Friday, 25 September 2020

जनाक्रोश की जलती मशाल – दुष्यंत

 

जनाक्रोश की जलती मशाल – दुष्यंत

गूँगे निकल पड़े हैं, ज़ुबाँ की तलाश में

सरकार के ख़िलाफ़ ये साज़िश तो देखिये|

जिसने अपनी कलम को तलवार बनाकर उसे तानाशाही, सामाजिक विसंगतियों और विद्रूपताओं से जलते अपने दिल के लहू में डुबोकर लोगों के भीतर दबी आग को हवा दी, वह कवि जिसकी आवाज़ सैकड़ों हजारों आन्दोलनों की आवाज़ बनी, वह जिसकी गज़लें समय सीमा के चक्र को तोड़ कालजयी हो गईं ... आज हम हिंदी साहित्य के हस्ताक्षर उस महान कवि, कथाकार, गज़लकार को अपनी श्रद्धांजलि देते हैं जिनका नाम हमेशा स्वर्णाक्षरों में अंकित रहेगा – कवि दुष्यंत|

सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं,

मेरा मकसद है की ये सूरत बदलनी चाहिए|

जिनकी कलम का उद्देश्य ही देश और समाज का सूरत-ए-हाल बदल उसे बेहतरी की तरफ ले जाना था ऐसे थे  दुष्यंत कुमार त्यागी अर्थात् कवि दुष्यंत| हिंदी ग़ज़ल को महबूबा की जुल्फों के जाल से निकाल कर सामजिक अन्याय के विरुद्ध आक्रोश की आवाज़ बना देने वाले कवि दुष्यंत की आज यानि 1 सितम्बर को जन्म-जयंती है| कवि की पुस्तकों में जन्मतिथि 1 सितंबर 1933 लिखी है, किन्तु दुष्यन्त साहित्य के मर्मज्ञ विजय बहादुर सिंह के अनुसार कवि की वास्तविक जन्मतिथि 27 सितंबर 1931 है। कवि की पुस्तकों में जन्मतिथि 1 सितंबर 1933 लिखी है, किन्तु दुष्यन्त साहित्य के मर्मज्ञ विजय बहादुर सिंह के अनुसार कवि की वास्तविक जन्मतिथि 27 सितंबर 1931 है। फिलहाल हम कवि दुष्यंत द्वारा दी गई जन्मतिथि को सही मानते हुए आज के दिन कलम के इस सच्चे सिपाही को अपने भाव सुमन अर्पित करते हैं|

कल नुमाइश में मिला वो चीथड़े पहने हुए

मैंने पूछा नाम तो बोला कि हिन्दुस्तान है|

"दुष्यंत की नज़र उनके युग की नई पीढ़ी के ग़ुस्से और नाराज़गी से सजी बनी है। यह ग़ुस्सा और नाराज़गी उस अन्याय और राजनीति के कुकर्मो के ख़िलाफ़ नए तेवरों की आवाज़ थी, जो समाज में मध्यवर्गीय झूठेपन की जगह पिछड़े वर्ग की मेहनत और दया की नुमानंदगी करती है। " – निदा फ़ाज़ली का यह कथन दुष्यंत की रचनाओं के कथ्य की पृष्ठभूमि की स्पष्ट करती है|

मत कहो, आकाश में कुहरा घना है,
यह किसी की व्यक्तिगत आलोचना है|


इस सड़क पर इस क़दर कीचड़ बिछी है,
हर किसी का पाँव घुटनों तक सना है |

 

पक्ष औ' प्रतिपक्ष संसद में मुखर हैं,
बात इतनी है कि कोई पुल बना है


रक्त वर्षों से नसों में खौलता है,
आप कहते हैं क्षणिक उत्तेजना है ।

नसों में खौलते लहू को कलम से उगलने वाले  दुष्यंत की ग़ज़लों के अश’आर कहीं मुहावरे और कहावतें बन कर लोगों की जुबां पर सजे तो कहीं आन्दोलनों में जन-आक्रोश के पैरोकार बने| युवाओं की आवाज़ बन कहीं मंच पर सजे तो कहीं नुक्कड़ नाटकों में जन-चेतना की आवाज़ बने|

आपात काल के दौरान सरकारी नौकरी में रहते हुए हुए भी सरकारी तानाशाही के खिलाफ लिखने का परिणाम उन्हें भुगतना पड़ा और वे सरकारी कोप के भाजन बने|

इस नदी की धार में ठंडी हवा आती तो है,
नाव जर्जर ही सही, लहरों से टकराती तो है।

पर अपनी जर्जर नाव के सहारे ही वे तूफानों से टकराते रहे| ग़ज़लों-संग्रह ‘साए में धूप’ उनके जीवन (जन्म-1933, मृत्यु-1975) की आख़िरी पुस्तक है| ज़िन्दगी की हर लड़ाई, आक्रोश, सामाजिक चेतना, पीड़ा से परिपक्व ग़ज़लों से सजी यह पुस्तक हर ग़ज़ल प्रेमी को अवश्य पढ़नी चाहिए| 

 

यहाँ दरख्तों के साये में धूप लगती है,

चलो यहाँ से चलें और उम्र भर के लिए।

और वास्तव में मात्र 44 वर्ष की आयु में  30 दिसंबर 1975 की रात्रि में क्रांति की मशाल का यह प्रणेता इस दुनिया को अलविदा कह गया परन्तु उसके शब्दों की मशाल आज भी जल रही है और करोड़ो युवाओं के रक्त में चेतना की ज्वाला बन जल रही है|

मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही
हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए

राधाष्टमी

 


श्री राधा जी के नाम के बिना कान्हा का नाम अधूरा है | श्री कृष्ण के नाम को सम्पूर्ण करती इस सृष्टि में प्रेम का संचार करने के लिए बरसाने में प्रकटी श्री राधे का जन्म दिन आज यानि भाद्रपद के शुक्ल पक्ष की अष्टमी को मनाया जा रहा है|

सोलह कला सम्पूर्ण श्री कृष्ण भी जिन राधिका जी के रूठने पर व्याकुल हो उन्हें मनाने का हर यत्न करते हैं | कभी हाथ जोड़ तो कभी मृदु वचन कहकर राधा जी को मनाने में असफल होकर तीन लोकों का ताप हरने वाले श्री कृष्ण अपनी बात कहने के लिए कभी कदम्ब के पुष्प तो कभी गौसुत को अपना हरकारा बना राधा जी के पास भेजते हैं| राधा जी के नाम मात्र से ही मुदित हो जाने वाले मुरारी अपनी प्राण-वल्लभा श्री राधे के बिन स्वयं को अपूर्ण मानते हैं -
मानत ना वृषभानुसुता कर जोरि मना उन माधव हारे|
पाँव गहे, मृदु बैन कहें किसना अपनाय अनेक सहारे|
पुष्प कदम्ब चिरौरि करै अरु गोसुत कातर नैन निहारे|
ताप तिलोक हरें हरि जो निज खातिर ढूँढ रहे हरकारे||
अंततः जब राधा जी को मनाने का अन्य कोई उपाय न दिखा तो सारे विश्व को अपने एक इशारे से संचालित करने वाले श्री कृष्ण स्वयं राधा जी का रूप धारण कर उन्हें रिझाते हैं-
धरा आज कान्ह जी ने, राधा जी का रूप।
राधा कान्हा हैं बनी, लीला अजब अनूप।।
लीला अजब अनूप, घाघरा कंचुकि धारी।
बंसी धर अधरान, बनी राधा बनवारी।।
लीलाधर ने अद्भुत, कैसा ये स्वांग भरा।
हरषाए सब देव, मुस्काय हो मुदित धरा।।
वस्तुतः राधा-कृष्ण दो अलग स्वरूप नहीं वरन एक ही हैं
वहीं वृषभानुसुता मोहन-प्यारी श्री राधे का नाम लेने मात्र से ही मनुष्य के समस्त काज साध जाते हैं| मोहन से एकरूप होने के लिए श्री राधा कृष्ण का रूप धर कृष्णमय हो जाती हैं| गौर वर्ण पर पीताम्बर धर, हाथ मुरली और माथे मोर पंख धर मोहन की मोहक छवि में राधा की सुन्दर छवि के सम्मुख पूनम का चाँद भी आधा नज़र आता है -
रूप गहा जब माधव का पट पीत धरा तन नागरि राधा|
वेणु गही कर, श्याम छवी धर मोहक पाश बिछाकर बाँधा|
श्याम सलौनि छवी निरखी जब पूनम चाँद लगे अब आधा|
मोहन प्यारि, कृपा जिन पाकर, कौन सा काज नहीं कब साधा||
राधा का जन्म कृष्ण के साथ सृष्टि में प्रेम भाव मजबूत करने के लिए हुआ था. कुछ लोग मानते हैं कि राधा एक भाव है, जो कृष्ण के मार्ग पर चलने से प्राप्त होता है. वैष्णव तंत्र में राधा और कृष्ण का मिलन ही व्यक्ति का अंतिम उद्देश्य माना जाता है|
राधा- कृष्ण का प्रेम तो त्याग-तपस्या की पराकाष्ठा है। अगर 'प्रेम' शब्द का कोई समानार्थी है तो वो राधा-कृष्ण है। प्रेम शब्द की व्याख्या राधा-कृष्ण से शुरू होकर उसी पर समाप्त हो जाती है। राधा-कृष्ण की प्रीति से समाज में प्रेम की नई व्याख्या, एक नवीन कोमलता का आविर्भाव हुआ। समाज ने वो भाव पाया, जो गृहस्थी के भार से कभी भी बासा नहीं होता। राधा-कृष्ण के प्रेम में कभी भी शरीर बीच में नहीं था। जब प्रेम देह से परे होता है तो उत्कृष्ट बन जाता है और प्रेम में देह शामिल होती है तो निकृष्ट बन जाता है।
'राधामकृष्णस्वरूपम वै, कृष्णम राधास्वरुपिनम;
राधाष्टमी पर जो भी सच्चे मन और श्रद्धा से राधा की आराधना करता है, उसे जीवन में सभी सुख-साधनों की प्राप्ति होती है

खुद से जंग (लघुकथा)

 

खुद से जंग


एक आईने के बाहर वह  , एक आईने के अन्दर वह – उस कमरे में एक अनोखी जंग चल रही थी|

आईने के बाहर से दुनिया की नज़र से खुद को देखती वह , आईने के अन्दर से अपने अंतर्मन से खुद को परखती वह  ..

आज फिर एक बार लड़केवालों की मनाही के बाद घर में तूफ़ान उठा था| दादी ने कोसा, भाभी ने फिर ताने दिए, पापा सिर पकड़े बैठे थे और माँ रो-रोकर उस दिन को कोस रही थी जिस दिन वह काली लड़की जन्मी थी ... वह यानी कृष्णा ... उम्र 28 साल  

काली, नहीं तो , हाँ थोडा गहरा रंग ज़रूर है पर दुनिया को तो दूध-सा चिट्टा रंग ही चाहिए| |

"थोडा रंग साफ होता तो अपनी गृहस्थी लिए बठी होती, हमारी छाती पर मूँग न दल रही होती अभी तक, इससे तो अच्छा होता कि पैदा होते ही .....” – दादी की जुबान से उगलते ज़हर ने उसके दिलो-दिमाग को जला दिया|  सबकी परेशानी को एक बार में ही दूर करने का निश्चय किए कृष्णा ने धाड़ से दरवाज़ा बंद किया और उसी से पीठ टिका ज़मीन पर बैठी अपनी फटी-फटी आँखों से न जाने कितनी देर गरम लावा बहाती रही|

रोज़-रोज़ के इस कलेश को जड़ से ख़त्म करने का निश्चय लिए एक हाथ में दुपट्टा लिए पंखे की ऊँचाई का अनुमान लगाते-लगाते , अपने निर्णय को अमली जामा पहनाने पहले न जाने क्यों वह आईने के आगे ठिठक गई |

आइने के बाहर की कृष्णा ने आईने के अन्दर के अक्स को देख मुँह बिचकाया –

“तुम्हें पता है ना कि यह दुनिया तुम्हारे जैसी काली लड़कियों के लिए नहीं है, फिर क्यों अपने माँ-बाप पर बोझ बनी हुई हो ? हल्का करो उनका बोझ!

“पर आईने के अन्दर से अपने अंतर् की दृष्टि से स्वयं को देखती कृष्णा ने प्रतिकार किया – क्यों! किसी और की सोच के लिए मैं क्यों मरुँ?  उन्हें मेरी सुन्दरता नहीं दिखती तो यह उनका दोष है, उनके दोष के लिए खुद को सज़ा ... आखिर क्यों?”

“तेरी सुन्दरता” .... ज़माने की नज़र से खुद को देखती कृष्णा ने व्यंग्य से हँसते हुए कहा... “किस सुन्दरता की बात करती है ... यह पक्का रंग, नैन-नक्श भी साधारण ही हैं , ऊपर से यह कद .. किस चीज़ को सुन्दर मानती है तू?”

आईने के भीतर की कृष्णा ज़माने की सोच के इस कठोर प्रहार से घबरा कर कुछ पल को मौन रह गई ... कुछ पल सिर झुकाए खड़े रहने के बाद उसने फिर हिम्मत जुटाकर ऊपर देखा .. खुद की आँखों में आँखे डालते हुए बोली –“हाँ! सुन्दरता .. मेरे मन की सुन्दरता जो तुम्हें नज़र नहीं आती, और मैं भी तो पागल , तुम्हारे कहने से खुद को कुरूप मान बैठी| पेंटिंग, संगीत, अच्छी डिग्री, हर काम को सुघढ़ता से करने की काबिलियत ... कितने ही गुणों को मैंने सिर्फ ज़माने की रंग-रूप की कसौटी पर खरा उतरने के लिए पीछे धकेल दिया|”

ज़माने की सोच के हथियार से आईने के बाहर से फिर वार किया गया – “बाकी चीज़ों से पहले यही रंग-रूप तो दिखता है किसे नज़र आते हैं तेरे गुण तेरी योग्यता?”

इस बार आईने के भीतर से अंतर्मन ने पलटवार किया – “ किसे ? मत आने दो किसी को नज़र | पर अब मुझे खुद को दूसरों की नज़र से नहीं अपनी नज़र से देखना है| और अपनी नज़र में मैं सुन्दर हूँ| अब मुझे किसी के सर्टिफिकेट की ज़रूरत नहीं| नहीं चाहिए मुझे शादी के नाम पर किया गया ऐसा सौदा जिसमें मेरे मन से पहले मेरे तन को देखा जाए| जिसे मेरे गुण दिखाई नहीं देते ऐसा व्यक्ति मेरा जीवन साथी बनने लायक नहीं है|”

अपने साथ हुई जंग में आज कृष्णा का आत्मविश्वास जीत चुका था .. हाथ में लिए दुपट्टे को एक और फेंकते हुए उसने मुस्कुराते हुए अपने बंद कमरे के दरवाज़े की कुंडी खोल दी| साथ ही उसने आत्मग्लानि की बेड़ियों में जकड़ी अपनी अंतरात्मा की बेड़ियाँ भी तोड़ डालीं और स्वाभिमान के आकाश में ऊंची उड़ान का निश्चय किए पूर्ण आत्मविश्वास से घर से निकल पड़ी|

शालिनी रस्तौगी

गुरुग्राम


 


कैंसर से जंग : विश्व गुलाब दिवस

 ताकि

ज़िन्दगी हार न जाए ...
बहुत कठिन है डगर
बहुत कष्टकर है ज़िन्दगी ..
हर रोज़ लड़ते हैं वे दर्द से
हर रोज़ गुज़रते निराशा के पथ से ..
आओं उनकी लडाई को कुछ आसान बनाएँ..
एक गुलाब देकर उन्हें ..
कुछ आशा- विश्वास दिलाएँ ...
निराशा में डूबे हृदय में
थोडा-सा उल्लास जगाएँ....
हाँ, जंग में नहीं हैं वे अकेले
कहकर उनकी ताकत बढ़ाएं ...
ताकि कैंसर से अपनी जंग वे
बिना लड़े ही हार न जाएँ ..

विश्व गुलाब दिवस

नाम सुनकर भ्रमित मत हो जाइये| यह गुलाब दिवस

अवश्य है परंतु इसका वैलेंटाइन डे से कोई सम्बन्ध नहीं है| आज 22 सितम्बर को विश्व गुलाब दिवस के रूप में मनाया जाता है| आज का यह दिन समर्पित है कैंसर की भयानक बीमारी से ग्रसित, ज़िन्दगी और मौत के बीच झूल रहे लोगों का हौंसला बढ़ने के लिए| 

विश्व गुलाब दिवस मनाया जाता है कनाडा की मात्र 12 वर्षीय मेलिंडा रोज की याद में| मेलिंडा जो अस्किन ट्यूमर नामक एक बहुत ही दुर्लभ रक्त कैंसर ग्रसित थीं और जिसको डॉक्टरों ने भी कह दिया था कि वह २ सप्ताह से अधिक नहीं जी पाएगी| परन्तु 12 साल की इस साहसी लड़की ने अपनी जिजीविषा से न केवल डॉक्टर्स की भविष्यवाणी को झूठा साबित कर दिया और करीब 6 माह तक जीबित रही बल्कि वह अपनी हिम्मत से अन्य कैंसर पीड़ितों के मन में आशा व उत्साह का संचार करती रही| वह छोटी-छोटी कविताओ, टिप्पणियों, ई-मेल द्वारा कैंसर रोगियों को जीने की आशा देती थी| कैंसर रोगियों में खुशियों व आशा का संचार करना उसने अपने जीवन का मिशन बना लिया था|  सिंतबर के महीने में इस बच्ची ने सबका साथ छोड़ दिया और इस दुनिया को अलविदा कह दिया। यह बच्ची जिस तरह से 6 महीने तक अपनी बीमारी से लड़ती रहती। यह बात सभी कैंसर से पीड़ित लोगों के एक मिसाल बन गई। इसलिए इस दिन कैंसर से पीड़ित लोगों को गुलाब दिया जाता है और उन्हें जिंदगी से लड़ने की हिम्मत रखने का हौसला देने की कोशिश की जाती है। 

वास्तव में कैंसर जैसी भयंकर बीमारी न केवल शरीर के हौंसले पस्त कर देती है बल्कि दिलो-दिमाग पर भी अपने भय की ऐसी छाप छोड़ देती है की इस बीमारी से पीड़ित रोगी के मन से उत्साह-उमंग और जीने का चाव समाप्त हो जाता है| यह एक ऐसा दिन है जो कैंसर से लड़ रहे लोगों में आशा और प्रसन्नता फैलाने के लिए समर्पित है। जैसा कि अधिकांश कैंसर उपचार शरीर के लिए अत्यंत कष्टकर होते हैं, और साथ ही रोगी पर  गहरा मनोवैज्ञानिक प्रभाव डालते हैं, इसलिए मरीजों को खुश रखना बहुत जरूरी है, विशेषज्ञों का कहना है और इसलिए हर दिन उनके लिए एक 'रोज डे' होना चाहिए। 22 सितंबर को विश्व रोज़ डे के रूप में मनाया जाता है, कैंसर रोगियों के जीवन में खुशी लाने के लिए। यह लोगों में कैंसर के बारे में जागरूकता फैलाने का भी दिन है क्योंकि प्रारंभिक अवस्था में कैंसर का पता लगाने से अनेक प्रकार के कैंसरों का इलाज भी संभव है|

नैराश्य के अन्धकार में डूबे लोगों को गुलाब देकर यह अहसास करवाया जाता है कि जीवन अभी समाप्त नहीं हुआ है| जब तक साँसें चल रही हैं , प्रत्येक साँस को पूरे उत्साह व उमंग से जीना है| कैंसर जिंदगी का अंत नहीं है। कैंसर से लड़ा जा सकता है और लड़कर जीत हासिल भी की जा सकती है। अक्सर लोग कैंसर का नाम सुनते ही हिम्मत खो बैठते हैं। उन्हें लगता है कि अब वह ज्यादा दिनों तक नहीं जी पाएंगे। गुलाब देकर उन्हें यह महसूस कराने की कोशिश की जाती है कि उनकी जिंदगी भी फिर से गुलाब जैसी ही महक और खिल सकती है। 

विश्व रोज़ दिवस पर, यह महत्वपूर्ण है कि हम समय निकालकर कैंसर रोगियों के साथ वक्त बिताएँ। एक गुलाब कोमलता, प्रेम और देखभाल का प्रतीक है। विश्व रोज़ डे पर कैंसर के रोगियों को यह फूल देकर उन्हें यह अहसास करवाएँ कि हम उनकी कितनी देखभाल करते हैं।

रक्तदान : महादान

 रक्तदान पर दोहे 

1.

रग- रग में खौले नहीं, पथ पर बहे न व्यर्थ|

रक्षा प्राणों की करे, तभी रक्त  का अर्थ ||

2.

सडकों पर न व्यर्थ बहे, धर्म-जात के नाम|

मनुज रक्त आए सदा, मानवता के काम ||

भाई-चारा विश्व में, बढ़े प्रेम सद्भाव|

रक्तदान बंधुत्व का, मन में भर दे भाव||

4.

अन्न. वस्त्र, धरा औ धन, देत होय सम्मान |

पर सब दानों से बढ़ा, जग में शोणित दान||

5.

दान करे से घटे नहीं, होय न कछु नुकसान|

मिले समय पर रक्त जो, बचें मनुज के प्राण||

6.

अस्पताल में रक्त की , कमी न लीले प्राण| 

रक्त-दान संकल्प लें, करें महा कल्याण||

7.

तीन माह में दान कर, रक्त मनुज इक बार|

जीवन तीन बचाय के, कर सब पर उपकार||

8. 

सीमा पर ग़र खूँ बहा, कर न सको बलिदान|

रक्त देय जीवन बचा, ये भी काज महान||

9. 

बच जाते जीवन कई, मिल जाता जो रक्त|

दाता है जो रक्त का, सच्चा ईश्वर भक्त||

 10.

हृदय- रोग का डर घटे, होय आत्म संतोष|

नया रक्त निर्माण हो, कभी न कम यह कोष||

शालिनी रस्तौगी 

गुरुग्राम 

मैं हिंदी हूँ

 

मैं हिंदी हूँ

मात्र एक भाषा नहीं, मैं भारत की वाणी हूँ  

दुनिया में तीसरी सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषा से अब सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषा के स्थान को प्राप्त कर चुकी हमारी हिंदी को सर्वाधिक सरल और वैज्ञानिक भाषा का गौरव प्राप्त है| दूसरी  हिंदी ही वह भाषा है  हमारी संस्कृति, सभ्यता और शाश्वत मूल्यों का संरक्षण और पल्लवन किया है| यह भी सही है कि आज विश्व में हिंदी जानने-बोलने वालों की संख्या बढ़ रही है, यहाँ तक कि विश्व में सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषा मंदारिन को टक्कर देते हुए हिंदी उसके समकक्ष ही नहीं बल्कि उसके आगे आ खड़ी हुई है| मैंगलूर के डॉ. जयंतीप्रसाद नौटियाल के शोध में यह बात सामने आई है कि अब हिंदी जानने वालो की संख्या १३०० मिलियन हो गई है| मंदारिन से 200 मिलियन ज्यादा लोग हिंदी बोलते हैं|

 वैश्विक पटल पर आज हिंदी ने अपनी एक ऐसी पहचान  बना ली है कि विश्व की महाशक्ति कहे जाने वाले देशों ने अरबों रुपयों का बजट हिंदी शिक्षण के लिए निर्धारित किया है|  भारत आज विश्व बाज़ार में जिस शक्ति व सामर्थ्य के साथ उभर के आ रहा है, जाहिर है कि बिना हिंदी को जाने यहाँ के बाज़ार में अपनी पैंठ बनाना  असंभव है तो हिंदी को जानना, समझना और बोलना ही होगा|

प्रश्न यह है कि क्या केवल बाज़ारीकरण के या व्यावसायिक रूप से अधकचरी, अंग्रेज़ी के शब्दों के भार से लदी हिंदी का इस्तेमाल करने से वास्तव में हिंदी को कोई लाभ हो रहा है। हिंदी का लचीलापन, अन्य भाषाओं को स्वयं में समाहित करने की हिंदी की विशेषता ने हिंदी को आमजन की भाषा बनाया है, परन्तु इस लचीलेपन का गलत फायदा उठाकर हिंदी को आम बोलचाल की भाषा बनाने के नाम पर हम कहीं उसके स्वरूप को विकृत करते जा रहे हैं। अनेक हिंदी  समाचार पत्र पत्रिकाओं ने तो हिंदी के आसान शब्दों को भी अंग्रेज़ी भाषा के शब्दों से बदलकर हिंदी का मज़ाक बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है| सामाजिक मीडिया पर हिंदी के बढ़ते वर्चस्व को देखकर जहाँ एक ओर प्रसन्नता होती है वहीं दूसरी ओर रचनाओं में अशुद्ध वर्तनी, शाब्दिक तथा वाक्य रचना सम्बन्धी अशुद्धियाँ मन को व्यथित भी करती हैं की हम अपनी ही भाषा को शुद्धता के साथ नहीं लिख पाते|

परन्तु गौरतलब बात यह है कि जहाँ हिंदी के बिना हमारा गुज़ारा नहीं है, वहीं को आज भी अंग्रेजी के आगे इसे दोयम दर्जे पर क्यों खड़ा रहना पड़ रहा है? हमारी मानसिकता आज भी भाषाई गुलामी में जकड़ी क्यों अंग्रेज़ी के आगे सिर झुकाए हुए है|  “मैम, इसे तो हिंदी बिलकुल ही लाइक नहीं है, इवन ही डस नॉट लाइक टू राईट इन हिंदी. व्हाट तू डू मैम ” – युवा माँ बड़े गर्व के साथ इठलाते हुए हिंदी अध्यापिका को बता रही थी और अध्यापिका दुःख मिश्रित विवशता के साथ उन माता-पिता के अंग्रेजी मिश्रित वार्तालाप को सुन रही थी| ? आज भी अंग्रेजी में संभाषण या कम से कम 50 प्रतिशत अंग्रेजी शब्दों के साथ हिंदी बोलने में लोग अपनी शान समझते हैं? कारण यह है कि जब आप के मन में हिंदी बोलने के प्रति हीनभावना है तो आप कैसे उम्मीद कर सकतीं हैं कि बच्चे के मन में अपनी भाषा के प्रति प्रेम और सम्मान पैदा होगा? जब आपका खुद का हिंदी ज्ञान अधकचरा है तो आप भला बच्चे को हिंदी कैसे पढ़ाएँगी, कैसे उसके उच्चारण को शुद्ध कर सकती हैं? जब प्रारम्भिक कक्षाओं से ही सभी विषयों का अध्ययन अंग्रेजी माध्यम से करवाया जाता है तो बच्चे को हिंदी का अध्ययन निरर्थक लगने लगता है| शिक्षा के माध्यम के रूप में हिंदी को अनुपयुक्त ठहराकर सभी विषयों की शिक्षा के लिए अंग्रेजी का चयन करना कहाँ तक उपयुक्त है?

 वे यक्षप्रश्न हैं जिनके उत्तर हमें शीघ्र ही खोजने होंगे| और इनका उत्तर भी शायद हमें अपनी अंतरात्मा से ही मिलेगा| शिक्षा में  हिंदी को अनिवार्य करने का विरोध करने वाले यह नहीं समझ रहे कि वे अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मार रहे हैं|  जितनी जल्दी हम इस बात को समझ जाएँगे कि हिंदी का तिरस्कार करके हम अपनी जड़ों से कट रहें हैं, अपनी समृद्ध सभ्यता, संस्कृति तथा मूल्यों से दूर जा रहे हैं, हमारे लिए बेहतर होगा| इस दिशा में नई शिक्षा नीति में प्रारंभिक कक्षाओं में मातृभाषा में शिक्षा का प्रावधान करके अपनी भाषाओं के प्रति सम्मान का भाव जागृत करने की पहल सराहनीय है| न केवल हिंदी वरन् अन्य भारतीय भाषाएँ भी अपने उचित स्थान व सम्मान को प्राप्त कर पाएँगी|

Monday, 21 September 2020

विश्व अल्जाइमर दिवस (२१ सितम्बर) पर ; बुजुर्ग

 

विश्व अल्जाइमर दिवस (२१ सितम्बर) पर

बुजुर्ग

अक्सर भूल जाते हैं

छोटी-बड़ी बातों को|


बहुत ज़ोर देकर भी नहीं

कर पाते हैं याद

कुछ बेहद नज़दीकी नामों को|

दवाई खाई या नहीं,

या यूँही रखकर भूल गए कहीं!

अभी कल ही की गुज़री बात

कहाँ आ पाती है याद!

पर ज़माने पहले गुज़रे किस्से हज़ार,

याद रह जाते हैं उन्हें सिलसिलेबार!

क्यों फिर-फिर भटक जाते हैं,

बचपन के उन गलियारों में?

ज़माने पहले गुज़र चुके

कुछ जिगरी यारों में!

धुँधली पड़ती जाती नज़र से

दिखाई देते हैं साफ़-साफ़ ...

वो गाँव-खेत-कुएँ, वो पुराना टूटा हुआ मकान|

बाँटना चाहते हैं तुम्हारे साथ वे

अपनी उस अनमोल थाती को |

अपनी लरजती जुबान से सुनाना चाहते हैं

हज़ारों क़िस्से|

तुम्हारे माथे की त्योरियाँ,

झिड़क कर दूर झटक देती हैं

उनकी इस बचकानी सी ख्वाहिश को|

और उनकी काँपती बूढ़ी उंगलियाँ

खुद ही लाड़ से सहला गले से लगा लेती हैं

अपने गुज़रे कल को!

वे खुद में फिर-फिर जीते हैं

बीते एक-एक पल को  !

खुद से बात करते कभी

झुर्रियों के बीच खिल उठती है मुस्कान ...

कभी बेसबब ही बहे अश्क़,

उन आड़ी-तिरछी नालियों में जम

छोड़ देते हैं अपने निशान !

पर तुम नहीं समझ पाते

कि क्यों बुजुर्ग

भूल अपना आज, बीते कल में गुम जाते?

क्या आज को याद रखने की

कोई वज़ह तुमने उनको दी?

क्यों उन्हें बचपन में लौट,

ढूँढ़नी पड़ती अपनी मुस्कान ?

क्यों कुछ पल उनके साथ बिता,

कर देते नहीं हँसना आसान?

बस थोडा-सा प्यार, थोड़ी-सी अपनाहत ,

दे देगी आज में जीने का हौंसला,

भर देगी मन में जीने की चाहत !

हाँ! याद दिलाने को मेरे अपने हैं मेरे पास

जब यह हौंसला मिल जाएगा,

तब कुछ भूल जाते का डर

बुजुर्गों को न सताएगा ......

 

 

 

 

Monday, 20 July 2020

पतंग


पुरुष ने कहा ,
सुनो! मैं औरों जैसा नहीं हूँ,
संकुचित नहीं हैं विचार मेरे|
बहुत वृहद है सोच मेरी,
मैं नहीं समझता औरत को
जूती पाँव की!
मेरे साथ आओ,
मैं दूँगा तुम्हें ..... अनंत आकाश !
उड़ने को, विचरने को,
खोजने को, रचने को,
मन की कल्पनाओं में ....
मनचाहे रंग भरने को|
तुम आओ तो ज़रा साथ मेरे ..
मैं बदल दूँगा तुम्हारी दुनिया!
‘मैं’ शब्द पर दिए गए विशेष बल को
स्त्री ने भी विशेषकर सुना ...
एक उपेक्षित मुस्कान पुरुष की ओर फेंक कहा –
“मैं” ???
सुनो पुरुष !
तुम्हारी महानता का यह शौक
करने को पूरा,
नहीं हूँ मैं उचित पात्र,
क्योंकि औरत हूँ मैं,
मेरे पास अपने पंख हैं,
और तुम्हें चाहिए
महज
एक पतंग !!!



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