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Friday, 3 January 2025

किन भावों का वरण करूँ मैं?

 हर पल घटते नए घटनाक्रम में,

ऊबड़-खाबड़ में, कभी समतल में,
उथल-पुथल और उहापोह में,
किन भावों का वरण करूँ मैं ?
एक भाव रहता नहीं टिककर,
कुछ नया घटित फिर हो जाता|
जब तक उसको मैं सोचने बैठूँ,
किसी और दिशा कुछ ले जाता|
क्या-कुछ-कब-कैसे-कितना के ,
चक्कर में कब तक भमण करूँ मैं?
किन भावों का वरण करूँ मैं?
विद्रूप-विकट कुछ घट जब मन में,
विद्रोह-विषाद-विरक्ति लाता |
सब तहस-नहस कर नव रचना को,
हो अधीर मन है अकुलाता|
कर चिंतन एक नई आस का,
नैराश्य-त्रास का क्षरण करूँ मैं|
किन भावों का वरण करूँ मैं?
कुछ मेरे अंतस के सपने,
सपनों में धूमिल होते अपने|
अपनों को चुनना या सपने बुनना,
किसको पाने में छूटे कितने |
हानि-लाभ क्या गणन करूँ मैं ?
किन भावों का वरण करूँ मैं?
~~~~~~~~~~
शालिनी रस्तौगी

Thursday, 19 September 2024

अब चक्र सुदर्शन उठाओ ना।


 बहुत सुना दी मुरली धुन मीठी ,

अब चक्र सुदर्शन उठाओ ना।
मोहित-मोहक रूप दिखा कर,
मोह चुके मनमोहन मन को,
अधर्म मिटाने इस धरती से ,
धर्म सनातन की रक्षा हित,
फिर रूप विराट दिखाओ ना ।
फिर रण-क्षेत्र में भ्रमित पार्थ है,
बंधु जिनको समझा व्याल हैं,
फिर अस्त्र त्याग कर , हाथ जोड़
अर्जुन क्लीव सम करता विलाप है,
आँखों पर आच्छादित भ्रम,
कर बैठा गांडीव त्याग है।
फिर गीता उपदेश सुनाकर,
पांचजन्य उद्घोष से केशव,
सुप्त चेतना जगाओ ना।
भक्ति कायरता न बन जाए,
शत्रु की ताक़त न बन पाए ,
अस्त्र-शस्त्र से मोह भंग
शस्त्र न दुश्मन का बन जाए,
भ्रम-मोह-विलास-कायरता,
पाश अकर्मण्यता बँधी चेतना,
सुप्त सनातन की शक्ति को
फिर झकझोर उठाओ ना
कुरुक्षेत्र सज्जित है फिर से
रणभेरी विपुल बजाओ ना
अपनी शक्ति, सामर्थ्य, समझ का
कुछ अंश युवाओं को देकर,
बाहों में शक्ति अतुल्य,
बुद्धि- विचार-विवेक बल देकर
धर्म-रक्षा , अधर्म-नाश हित,
फिर पार्थ समान बनाओ ना ।
बहुत सुना दी मुरली धुन मीठी
अब चक्र सुदर्शन उठाओ ना।
~~~~~~~~~
शालिनी रस्तौगी

कौन -सा पथ मैं चुनूँ

 


कौन -सा पथ मैं चुनूँ
है कुहासा हर तरफ़, हर राह है बाधा भरी,
कुछ दूरी पर हर ओर ही, दीवार-सी मानो खड़ी |
साफ़ जब मंजिल नहीं तो, किस तरफ आगे बढूँ ?
कौन-सा पथ मैं चुनूँ?

मेरे होने का यहाँ, कारण कोई बतलाए तो ,
अस्तित्व को मेरे कोई, अभिप्राय तो मिल जाए जो,
उत्तर मेरे इन प्रश्नों के, प्राप्त जिससे कर सकूँ
कौन-सा पथ मैं चुनूँ?

गतिहीनता बेड़ी बनी, पाँव है मेरे पड़ी,
द्वंद्व का है शोर मन में, संशय में प्रज्ञा जड़ी|
थाम लो उँगली प्रभु, भव-सिन्धु से मैं भी तरूँ,
तेरी ओर लेकर जाए जो, बस वही पथ मैं चुनूँ |
~~~~~~~~~~~~~
शालिनी रस्तौगी

Sunday, 17 April 2022

रीता मन

 

रीता मन - रीते नयन, भीगे-भीगे पल क्या लिखूँ?

सूना आँगन - सूना उपवन, उल्लास प्रेम का क्या लिखूँ?

 

वे सावन संग भीगे थे हम, रुत वसंत झूमे थे संग,

मकरंद प्रेम का बिखरा था, बूँदों में तन-मन पिघला था,

तुम संग सब मौसम बीते, पतझड़ का सूनापन क्या लिखूँ ?

 

वो हाथ लिए हाथों में जब, आँखों में बातें होती थीं,

पुलकित-पुलकित दिन होते थे, पूनम की रातें होती थीं ,

तुम संग गए सभी उजियारे, मावस का तम क्या लिखूँ ?

  

Thursday, 2 January 2020

स्वागत गीत

मुखरित है मन का आँगन, सुरभित है हर द्वार।
तव चरणों की आहट से, स्पंदित मन के तार।
1. नव उमंग से पुलकित हृदय,
 मुस्कानों के विकसित किसलय।
पग- पग पर सानंद जताती, प्रकृति है आभार।
मुखरित है मन का आँगन, सुरभित है हर द्वार।
तव चरणों की आहट से, स्पंदित मन के तार।
2. हर्षित स्वर लहरी से गुंजित,
    चहुँ ओर आनंद अपरिमित,
आह्लादित हो करते हम, अभिनंदन बारंबार।
मुखरित है मन का आँगन, सुरभित है हर द्वार।
तव चरणों की आहट से, स्पंदित मन के तार।

Monday, 12 June 2017

तू मेरे जीवन का अमृत


तू मेरे जीवन का अमृत, तू  ही है जीवन हाला|
तू ही मधुरस है जीवन का, तू ही है विष का प्याला|
हैं कैसे तार जुड़े तुमसे, क्यों स्वर ये एकाकार हुए,
बन जीवन का गीत कभी, तुम मुझमें साकार हुए,
मन वीणा के तार छेड़, अंतर को झंकृत कर डाला|
तू मेरे जीवन ............
कभी टूटे सुर-से रूठे तुम, कभी मधुयामिनी राग हुए,
प्रीत रंग-रस सरसे तो, कभी जोगी बन विराग हुए,
शीतल मंद बयार कभी, दहके बन करके ज्वाला|
तू मेरे जीवन का अमृत ......

शालिनी रस्तौगी

Friday, 9 June 2017

लिख नहीं पाती कलम


लिख नहीं पाती कलम, कुछ कष्टों, कुछ पीड़ाओं को,

भाग्य ने लिख दिया स्वयं हो, चेहरे पर जिन व्यथाओं को|

घनीभूत दुःख की रेखाएँ, चित्रित कर देती हैं व्यथाएँ,

धूसर उदास रंगों से, भर जाती सारी कल्पनाएँ|

जीवन फलक पर रच दिया, चित्रकार ने यंत्रणाओं को|

लिख नहीं पाती कलम ......

 

यादें सुखद संयोग की, दुःख बदली बन मन पर छाती हैं,

पलकें पल-पल बोझिल होतीं, अविरल बूँदें झर जाती हैं|

तड़ित बन गिरती तड़प, बरसाती हैं उल्काओं को|

लिख नहीं पाती कलम.....

 

कहते सब कि नियति थी यह, हुआ वही जो होना था,

पर क्रीड़ा क्रूर विधि की थी, ये अनहोनी का होना था|

विदीर्ण हृदय कैसे सँभले सुन, तथ्यहीन सांत्वनाओं को

लिख नहीं पाती कलम .....

 ~~~~~~~~~~~~~~~~~~

शालिनी रस्तौगी


Monday, 23 February 2015

मैं मौन बाँचती हूँ


तुम शब्द ढूँढते हो, मैं मौन बाँचती हूँ |
शब्दों की कैद में कब, मैं भाव बांधती हूँ |

शब्दों के दायरे में, भावों को बांधना क्यों?
नाप-तोल करके, ये प्रेम आंकना क्यों ?
तुम प्रेम-प्रेम कहते, मैं मन में झांकती हूँ |
तुम शब्द ढूँढते हो, मैं मौन बाँचती हूँ |

सागर की लहरों पर ज्यों बाँध का बनाना ,
आँधियों  को  जैसे,  हो  रास्ता  बताना ,
भावों पे शब्दों के, कब पाल तानती हूँ ?
तुम शब्द ढूँढते हो, मैं मौन बाँचती हूँ |


तुम आँखों से प्रेम कहना, आँखों से मैं सुनूँगी'
उस मूक प्रेम पल को, रह मूक ही गुनूँगी ,
मोती सा हरेक पल वो, आँचल में टाँकती हूँ|
तुम शब्द ढूँढते हो, मैं मौन बाँचती हूँ 

शब्दों की स्याही जब, भाव पे जम जाए,
दिन से उजले भावों को, रात-सा बनाए,
दिन उजाला करने को मैं रात माँझती हूँ|
तुम शब्द ढूँढते हो, मैं मौन बाँचती हूँ 

Sunday, 20 July 2014

चाहे न दो प्रत्युत्तर तुम,


चाहे न दो प्रत्युत्तर तुम, 
मन में मेरे संतोष यही,
विनती अपने आकुल हिय की, 
तुम तक मैंने पहुँचाई सही| 

कुछ पीड़ा कुछ संताप लिखे,
कुछ प्रीत भरे उदगार लिखे
हर अक्षर में जिसके मैं थी,
पाती तुम तक पहुँचाई वही|

संदेश नहीं, न संकेत कोई ,
न आस मिलन की लेश कोई ,
सुन एक पुकार आओगे तुम,
मन में प्रतिपल विशवास यही |

न, विरहन न कहना मुझको ,
हर ओर मेरे तुम ही तुम हो ,
हर क्षण तुम में मैं जीती हूँ
है मेरे लिए संजोग यही |

कविता अपनी साकार करूँ


निज सुख, निज पीड़ा से कैसे 
तुमको एकाकार करूँ 
उद्द्वेलित, आडोलित मन के 
संप्रेषित कैसे विचार करूँ 

मैं अपनी करुणा जीती हूँ,
उल्लास रहे तुम जी अपना |
मैं मानूँ ठोस धरातल है
तुम मानो जग निरा सपना |
सुख निद्रा से झंझोड़ तुम्हारे, क्यों सपने निराधार करूँ |

हैं साथ तुम्हारे वे पल-छिन,
जो मेरे जीवन में न आए |
मैंने भी अपनी स्मृति में,
निज दुःख,निज उल्लास छिपाए |
तुम्हारे ह्रदय के भावों का, कैसे मैं साक्षात्कार करूँ |

जो मेरी बातों में अपने से
कुछ पल तुमको मिल जाएँ
तुम चुन कर उनको रख लेना
जो बातें ह्रदय को छू जाएँ
कुछ पल जी कर मैं तुम में, कविता अपनी साकार करूँ
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