Sunday, 17 April 2022
औरत की आवाज़
औरत की आवाज़
किश्तियाँ हैं ये कागज़ी
किश्तियाँ हैं ये कागज़ी , दूर तक चलेंगी क्या?
खुशबुएँ काग़ज़ी फूलों से, चमन को मिलेंगी क्या?
दर्द पे अपनों के तुम, बेगाने बन के हँस दिए,
दर्द पे अपनों के तुम, बेगाने बन के हँस दिए,
गैर तो फिर गैर थे, अपनों ने ताने कस दिए।
Friday, 17 September 2021
ग़ज़ल - क़यामत हो गई
ख्वाब टूटे आस बिखरी , क्या क़यामत हो गई|
हाथ से तक़दीर फिसली, क्या क़यामत हो गई|
कल में रहे, कल में जिए, कल की बनाई योजना,
कल न आया आज ही, ये तो क़यामत हो गई|
दौड़ती थी
ज़िन्दगी , दौड़ता इंसान था
थम गया पल में सभी कुछ, क्या क़यामत हो गई|
लोग कहते हों भले, जो होना है हो कर रहे ,
अनहोनियाँ होने लगीं पर, क्या क़यामत हो गई|
शालिनी रस्तौगी
ग़ज़ल - चंद सिक्के सँभाले हैं|
ग़ज़ल
अजी आसाँ कहाँ इतने, नौकरी के निवाले हैं,
हज़ारों रोग ले दिल पे, चंद सिक्के सँभाले हैं|
तेरी आँखों में आँसू हैं, तो अपने दिल में छाले
हैं,
कि वो छलकें, कि ये फूटें, छलकने ग़म के प्याले
हैं|
यकीं औ सब्र है झूठा, इबादत झूठ है उसकी,
तेरी रहमत पे ए मालिक, जो झट उँगली उठा ले है|
लगें हैं बोझ दो रोटी, बाप-माँ की उन्हें
अक्सर,
जो औलादें विरासत में, उनकी दौलत सँभाले हैं|
दिखेगी इश्क़ की सच्चाई भला कैसे बताओ तो,
नज़र में शक़-शुबह के जब, पड़े तेरे ये जाले हैं|
मिला है जो जिसे जितना, ये अपनी-अपनी किस्मत
है,
किसी का दिन अँधेरा है, कहीं शब भर उजाले हैं|
उतर गहराई में मोती, अगर जो पाना चाहे तू,
लगेगा हाथ बस कीचड़, क्यों उथला जल खँगाले है|
शालिनी रस्तौगी
गुरुग्राम





