Sunday, 17 April 2022

करवाचौथ पर कुछ दोहे


 

मकर संक्रांति पर कवित्त

 


गीत वह निर्दोष गाऊँ

 


औरत की आवाज़

 औरत की आवाज़

~~~~~~~~~~
औरत की आवाज़ हूँ मैं ,
हमेशा से पुरज़ोर कोशिश की गई,
मुझे दबाने की ,
हमेशा सिखाया गया मुझे ....... सलीका ,
कितने उतार-चढ़ाव के साथ,
निकलना है मुझे |
किस ऊँचाई तक जाने की सीमा है मेरी ,
जिसके ज्यादा ऊँची होने पर मैं,
कर जाती हूँ प्रवेश
बदतमीज़ी की सीमा में ... |
कैसे है मुझे तार सप्तक से मंद्र तक लाना ,
कब है मुझे ख़ामोशी में ढल जाना ,
सब कुछ सिखाया जाता है ... प्रारंभ से ही |
कुछ शब्दों का प्रयोग
जिन्हें अक्सर प्रयोग किया जाता है
औरत-जात के लिए
निषिद्ध है मेरे लिए
क्योंकि एक औरत की आवाज़ हूँ मैं |
अन्याय, अत्याचार या अनाचार के विरोध में
मेरा खुलना
इजाज़त दे देता है लोगों को
लांछन लगाने की
मेरा चुप रहना, घुटना, दबना सिसकना ही
दिलाता है औरत को
एक देवी का दर्ज़ा ,
मेरे खुलते ही जो बदल जाती है
एक कुलच्छिनी कुलटा में |
मुझ से निकले शब्दों को हथियार बना
टूट पड़ता है यह सभ्य समाज
सभी असभ्य शब्दों के साथ
उस औरत पर
खामोश कर देने को मुझे
हाँ
एक औरत की आवाज़ हूँ मैं
सिसकी बन घुटना नहीं चाहती
चाहती हूँ गूँजना
बनकर .............. ब्रह्मनाद |
द्वारा
शालिनी रस्तौगी

किश्तियाँ हैं ये कागज़ी


किश्तियाँ हैं ये कागज़ी , दूर तक चलेंगी क्या?
खुशबुएँ काग़ज़ी फूलों से, चमन को मिलेंगी क्या?

जुबां की नोक से जिसे चाक़ किए बैठे हो,
सुइयाँ फटे दिल का दामन सिलेंगी क्या?
लिख तो दिया है कि मुहब्बत है हमसे
रेत पे लिक्खी इबारतें टिकेंगी क्या?
एक चौराहे पे राहें जो जुदा हो गई हों ,
किसी चौराहे पे वो चारों फिर मिलेंगी क्या?
खून और आग से सींचा गया हो जिन्हें
बस्तियां उन वीरानों में फिर बसेंगी क्या?
गोलियाँ, गालियाँ, बदकारियाँ, दहशत औ वहशत
यहाँ फैला के उस जहान में हूरें मिलेंगी क्या?

दर्द पे अपनों के तुम, बेगाने बन के हँस दिए,


दर्द पे अपनों के तुम, बेगाने बन के हँस दिए,

गैर तो फिर गैर थे, अपनों ने ताने कस दिए।

कौन -सा दिल लाए हो, दिल है भी या पत्थर कोई,
सिसकियों चीखों के तुमने, नाम नाटक रख दिए।
चुटकियाँ चीखों की लीं, ज़ख्मों पे छिड़का नमक,
वैद्य बनकर आए थे, तकलीफ़ देकर चल दिए।
कुछ पे सितम, कुछ पे करम, ये कौन सा अंदाज़ है,
एक का हक़ छीन, दामन दूसरों के भर दिए।
बाग था बुलबुल का, शिकरों ने उजाड़ा था जिसे,
सय्यादों ने बुलबुल की तरफ़ लेकिन निशाने कर दिए।
आज अपनी आन पे आवाज़ ऊँची जो करी,
तुमने छाती पे हमारी, ज़ुल्मी के तमगे जड़ दिए।
प्रेम और इंसानियत तो फ़र्ज़ था अपना फ़कत,
दुश्मनी तुमने निभाकर, फ़र्ज़ पूरे कर दिए।
~~~~~~~~~
शालिनी रस्तौगी

Friday, 17 September 2021

ग़ज़ल - क़यामत हो गई

 



ख्वाब टूटे आस बिखरी , क्या क़यामत हो गई|

हाथ से तक़दीर फिसली, क्या क़यामत हो गई|


कल में रहे, कल में जिए, कल की बनाई योजना,

कल न आया आज ही, ये तो क़यामत हो गई|


दौड़ती  थी ज़िन्दगी , दौड़ता इंसान था

थम गया पल में सभी कुछ, क्या क़यामत हो गई|


लोग कहते हों भले, जो होना है हो कर रहे ,

अनहोनियाँ होने लगीं पर, क्या क़यामत हो गई|

शालिनी रस्तौगी

 



ग़ज़ल - चंद सिक्के सँभाले हैं|

 

ग़ज़ल

 

अजी आसाँ कहाँ इतने, नौकरी के निवाले हैं,

हज़ारों रोग ले दिल पे, चंद सिक्के सँभाले हैं|

 

तेरी आँखों में आँसू हैं, तो अपने दिल में छाले हैं,

कि वो छलकें, कि ये फूटें, छलकने ग़म के प्याले हैं|

 

यकीं औ सब्र है झूठा, इबादत झूठ है उसकी,

तेरी रहमत पे ए मालिक, जो झट उँगली उठा ले है|

 

लगें हैं बोझ दो रोटी, बाप-माँ की उन्हें अक्सर,

जो औलादें विरासत में, उनकी दौलत सँभाले हैं|

 

दिखेगी इश्क़ की सच्चाई भला कैसे बताओ तो,

नज़र में शक़-शुबह के जब, पड़े तेरे ये जाले हैं|

 

मिला है जो जिसे जितना, ये अपनी-अपनी किस्मत है,

किसी का दिन अँधेरा है, कहीं शब भर उजाले हैं|

 

उतर गहराई में मोती, अगर जो पाना चाहे तू,

लगेगा हाथ बस कीचड़, क्यों उथला जल खँगाले है|

 

शालिनी रस्तौगी

गुरुग्राम

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