. शब्दों की जीवंत भावनाएं... सुन्दर चित्रांकन.
    बहुत सुंदर भावनायें और शब्द भी.बेह्तरीन अभिव्यक्ति!शुभकामनायें.
    आपका ब्लॉग देखा मैने और कुछ अपने विचारो से हमें भी अवगत करवाते रहिये.

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    1. मदन जी ...आपके प्रेरणादायक शब्दों के लिए हृदय से आभारी हूँ.

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  3. वाह, बेहतरीन , दिल को छूती नज्में।
    सादर
    देवेंद्र
    शिवमेवम् सकलम् जगत,

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    1. ब्लॉग पर आने व प्रशंसा कर होंसला बढ़ाने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद देवेन्द्र जी !

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  4. बहुत उम्दा खूबशूरत नज्म के लिए ,,,शालिनी जी,,बधाई,,

    recent post: बात न करो,

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  5. ले लिया है बेखुदी में खुद अपना ही नाम ...
    क्या तूने कही चुपके से पुकारा है !!
    कभी लिखा ऐसा भी मैंने , इन्ही अनुभूतियों से गुजरते :)

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    1. बहुत खूब लिखा है आपने वाणी जी...
      सधन्यवाद!

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  6. दिल का हर तार छेंड़ इक नया गीत सजाती पंक्तियाँ बेहद लाजवाब सुन्दर अति सुन्दर, बधाई स्वीकारें

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    1. धन्यबाद अनंत जी!

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  7. बहुत ही बेहतरीन नज्मे. बहुत बहुत बधाई शालिनी जी इस प्रस्तुति के लिये.

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    Replies
    1. हार्दिक आभार रचना जी!

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  8. कल तलक गैर था जो,आज है हमनवां मेरा
    तूने न सही ,हमने ये हक खुद को दिया है।

    बेहतरीन गज़ल नज्म भी खूब लगी ....ये शेर तो काफ़ी प्रभावित करने वाला है

    मेरी नयी पोस्ट पर आपका स्वागत है
    http://rohitasghorela.blogspot.in/2012/12/blog-post.html

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  9. Replies
    1. हार्दिक आभार शिखा जी,

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  10. प्रेम की पराकाष्ठा है दोनों ही नज्मों में ....
    कोमल प्रसंगों को धीरे से छेड़ा है ..

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    1. आपकी टिप्पणियां सदैव ही प्रेरक होती हैं ..धन्यवाद दिगंबर जी!

      Delete

आपकी टिप्पणी मेरे लिए अनमोल है.अगर आपको ये पोस्ट पसंद आई ,तो अपनी कीमती राय कमेन्ट बॉक्स में जरुर दें.आपके मशवरों से मुझे बेहतर से बेहतर लिखने का हौंसला मिलता है.

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