Sunday, 3 January 2016

प्रेम हो या परमात्मा

प्रेम हो या परमात्मा
कौन तुम?
अंतर, बाह्य, चहुदिशि, चहुँओर
आच्छादित तुमसे
अस्तित्व मेरा|
संशय में हूँ
अब मुझमें कितनी
बची शेष मैं?
या आवृत कर डाला है तुमने
सम्पूर्ण मुझे
पर देखो 
कैसा ये आश्चर्य
कि इस संकुलता से
घुटते नहीं प्राण मेरे
न अकुलाते मुक्ति को|
नहीं, देखना भी चाहती नहीं
परे इस आवरण के
कैसा अनंत विस्तार 
भर दिया मेरे अंतस में !
रच दी मात्र मेरे लिए

दुनिया अलग है तुमने
सम्मोहित सी रहूँ विचरती
इसके हर कोने में
आत्मविमुग्ध
रह जाती विस्मित
पाती इतना जो था अज्ञात
क्या था मेरे ही मन में
कैसे और कब रच डाला मुझमें
ये तिलिस्म तुमने?
नहीं , कोई और तो नहीं
कर सकता चमत्कार ये| 
निश्चित ही तुम
या तो प्रेम हो या परमात्मा........
~~~~~~~~~~~~~ 
शालिनी रस्तौगी

Wednesday, 2 December 2015

लगाव


लगाव तुमसे
अलग- सा ही है कुछ
अदृश्य, अपरिभाषित, अपरिमित
अकल्पित हैं सीमायें इसकी
है कौन -सा आकर्षण जो
विकर्षण की हर सीमा तक जाकर भी
फिर - फिर तोड़
समीपता की हर एक सीमा
समाहित कर देता है मुझे तुममें
सोचती ... कुछ तो कहा होगा किसी ने
कुछ नाम तो दिया होगा
इस आकर्षण को
कुछ शब्द परिभाषित इसे
करते तो होंगे
ऐसे ही अनुभव
और भी रखते तो होंगे
पर हर बार .... कोई उत्तर नहीं मिल पता
परिभाषित कैसे करूँ इसे
रूप नया धर
हर बार सामने आता
अब छोड़ दिया इसे कुछ नाम देना
क्योंकि बहुत अलग है
मेरा
तुमसे लगाव।
Shalini rastogi

प्रेम पगे दोहे


बैरी बन बैठा हिया, जाय बसा पिय ठौर ।
गात नहीं बस में रहा, कहूँ करे कुछ और ।।

विद्रोही नैन हुए, सुनें नहीं इक बात ।
बिन पूछे पिय से लड़े, मिली जिया को मात ।।

बन कस्तूरी तन बसा , छूटे गात सुगंध ।
लाख छिपाया ना छिपा, प्रेम बना मकरंद ।।

नैनों से छलकी कभी, फूटी कभी बन बैन ।
प्रीत बनी पीड़ा कभी, कभी बन गई चैन ।।

Sunday, 11 October 2015

सोलह सिंगार ( कुण्डलिया)


कजरा गजरा डाल कर, कर सोलह सिंगार।

गोरी बैठी सेज पर, करने को अभिसार।।


करने को अभिसार, राह पर पलक बिछाए।


पल-पल बीते पहर, बिना पलकें झपकाए।।


किस सौतन का आज, बना जादूगर गजरा।


तडपत बीती रैन, बहा नयनन से कजरा।|

कजरा नैनन से बहा ( कुण्डलिया)

कजरा नैनन से बहा, कारे पड़े कपोल।

निर्मोही पर प्रीत का, जान न पाया मोल।।

जान न पाया मोल, रहा परदेसी होकर।

गये विरह में वर्ष, रोय निज चैना खोकर||

देखी अंसुवन धार, बरसना भूले बदरा।

पिया बसे जब नैन, कहाँ ठहरेगा कजरा ||

निज भाषा ( कुण्डलियाँ)

बरसों हैं बीते मगर,मिला न वह सम्मान।
निज भाषा निज भूमि पर, झेल रही अपमान।।
झेल रही अपमान, बढ़े दिन-दिन अंग्रेजी।
भेज दिए अंग्रेज, न अब तक भाषा भेजी।।
अब तक आशा शेष, गये दिन कल, कल, परसों।
पर भाषा का राज, सहे मन कितने बरसों।।

मोहन रूप ( कुण्डलिया)


अपनी छवि बना कर जो, दर्पण देखा आज|
देख रूप अपना खुद ही, गोरी करती नाज||
गोरी करती नाज, चली इठला कर रानी|
साजन से मनुहार, कराऊंगी मनमानी||
अपनी छवि को भूल, सजन को ताके सजनी|
मोहन रूप निहार, सखी सुधि खोई अपनी ||

सजना चतुर सुजान ( कुण्डलिया)


बात करे हर ले जिया, बन भोला अनजान |
कौन कहे उनकी सखी, सजना चतुर सुजान ||
सजना चतुर सुजान, करे पल-पल मनमानी|
नैन मिला ठग जाय, ठगी रह जाय सयानी ||
पल में हिय बिध जात, अचूक है उसकी घात|
मीठा-सा हो दर्द, याद कर पिया की बात ||
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