हर पल घटते नए घटनाक्रम में,
Friday, 3 January 2025
किन भावों का वरण करूँ मैं?
Thursday, 19 September 2024
अब चक्र सुदर्शन उठाओ ना।
बहुत सुना दी मुरली धुन मीठी ,
कौन -सा पथ मैं चुनूँ
Sunday, 17 April 2022
रीता मन
रीता मन - रीते नयन, भीगे-भीगे पल
क्या लिखूँ?
सूना आँगन - सूना उपवन, उल्लास प्रेम का
क्या लिखूँ?
वे सावन संग भीगे थे हम, रुत वसंत झूमे
थे संग,
मकरंद प्रेम का बिखरा था, बूँदों में
तन-मन पिघला था,
तुम संग सब मौसम बीते, पतझड़ का सूनापन
क्या लिखूँ ?
वो हाथ लिए हाथों में जब, आँखों में बातें
होती थीं,
पुलकित-पुलकित दिन होते थे, पूनम की रातें होती
थीं ,
तुम संग गए सभी उजियारे, मावस का तम क्या
लिखूँ ?
Thursday, 2 January 2020
स्वागत गीत
तव चरणों की आहट से, स्पंदित मन के तार।
1. नव उमंग से पुलकित हृदय,
मुस्कानों के विकसित किसलय।
पग- पग पर सानंद जताती, प्रकृति है आभार।
मुखरित है मन का आँगन, सुरभित है हर द्वार।
तव चरणों की आहट से, स्पंदित मन के तार।
2. हर्षित स्वर लहरी से गुंजित,
चहुँ ओर आनंद अपरिमित,
आह्लादित हो करते हम, अभिनंदन बारंबार।
मुखरित है मन का आँगन, सुरभित है हर द्वार।
तव चरणों की आहट से, स्पंदित मन के तार।
Monday, 12 June 2017
तू मेरे जीवन का अमृत
Friday, 9 June 2017
लिख नहीं पाती कलम
लिख नहीं पाती कलम, कुछ कष्टों, कुछ पीड़ाओं को,
भाग्य ने लिख दिया स्वयं हो, चेहरे पर जिन
व्यथाओं को|
घनीभूत दुःख की रेखाएँ, चित्रित कर देती
हैं व्यथाएँ,
धूसर उदास रंगों से, भर जाती सारी
कल्पनाएँ|
जीवन फलक पर रच दिया, चित्रकार ने
यंत्रणाओं को|
लिख नहीं पाती कलम ......
यादें सुखद संयोग की, दुःख बदली बन मन पर
छाती हैं,
पलकें पल-पल बोझिल होतीं, अविरल बूँदें झर
जाती हैं|
तड़ित बन गिरती तड़प, बरसाती हैं उल्काओं
को|
लिख नहीं पाती कलम.....
कहते सब कि नियति थी यह, हुआ वही जो होना था,
पर क्रीड़ा क्रूर विधि की थी, ये अनहोनी का होना
था|
विदीर्ण हृदय कैसे सँभले सुन, तथ्यहीन सांत्वनाओं
को
लिख नहीं पाती कलम .....
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Monday, 23 February 2015
मैं मौन बाँचती हूँ
Sunday, 20 July 2014
चाहे न दो प्रत्युत्तर तुम,
चाहे न दो प्रत्युत्तर तुम,
मन में मेरे संतोष यही,
विनती अपने आकुल हिय की,
तुम तक मैंने पहुँचाई सही|
कुछ पीड़ा कुछ संताप लिखे,
कुछ प्रीत भरे उदगार लिखे
हर अक्षर में जिसके मैं थी,
पाती तुम तक पहुँचाई वही|
संदेश नहीं, न संकेत कोई ,
न आस मिलन की लेश कोई ,
सुन एक पुकार आओगे तुम,
मन में प्रतिपल विशवास यही |
न, विरहन न कहना मुझको ,
हर ओर मेरे तुम ही तुम हो ,
हर क्षण तुम में मैं जीती हूँ
है मेरे लिए संजोग यही |
कविता अपनी साकार करूँ
निज सुख, निज पीड़ा से कैसे
तुमको एकाकार करूँ
उद्द्वेलित, आडोलित मन के
संप्रेषित कैसे विचार करूँ
मैं अपनी करुणा जीती हूँ,
उल्लास रहे तुम जी अपना |
मैं मानूँ ठोस धरातल है
तुम मानो जग निरा सपना |
सुख निद्रा से झंझोड़ तुम्हारे, क्यों सपने निराधार करूँ |
हैं साथ तुम्हारे वे पल-छिन,
जो मेरे जीवन में न आए |
मैंने भी अपनी स्मृति में,
निज दुःख,निज उल्लास छिपाए |
तुम्हारे ह्रदय के भावों का, कैसे मैं साक्षात्कार करूँ |
जो मेरी बातों में अपने से
कुछ पल तुमको मिल जाएँ
तुम चुन कर उनको रख लेना
जो बातें ह्रदय को छू जाएँ
कुछ पल जी कर मैं तुम में, कविता अपनी साकार करूँ






