Sunday, 28 August 2011

ये मशाल न बुझने देना 

मंजिल नहीं ये एक कदम है 
दूर लक्ष्य और जटिल डगर है
थक कर रुकना अभी नहीं संभव है
दूर गगन छूने  से पहले 
ये परवाज़ न रुकने देना

युगों तक छाये  घोर तिमिर की
लंबी काली अमावस रात्रि 
मानस को कर चुकी ग्रसित है
जो सुलगी है इस निशा नाश को
ये मशाल न बुझने देना 

आज चले  जो कदम अनगिनत 
कोटि कंठों से फूटी स्वरधारा 
हर दिल से अब  गूँज रहा है
वन्दे मातरम का ही नारा 
जन जन में अलख जगाने को
ये इन्कलाब न दबने  देना

पूर्ण परिवर्तन के वास्ते, 
जन प्रतिकार अभी चाहिए.
करने को संधान लक्ष्य का,
सतत तपस्या अभी चाहिए.
जब आग न पूरी भड़के ,
चिंगारी मद्धम न होने  देना.

ये मशाल न बुझने देना 

Saturday, 23 July 2011

जो मैं भी कविता लिख पाती


मन के उलझे से भावों का
इक ताना बाना बुन पाती ,
साँसों की सरगम पे कोई
गीत नया सा रच पाती ,
तो मैं भी कविता लिख पाती ......

पर पारे जैसे भाव मेरे , हाथ कहाँ आ पाते हैं .
रेत पे बनती रेखाओं से , बनते - मिटते जाते हैं .
कल्पना के घन कानन में , कस्तूरी मृग सा भटकाते हैं.
प्रतिपल रूप बदल अपना , माया से  भरमाते हैं ,

इन्द्रधनुष का छोर पकड़ , जो मैं भी ऊपर चढ पाती
तो मैं भी कविता लिख पाती ........

मरुस्थल में जल के  भ्रम से , दूर कहीं दिख जाते हैं .
चंचल चपला से चमक दिखा , घन अवगुण्ठन में छिप जाते हैं ,
इक पल लगता कि हाथ बढ़ा के , मुट्ठी में भर पाऊँगी,
पर कागज तक आते -आते, फिर शब्द कहीं खो जाते हैं 

इन आडी तिरछी रेखाओं से , जो चित्र कोई में रच पाती ,
तो मैं भी कविता लिख पाती ......... 


Monday, 4 July 2011

स्वेच्छाचारी विचार

लहरों की तरह मन में 
सर उठाते विचार
घन बीच तड़ित से
कौंधते बार बार.
सिरा पकड़ने की कोशिश में
हर बार हाथ से
सिकता ज्यों फिसल जाते
 जल में  मीन बन जाते
हाथ न आते विचार

एक  दूसरे  को  काटते 
मचाते घमासान द्वंद्व
मन की कोमल भावनाओं  पर  
करते  जाते कठोर प्रहार


 तोड़ कर नियंत्रण की हर सीमा 
पागल, बेलगाम अश्व से,
बेखौफ पार कर जाते 
हर बंध,   हरेक दीवार.


सोचती मैं कभी तो,
 रख पाऊँगी इन्हें अपने वश में,
मुंह चिढ़ा आगे बढ़ जाते
छोड़ जाते मुझे लाचार .


न कोई आदि है इनका न अंत
न कोई सीमा न बंध
कामनाओ  के  विस्तृत नभ  में
पक्षियों से स्वेच्छाचारी विचार


Saturday, 11 June 2011

अवसाद के पल
 अवसाद .... या dipression ... हर शख्स अपनी ज़िन्दगी  में कभी न कभी मायूसी के कुछ लम्हात को झेलता ही है ... तब तमाम कायनात उसे फीकी सी नज़र आती है .... इस क्षण को कविता के रूप में

आखिर कब तक

जीने का अर्थ
क्या सिफ जीना
और सांस लेते जाना
उधर मांगे से पलों में
एक सांस भी अपनी न पाना
अपनी ही लाश
कंधे पर लादे
सफ़र ख़त्म होने के इंतज़ार में
बस चलते चले जाना
हमसफ़र के धोखे में
अकेले ही
सफ़र तय करते जाना
मायूसी की   सियाह रात में ,
रोशनी का एक कतरा तलाशते हुए 
बदहवास से जागते जाना
एक सवाल
जो हरदम मुंह बाएं खड़ा रहता है
उससे नज़रे चुरा
बच के निकल जाना
आखिर कब तक
उठाएंगी बोझ साँसें
इस उधार की  गठरी का
कभी तो थकेगा ये तन
जीने का दिखावा करते करते

 

Friday, 10 June 2011

आफताब हूँ


आफताब हूँ ,ताउम्र झुलसता - जलता रहा हूँ
पर सौगात चांदनी की तुझे दिए जा रहा हूँ मैं .
रातों के सर्द साए तेरे आंचल पे बिछा,
खुद फलक से दरिया में छिपा जा रहा हूँ मैं .
जलें न मेरी रौशनी  कहीं चश्म ए तर तेरे ,
सितारों की बारात सजाये  जा रहा हूँ मैं.


Tuesday, 7 June 2011

                        

फूला पलाश 

प्रिये!
जब तुम प्रथम बार मिले थे,        
तब भी फूल रहा था
जंगल में चहुँ ओर पलाश 
रक्तिम पुष्प
बने थे साक्षी,
अपने प्रथम मिलन के
पुष्पों की लाली  छितर गई थी,
दोनों के आनन पे
दूर तक फैले पेड़ों के
गलियारे में,
फूलों के गलीचे पे
साथ-साथ चहल कदमी करते,
जब कभी छू जाता था
औचक ही हाथ तुम्हारा,
सिहर सिहर उठता था ये तन,
पुलकित हो रहता मन बंजारा 
हवा के एक चंचल झोके ने
लाल पुष्प एक ,
अटका दिया था 
केशों में मेरे जब,
सम्मोहित हो, वो अपलक
देखना तुम्हारा,
और मेरा खुद में ही 
सिमट - सिमट जाना
याद अभी हैं वो बेसुध शामें,
काटी थी अक्सर
इसी पलाश तले
एक दूजे की आँखों में खोये,
कुछ न कह, सब कुछ कहते
यही पलाश तो रहा हमारे
मूक प्रेम का , मूक साक्षी
दिन बदले, मौसम बदले
ऋतु आई और ऋतु बीती
फिर आने का वादा कर
जो गए प्रिये तुम एक बार
कितनी ही बार
फूला और झरा है 
इस जंगल में
लाल पलाश
                                                  

Sunday, 5 June 2011

तुम कहते हो

तुम कहते हो तो......        
झूठ ही होगा   
 साँसों की  हलचल, दिल की धड़कन
जीने का सलीका हम क्या जाने ?
नज़रों में तुम्हारी  था महज़ जुनूँ एक 
तो  प्यार नहीं   दीवानापन  होगा 

वो कसमें वादे, शिकवे वो शिकायत
आहें भरना ,  भरोसा  दिलाना
दिल नहीं दिमाग का  खेल था वो 
तुम कहते हो तो  शायद सौदा  ही होगा

( उर्दू शायरी मेरे लिए कुछ नहीं बहुत मुश्किल है .... फिर भी एक प्रयास किया है ....)

जीवन की परीक्षा में



परीक्षा में बैठे , परीक्षार्थियों से 
प्रश्न पत्र को उलटते पलटते 
उत्तरों को अपनी यादों में टटोलते 
कभी खिन्न , कभी प्रसन्न.
घडी की सुइयों के साथ दौड़ लगाते
परिणाम की कभी आशा 
और कभी आशंका लिए 
परीक्षार्थियों से हम 
जीवन रुपी परीक्षा में
पल पल परीक्षा देते
अंतर मात्र इतना ही
उनके सामने हैं प्रश्न पत्र
और ज़िन्दगी हमारे आगे
रोज़ एक नया प्रश्न उठाती
और बिना पूर्व तैयारी के ही
उतर पड़ते हैं मैदान में
हर क्षण अनुत्तीर्ण होने की
आशंका लिए
करते जाते हैं हल
ज़िन्दगी के अनोखे
अनुत्तरित पल ........


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