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Friday, 12 May 2017
Tuesday, 19 February 2013
खयाल यूँ ही
1.
हरेक बार वो, हरेक बात पे खफा होके ,
तीर से तंज का तोहफा हमें देता है
नादानी की उसकी ज़रा हद तो देखो
जिस दिल में बसे, उसे ही तोड़ देता है
2.
कितनी बेमुरव्वती से ताकीद की थी उसने
जाना है तो जाओ फिर लौट के मत आना
उसके जाते हुए क़दमों के निशां देखते हम खड़े थे
कूचा-ए-यार के सिवा कहाँ अपना कोई ठिकाना
बेसाख्ता ही निकल गया उसका नाम लबों से
हमने तो परस्तिश में खुदा की हाथ अपने उठाए थे ,
काफिर बना गया फिर तसब्बुर उस बुत का,
आँखे बंद कर जब, सजदे में सर अपना झुकाए थे
4.
महफिल-ए-शमा की रौनक थी शबाब पे,
इक जूनून-सा था परवानों की जमात में,
कौन उस बेदर्द हुस्न के हुज़ूर में जाँ देकर
नाम दाखिल करवाता दीवानों के दीवान में .
5.
इन्तेज़ार का दिन ढलने चला था ,
उम्मीद की शम्मा को जलाया हमने
कतरा-कतरा मोम बनके पिघलती रहीं हसरतें दिल में
आखिरी साँस इधर शमा ने ली, उधर दिन निकल आया .
Sunday, 30 December 2012
मगरूर
गुरुर में हो गाफ़िल, कि दिल नवाजी से, साफ़ बचते हो
मसरूफियत है या कि बेरुखी जो हमें, दरकिनार किए रखते हो .
पेशानी पे त्योंरियाँ, तल्खी औ तंज जुबां पे हरदम
ज़माने भर की नाराज़गी, हम पे ही बयाँ करते हो
चार दिन की जिंदगानी में क्यूँकर हज़ार शिकवे- गिले
मुहब्बत से मिला करो , दुश्मन से भी अगर मिलते हो .
इस शहर में न मिलेगा, हम-सा तुम्हें ए दोस्त कोई,
क्यों बेगानों की भीड़ में, दोस्तों का गुमां रखते हो .
बस बच रहा वो ही कि जिसने, ज़रा-सी लचक रखी खुद में
कि टूट जाओगे चटक के जो न , झुकाने का हुनर रखते हो.
हक किसने दिया हुस्न या कि इश्क को मगरूर होने का
बिन एक के दूजे की गुज़र, कैसे-कैसे मजाक करते हो
Friday, 19 October 2012
बातें कुछ यहाँ - वहाँ की
बहुत से शेर इधर उधर लिख कर छोड़ दिए .... आज सोचा..... क्यों न कुछ शेरों को समेटा जाए ....
1,बेबसी
कायदा सीखा न कभी ककहरा पढ़ा शायरी का,
मोहतरम शायर होने का गुमां लिए फिरते हैं.
कभी काफिया तंग हो जाता है, तो कभी,
लफ्ज़ कतरा-कतरा के निकल जाया करते हैं .
( यह मैंने सिर्फ अपने लिए लिखा है... कृपया कोई भी इसे अन्यथा न ले|)
2. इज़हार-ए-मुहब्बत
अश्क के पलक की कोर तक आते - आते
राज ए दिल ज़ुबां की नोक तक आते - आते
नामालूम कितनी सदियाँ बीत गई
अपनी मुहब्बत ए सनम जताते - जताते
3. बेरुखी
यूँ तो मुद्दतों उनसे मुलाकात नहीं होती
आमने-सामने होते हैं मगर बात नहीं होती.
वो तो देख के भी फेर लेते हैं नज़रें हमसे,
अपनी निगाह भी कभी गुस्ताख नहीं होती.
कहने को तो हजार बातें हैं लबों में दबी हुई
मगर क्या करें दिल की तो जुबान नहीं होती,
कांपने लगते हैं लब लड़खड़ा जाती है जुबान
बेरुखी उनकी ए दिल अब बर्दाश्त नहीं होती
उसका दिया हर जख्म था हर्फ़ की मानिंद
उकेरा हुआ किताब ए दिल के हर वरक पे
लाख कोशिश की मगर, मिटाया न गया
मिटाना जो चाहा तो मिट गई हस्ती दिल की
5. शीशा-ए-दिल
लाख कोशिश की मगर, मिटाया न गया
मिटाना जो चाहा तो मिट गई हस्ती दिल की
5. शीशा-ए-दिल
वैसे तो टुकड़े किये हैं हजार बार उसने दिल के ,
हर बार बड़े जतन से हमने उन्हें जोड़ा है .
जोड़ना चाहें भी तो अब न जुड़ेगा फिर से ,
अबकि किरच-किरच कर उसने दिल छोड़ा है .
हर बार बड़े जतन से हमने उन्हें जोड़ा है .
जोड़ना चाहें भी तो अब न जुड़ेगा फिर से ,
अबकि किरच-किरच कर उसने दिल छोड़ा है .
6. संगदिल
अब कौन बात करे उस संगदिल से दिल नवाजी की
हर बात का जो दो टूक जवाब दिया करते हैं
बने फिरते हैं बड़े सख्त दिल जो दुनिया के लिए
अपने सवाल पर अश्क अक्सर बहाया करते हैं
7.आफताब
आफताब हूँ ,ताउम्र झुलसता - जलता रहा हूँ
पर सौगात चांदनी की तुझे दिए जा रहा हूँ मैं .
रातों के सर्द साए तेरे आंचल पे बिछा कर
खुद फलक से दरिया में छिपा जा रहा हूँ मैं .
खुद फलक से दरिया में छिपा जा रहा हूँ मैं .
जलें न मेरी आंच से कहीं चश्म-ए-तर तेरे ,
सितारों की बारात छोड़े जा रहा हूँ मैं.
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