Monday, 2 June 2014

एक नज़्म .... आमद तुम्हारी याद की


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न रात के आँचल पे टंका था चाँद
न झील के दमन में खिले थे कंवल
न गुंचे फूल के समां महका रहे थे 
न भँवरे प्रेम रागिनी कोई गा रहे थे
फिर अचानक क्या हुआ कि जो
यूँ महकने, खिलखिलाने लगा समां
कैसे दिल में चांदनी की ठंडक उतर गई
क्यूँ कंवल मन की झील में झिलमिलाये
हाँ ... कुछ तो हुआ है खास
मन के गलियारे में कुछ हलचल सी मची है
शायद तेरी यादों की आमद हुई है

1 comment:

  1. बहुत ही सुंदर सार्थक प्रस्तुति!!!

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