Saturday, 8 June 2013

तन धूप जले


सवैया ( दुर्मिल )


सखि दोपहरी दिन ताप बढ़े, अकुलाय जिया तन धूप जले|

वन कानन भीतर जाय छिपी अब छाहन भी नित जाय छले |

मद में निज जेठ,मही जलती, सगरे जन के मन कोप खले|

घर भीतर बैठ करें बतियाँ कुछ ठंडक हो जब पंख झले||

14 comments:

  1. बहुत सुन्दर और मनभावन प्रस्तुति...

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  2. शुभप्रभात
    सच्ची तस्वीर उकेरती रचना
    हार्दिक शुभकामनायें

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  3. सुंदर सवैय्या आजकल के मौसम से उपजी प्रस्थितिओं का लेखा.

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  4. आधुनिक संदर्भ और काव्यशास्त्रीय कलात्मकता सुंदरता को और निखार देती है इसका परिचय आपके सवैया से मिल रहा है।

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  5. बहुत ही बेहतरीन और सार्थक प्रस्तुति,आभार।

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  6. इस साहित्यिक सृजन के लिए बहुत-बहुत बधाई शालिनी मैम ! बहुत बढ़िया।

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  7. शानदार,बहुत ही उम्दा प्रस्तुति,,,बधाई शालिनी जी ,,

    RECENT POST: हमने गजल पढी, (150 वीं पोस्ट )

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  8. अनुपम .. मनभावन ... मज़ा आ गया ..

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  9. आदरणीया शालिनी जी
    ग्रीष्म की तपन का बहुत सुन्दर उल्लेख ...बहुत अच्छी रचना ..आप के ब्लॉग से जुड़ के और ब्लॉग प्रसारण से यहाँ पहुँच बहुत अच्छा लगा ..
    जय श्री राधे
    भ्रमर ५

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  10. वाह.......अति सुन्दर ......

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