Showing posts with label कत'आत. Show all posts
Showing posts with label कत'आत. Show all posts
Wednesday, 2 June 2021
Saturday, 12 May 2018
Friday, 12 May 2017
Saturday, 10 August 2013
परवाज़
1.
पिंजरे में कैद मगर सोज नहीं सुर से साज़ भरो,
गम अपने छिपाकर हँसी से अपने अंदाज़ भरो,
बड़ा फ़राक दिल है ये सैय्याद देखो इसकी अदा
,
पर कैँच करके परिंदों से कहे कि अब परवाज़ भरो.
2
.
मेरी आवारगी को अपनी चाहत का संग दे ज़रा
मुद्दतों कैद हसरतों को आज़ादी के पंख दे ज़रा
एक बार जो चढ़े रंग तो ता-उम्र न छूटे फिर
मेरी रूह को इश्क के रंग में बेपनाह रंग दे ज़रा
3.
पंख हैं न परवाज़ कोई
अंजाम है न आगाज़ कोई
आवारगी फकत एक मकसद
इस मन न सरताज कोई
Sunday, 24 February 2013
नाराज़गी........कुछ इस तरह
1.
मुख़्तसर सी मुलाकात थी
अजीब सा ही था बहाना
पहली दफ़ा मिल के वो बोले
बस यहीं खत्म फ़साना .............
2.
कुछ बेजां सी ख्वाहिशें
कुछ गुस्ताख से अंदाज़
हक़- ए- इंकार से हमारे
क्यूं कर उन्हें एतराज़
3.
दो घड़ी पास बैठ ज़रा
कुछ दिल की कहते -सुनते
रूहों के रिश्तों को न यूँ
जिस्म की दीवारों में चुनते
4.
इश्क में खुद को मिटाने का फन आ न सका ,
जान दे के उसे मनाने का फन आ न सका,
घर की दहलीज के उस तरफ थी दुनिया उसकी,
मौज-ए-दुनिया से टकराने का फन आ न सका.
उल्फत की नई मंजिलें पुकारती थीं उसे
ज़ख्म दिल के दिखलाने का फन आ न सका..
Thursday, 31 January 2013
क्या दामिनी को न्याय मिल पाया .....
क्यों मुक़र्रर है सज़ा मुख़्तसर सी, इस गुनाह-ए-अज़ीम की
कम होगा अगरचे, आतिश-ए-दोजख में भी जलाया जाए
अस्मत थी इक मजलूम की, कोई दूकान तो नहीं थी
भरपाई को जिसकी, चंद सिक्कों में गिनवाया जाए .
दरिंदगी का चेहरा था सरे आम, क्यों हिचक फिर भी,
इन्साफ तो तब है जब ,संग हरेक हाथ में पकडाया जाए .
Subscribe to:
Posts (Atom)



