Friday, 12 May 2017

आवारा भाव


आवारा भाव 
इधर-उधर, बेतहाशा 
दौड़ते से भाव....
न सीमा मानते, न बंधन 
हर दहलीज को उलांघते हैं भाव|
कभी झिरियों
कभी सुराखों से
कभी दीवार में पड़ी दरारों से,
हर दरवाज़े को तोड़,
हर कड़ी को खोल,
सेंध लगा कर
अनायास अनधिकृत ही
निषिद्ध क्षेत्रों में कर प्रवेश
मचाते उत्पात,
यूँही कभी उपद्रवी बन जाते हैं भाव....
कभी मर्यादाओं से टकरा
कभी रूढ़ियों की चट्टानों पर सिर पटक
ज़ख़्मी हो
तानों और उलाहनों की
कंटीली डगर पर घिसटते
छिला जिस्म ले
कहराते, पर रुक न पाते भाव....
जाने किस आवारगी की
लत लगा कर
फिरते हैं इधर-उधर
आवारा भाव
~~~~~~~~~~~~~
shalini rastogi

(चित्र गूगल से साभार)

सा न अहम्



सा न अहम् 
मैं कौन?
क्या अस्तित्व मेरा?
क्या मेरा कृत्य?
क्या कर्त्तव्य मेरा?
न उद्भव मेरा मेरे वश में
न अवसान पर अधिकार मेरा।
जब तू ही विधि, तू ही विधाता
तू ही नियति, तू ही नियंता
तू ही सृष्टि, तू नियामक सृष्टि का.....
तेरा ही संकेत पाकर ,
चलते सब कारोबार,
क्या जड़, क्या चेतन,
सब पर तेरा अधिकार।
मेरी हर श्वास पर,
हर आती जाती आस पर,
विश्वास पर, अविश्वास पर
मेरी चेतना,
मेरे अवचेतन-अचेतन पर....
जब रोम रोम मेरा निबद्ध तुझसे।
तो कैसे हुई अच्छी?
कैसे बुरी मैं?
क्या कृत्य अच्छा, क्या बुरा मेरा।
उचित-अनुचित, पाप -पुण्य
अच्छा बुरा का दोष
क्योंकर हुआ मेरा?
मैं मात्र कठपुतली
डोर हाथ तेरे,
सौंपती हूँ तुझको,
सब पुण्य-पाप तेरे।
न मेरी इच्छा से कुछ गठित कुछ
न कुछ किया घटित मैंने।
मुझ अकिंचन की क्षमता क्या?
जो भी किया , तुमने किया
हर घटित का कारण क्या ?
बस
इतना ही जानती मैं ...
सः त्वं
सा न अहम्
~~~~~~~~~~~
शालिनी रस्तौगी

साफ़गोई से हरेक अब बात होनी चाहिए - ग़ज़ल

ग़ज़ल
अब न कोई पीठ पीछे घात होनी चाहिए
साफ़गोई से हरेक अब बात होनी चाहिए
हर ऐरे गैरे के बस का ये पागलपन है नहीं 
इश्क फरमाने की भी औकात होनी चाहिए
फ़र्क क्यों हो आदमी के बीच कोई धर्म का
एक ही बस इंसानियत की जात होनी चाहिए
घर किसी मजलूम का महरूम खुशियों से न हो
हर के घर में खुशियों की सौगात होनी चाहिए
बात तब है सर उठा संसार में नेकी चले
औ बदी की ही हमेशा मात होनी चाहिए
रात मावस की अगर जो चाँद से महरूम हो
आसमां में तारों की बारात होनी चाहिए
देश के हालात से कोई न अब गाफ़िल रहे
हर मुआमले की ही मालूमात होनी चाहिए
~~~~~~~~~~~~~
शालिनी रस्तौगी

Sunday, 17 July 2016

हास करे, परिहास करे

सवैया 


हास करे, परिहास करे मन की गति वो समझे नहिं मेरी।

आय, सताय,रुलाय,मनाय,करे मन की सुनता नहिं बैरी।

लाज भरी इनकार करूँ झट बात बना करके मति फेरी।

लेकर सौं इक बात कहूँ अब बात न मानु कभी पिय तेरी।।

Saturday, 2 April 2016

फागुन के रंगों में रंगी दो कुण्डलियाँ

फागुन के रंगों में रंगी दो कुण्डलियाँ
~~~~~~~~~~~~~~~~~~
वियोग का रंग
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धरती फागुन में सजी, जोगन जी संताप।
विरहा अगनी तन जले, उड़े बूँद बन भाप।।
उड़े बूँद बन भाप, सखी की हँसी ठिठोली।
करे जिया पर चोट, धँसे जी में बन गोली।।
साजन-सजनी संग, आँख विरहन की भरती।
पड़ती रंग फुहार, रहूँ मैं धीरज धरती ।।
~~~~~~~~~
संयोग का रंग
~~~~~~~~~
बनठन कैसी सज गई, खिला धरा सुरचाप।
रंग फुहारें तन पड़ीं, मिटा हिया का ताप ।।
मिटा हिया का ताप, कि खेली उन संग होली।
भीज गए सब अंग, खिला मन बन रंगोली।।
मन ही मन में राग, दिखाए झूठी अनबन ।
पिया मिले जब संग, फाग मैं खेलूँ बनठन ।।
~~~~~~~~~~~
शालिनी रस्तौगी

Thursday, 31 March 2016

जीवन का डर

बार-बार चुभ रही है 
आँखों में 
उसकी खाली सीट 
उठ रहे हैं मन में कई सवाल |
क्या हुआ होगा ? 
किस वज़ह से उठाया होगा 
उसने यह कदम?
ऐसा कौन सा डर था जिससे डर कर उसने
जीवन के सबसे बड़े डर
मृत्यु को
किया होगा अंगीकार?
क्या वास्तव में
मौत से भी भयंकर है 
जीवन का डर?
यही बात चुभ रही मन में बार- बार
क्यों नहीं किया हौंसला
अनुत्तीर्ण होने का? 
सिर्फ एक परीक्षा के लिए
क्यों हार गया वह जीवन ?
कोई भी आकांक्षा 
माँ-बाप की अपेक्षा 
बढ़कर तो नहीं थी जीवन से उसके!
क्यों नहीं समझ पाया वह
उनकी आँखों का कोई भी स्वप्न
इस दुस्वप्न पर तो नहीं टूटता था|
अभी तो बस आरम्भ ही था - जीवन रण का
क्यों युद्ध से पहले ही उसने
डाल दिए हथियार
यही सोचता मन बार-बार.....

नहीं बन पाती शिला

नहीं बन पाती शिला
पूरी तरह
कोई अहिल्या कभी
उस पाषाणी आवरण के नीचे
हमेशा छलकता रहता है
मीठे जल का एक सोता
गाहे-बगाहे जिसमें
उग आते हैं कभी
इच्छाओं के कमल।
समझ नहीं पाती
हर झरोखे, हर झिरी को
बड़े यत्न से मूँदने के बाद भी
जाने कहाँ से
प्रवेश कर जाती है 
उम्मीद की किरण 
जो बार-बार खिला देती है 
कामना का कमल 
हाँ! कोई अहिल्या 
पूरी तरह 
नहीं बन पाती शिला
~~~~~~~~~~~~~
शालिनी रस्तौगी

अश्वत्थामा

अश्वत्थामा बन गई है वो,
अपने पकते-रिसते घाव को
अंतरात्मा पर ढोती,
मूक पीड़ा को पीती|
शुष्क आँसुओं के कतरों की 
चुभन आँखों में लिए
फिर रही है|
हाँ, अश्वत्थामा बन गई है वो ....

भेद जाती हैं कान
अंतस से उठती आवाजें
अपने ही मन के कुरुक्षेत्र में 
अपना ही रचा महाभारत 
लड़ रही है वो
हाँ, अश्वत्थामा बन गई है वो 
पीड़ा, घुटन, रुदन का 
सदियों तक 
अभिशाप झेलना 
बन चुकी है उसकी नियति 
आखिर क्यों न हो 
परिणाम समान 
जब
पाप भी हुआ था  समान.... 
अपनी मौन, संज्ञाशून्य सहमति को 
बना ब्रह्मास्त्र 
खुद अपने ही गर्भ पर कर प्रहार 
हाँ, बन गई है वो 
अश्वत्थामा........



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