Monday, 12 June 2017
कामनाएँ
कभी
नष्ट नहीं हो पातीं,
चाहे
अचेतन की गहराई में दफनाओ,
या
चेतना की आग में जलाओ
अपनी
ही राख से
फिर-फिर
पैदा हो जाती हैं ...
फिनिक्स
जैसी|
कितनी
ही बार
अपने
ही हाथों क़त्ल किए जाने पर भी
अपने
ही रक्त में,
फिर
पनप जाती हैं
रक्तबीज-सी|
कामनाएँ
.... अमरता का
न
जाने कौन-सा वरदान ... या
अपूर्णता
का
कौन-सा
अभिशाप
साथ
लेकर जन्मती हैं|
छिन्न-विछिन्न
अपने
घावों को संग लिए
घिसती-भटकती
है
अश्वत्थामा-सी
..................कामनाएँ
शालिनी
रस्तौगी
तू मेरे जीवन का अमृत
तू
मेरे जीवन का अमृत, तू
ही है जीवन हाला|
तू
ही मधुरस है जीवन का, तू ही है विष का प्याला|
हैं
कैसे तार जुड़े तुमसे, क्यों स्वर ये एकाकार हुए,
बन
जीवन का गीत कभी, तुम मुझमें साकार हुए,
मन
वीणा के तार छेड़, अंतर को झंकृत कर डाला|
तू
मेरे जीवन ............
कभी
टूटे सुर-से रूठे तुम, कभी मधुयामिनी राग हुए,
प्रीत
रंग-रस सरसे तो, कभी जोगी बन विराग हुए,
शीतल
मंद बयार कभी, दहके बन करके ज्वाला|
तू
मेरे जीवन का अमृत ......
शालिनी
रस्तौगी
Sunday, 11 June 2017
रिक्तता
रिक्तता से भरा मन
अक्सर
बहुत शोर मचाता है|
जब न कहने को कुछ
न सुनने को बाक़ी हो,
तब अपने-आप से ही
बोलता बड़बड़ाता है|
खुद के दिए तर्क
खुद ही काटता|
बेवजह की सोच पर
वज़ह के किस्से बाँचता,
ख़लिश से कभी
तो कभी ख़ला से
घबराता, खुद से टकराता है|
कितनी बार खुद में डूब-उतर कर
फिर खाली लौट आता है|
जब रिक्त होता है ये मन
तो जाने क्यों भर जाता है?
शालिनी रस्तौगी
Friday, 9 June 2017
लिख नहीं पाती कलम
लिख नहीं पाती कलम, कुछ कष्टों, कुछ पीड़ाओं को,
भाग्य ने लिख दिया स्वयं हो, चेहरे पर जिन
व्यथाओं को|
घनीभूत दुःख की रेखाएँ, चित्रित कर देती
हैं व्यथाएँ,
धूसर उदास रंगों से, भर जाती सारी
कल्पनाएँ|
जीवन फलक पर रच दिया, चित्रकार ने
यंत्रणाओं को|
लिख नहीं पाती कलम ......
यादें सुखद संयोग की, दुःख बदली बन मन पर
छाती हैं,
पलकें पल-पल बोझिल होतीं, अविरल बूँदें झर
जाती हैं|
तड़ित बन गिरती तड़प, बरसाती हैं उल्काओं
को|
लिख नहीं पाती कलम.....
कहते सब कि नियति थी यह, हुआ वही जो होना था,
पर क्रीड़ा क्रूर विधि की थी, ये अनहोनी का होना
था|
विदीर्ण हृदय कैसे सँभले सुन, तथ्यहीन सांत्वनाओं
को
लिख नहीं पाती कलम .....
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शालिनी रस्तौगी
मालि क की रज़ा क्या है ( ग़ज़ल )
फ़िक्र में क्यों हैं, गलत क्या औ वज़ा
क्या है
आप क्या जाने बेअक्ली का मज़ा क्या क्या है ?.
आप क्या जाने बेअक्ली का मज़ा क्या क्या है ?.
बन गया है जो यूँ खुदमुख्तार तू अपना
जानता भी है कि मालिक की रज़ा क्या है ?
कह के ‘हाँ’ जो तुम यूँ वादे से मुकर जाते हो
जो नहीं है यह तो फिर बोलो कज़ा क्या है ?
तीर,खंजर कैद औ फाँसी से क्या होता है,
जो पशेमां खुद उसे और सज़ा क्या है?
दिल तो निकाल के जाने कब का तुझे दिया
धड़क रहा है सीने में, जाने ये पुर्ज़ा क्या है|
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