Thursday, 19 February 2026

दोबारा

 

दोबारा

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अगर हम कभी दोबारा मिलेंगे

क्या बातों के पैबंद

जख्मों को सिलेंगे?

रिश्तों की गाँठें कड़ी होंगी या फिर

टूटे सिरे खुल के बिखरेंगे ?

शिकवों की उलझन और

पेचीदा होगी या

रिश्तों के धागे थोड़े सुलझेंगे?

अजनबीपन से बोझिल नज़र न उठेगी

या अपनेपन के दरिया बहेंगे ?

एक चुप्पी पसरी रहेगी दरम्यां या

बातों के दौर लम्बे खिचेंगे?

बिछड़ने को होगा ये मिलना हमारा

या हमेशा को मिलने को हम मिलेंगे?

कविता का जन्म

 

क्या ठहरे जल के भीतर 

लहरें उत्ताल तड़पती हैं ?

क्या शांत मन से कभी

कविता कोई जन्मती है?

न हो जब तक,

मन विह्वल, ह्रदय व्याकुल

भावों का अतिरेक न जब तक

प्राणों को कर डाले बोझिल |

हृदय के उदगार न जब तक

शब्दों में ढल जाने को मचलें|

आँखों की पीड़ा, आँसू में घुल

जब तक कागज़ पर न उतरे|

प्रसव वेदना बिना क्या जननी

बालक को जन पाती है?

जब ह्रदय कसकता दारुण दुःख से

तब कविता रच पाती है|

गुमशुदा

 गुमशुदा से हो गए वो, शहर छोड़े बैठे हैं

हम तो उनकी चौखट से, आस जोड़े बैठे हैं.

है गुरूर या गैरत , गैरियत है या गफलत,
अपनी है गरज फिर भी,मुँह को मोड़े बैठे हैं

अर्ज़ पर, गुज़ारिश पर भी ,खफ़ा से रहते हैं,
क्या गुमान है इतना, दिल जो तोड़े बैठे हैं .

काश अब निकल जाए, सब गुबार ये दिल का,
कितने तूफान आँखों में, दिल निचोड़े बैठे है

अब उन्हें बुलाने को कोई गुमाश्ता भेजें,
कासिदों की तो हिम्मत वो, कबकी तोड़े बैठे हैं,

आरक्षण

 

आरक्षण

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छोटे-बड़े पक्षी’

सब भर रहे थे,

अपनी-अपनी उड़ानें |

अपने पंखों की हैसियत से,

दे रहे थे चुनौती गगन को,

बना रहे थे अपनी पहचानें|

तभी कुछ सियारों ने उन्हें आवाज़ लगाई,

पूरी तल्लीनता से परवाज़ भरने की कोशिश में लगे

कुछ छोटे कमज़ोर पक्षियों को बात समझाई |

देखो!

यह आकाश ... है भेदभाव से भरा

बड़े पक्षियों ने जमाया है ... अधिकार यहाँ ,

सदियों से आसमां पर राज करते ये बड़े पंछी,

नहीं भरने देंगे तुम्हें उड़ानें,

हर तरफ अपना हक़ जमाए बैठे ये सयाने|

पर अब तुम्हें डरने की नहीं ज़रूरत,

मत घबराओ देख अपनी कमज़ोर हैसियत|

कमज़ोर-छोटे पंख तुम्हारे,

क्यों उठाएँ भला उड़ने की ज़हमत?

सदियों से इन बड़े पक्षियों ने जो

किए हैं तुम पर अत्याचार,

आसमान में तुम्हारे आगे खड़ी की जो दीवार,

उसे तुम्हारे आगे से हम हटाएँगे,

इनके द्वारा किए गए भेदभाव से,

मुक्ति हम दिलाएँगे|

इस वर्ण-व्यवस्था के खिलाफ़,

हम तुम्हें देंगे ‘संरक्षण’,

इस आसमान में उड़ने को,

तुम्हें अब मिलेगा ‘आरक्षण’ |

न – न ,

तुम्हें अपने पंखों को कोई तकलीफ़ नहीं पहुँचाना है,

बस....  अब से छाती पीट चिल्लाना है –

इन ऊँचे उड़ने वालों ने हमें

सदियों से सताया है,

हमारे पंखों पर पहरा लगाया है|

तुम्हारा रोने को हम ऐसी चीख बनाएँगे |

इन ऊँची उड़ान भरने वालों के पंख कटवाएँगे|

अब ये बाज , तुमसे ऊँची परवाज़ नहीं भर पाएगा|

तुम्हारी छोटी उड़ान के नीचे उड़ना ही

इसकी नियति बन जाएगा|

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

राम पिया


 

मन चकोर


 

समय की धार

 तुम समय की धार थे, ठहरा हुआ पाषाण मैं|

न तुम रुके, न मैं बही, सजीव तुम, निष्प्राण मैं |
कण-कण घुली, रज-रज बनी, हो सूक्ष्म मैं तुममें मिली,
मिटने में थी मेरी पूर्णता, सम्पूर्णता तेरे संग चली,
अस्तित्व की कब चाह थी, तुझसे मेरी पहचान थी
न हुई पृथक न विलीन हुई तुममें, अनस्तित्व का प्रमाण मैं|
अदृश्य तुम जग के लिए, मैं मूर्त हो बंधन बँधी ,
स्पर्श तेरा था अदृश्य, मैं दृश्य हो हर क्षण दिखी,
मेरे अणु-अणु का रीतना, कण-कण हरेक क्षण छीजना ,
निर्मोही तुम अविकल रहे, अनुदिन घटी परिमाण मैं |

Friday, 3 January 2025

किन भावों का वरण करूँ मैं?

 हर पल घटते नए घटनाक्रम में,

ऊबड़-खाबड़ में, कभी समतल में,
उथल-पुथल और उहापोह में,
किन भावों का वरण करूँ मैं ?
एक भाव रहता नहीं टिककर,
कुछ नया घटित फिर हो जाता|
जब तक उसको मैं सोचने बैठूँ,
किसी और दिशा कुछ ले जाता|
क्या-कुछ-कब-कैसे-कितना के ,
चक्कर में कब तक भमण करूँ मैं?
किन भावों का वरण करूँ मैं?
विद्रूप-विकट कुछ घट जब मन में,
विद्रोह-विषाद-विरक्ति लाता |
सब तहस-नहस कर नव रचना को,
हो अधीर मन है अकुलाता|
कर चिंतन एक नई आस का,
नैराश्य-त्रास का क्षरण करूँ मैं|
किन भावों का वरण करूँ मैं?
कुछ मेरे अंतस के सपने,
सपनों में धूमिल होते अपने|
अपनों को चुनना या सपने बुनना,
किसको पाने में छूटे कितने |
हानि-लाभ क्या गणन करूँ मैं ?
किन भावों का वरण करूँ मैं?
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शालिनी रस्तौगी
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