Friday, 25 September 2020

मैं हिंदी हूँ

 

मैं हिंदी हूँ

मात्र एक भाषा नहीं, मैं भारत की वाणी हूँ  

दुनिया में तीसरी सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषा से अब सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषा के स्थान को प्राप्त कर चुकी हमारी हिंदी को सर्वाधिक सरल और वैज्ञानिक भाषा का गौरव प्राप्त है| दूसरी  हिंदी ही वह भाषा है  हमारी संस्कृति, सभ्यता और शाश्वत मूल्यों का संरक्षण और पल्लवन किया है| यह भी सही है कि आज विश्व में हिंदी जानने-बोलने वालों की संख्या बढ़ रही है, यहाँ तक कि विश्व में सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषा मंदारिन को टक्कर देते हुए हिंदी उसके समकक्ष ही नहीं बल्कि उसके आगे आ खड़ी हुई है| मैंगलूर के डॉ. जयंतीप्रसाद नौटियाल के शोध में यह बात सामने आई है कि अब हिंदी जानने वालो की संख्या १३०० मिलियन हो गई है| मंदारिन से 200 मिलियन ज्यादा लोग हिंदी बोलते हैं|

 वैश्विक पटल पर आज हिंदी ने अपनी एक ऐसी पहचान  बना ली है कि विश्व की महाशक्ति कहे जाने वाले देशों ने अरबों रुपयों का बजट हिंदी शिक्षण के लिए निर्धारित किया है|  भारत आज विश्व बाज़ार में जिस शक्ति व सामर्थ्य के साथ उभर के आ रहा है, जाहिर है कि बिना हिंदी को जाने यहाँ के बाज़ार में अपनी पैंठ बनाना  असंभव है तो हिंदी को जानना, समझना और बोलना ही होगा|

प्रश्न यह है कि क्या केवल बाज़ारीकरण के या व्यावसायिक रूप से अधकचरी, अंग्रेज़ी के शब्दों के भार से लदी हिंदी का इस्तेमाल करने से वास्तव में हिंदी को कोई लाभ हो रहा है। हिंदी का लचीलापन, अन्य भाषाओं को स्वयं में समाहित करने की हिंदी की विशेषता ने हिंदी को आमजन की भाषा बनाया है, परन्तु इस लचीलेपन का गलत फायदा उठाकर हिंदी को आम बोलचाल की भाषा बनाने के नाम पर हम कहीं उसके स्वरूप को विकृत करते जा रहे हैं। अनेक हिंदी  समाचार पत्र पत्रिकाओं ने तो हिंदी के आसान शब्दों को भी अंग्रेज़ी भाषा के शब्दों से बदलकर हिंदी का मज़ाक बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है| सामाजिक मीडिया पर हिंदी के बढ़ते वर्चस्व को देखकर जहाँ एक ओर प्रसन्नता होती है वहीं दूसरी ओर रचनाओं में अशुद्ध वर्तनी, शाब्दिक तथा वाक्य रचना सम्बन्धी अशुद्धियाँ मन को व्यथित भी करती हैं की हम अपनी ही भाषा को शुद्धता के साथ नहीं लिख पाते|

परन्तु गौरतलब बात यह है कि जहाँ हिंदी के बिना हमारा गुज़ारा नहीं है, वहीं को आज भी अंग्रेजी के आगे इसे दोयम दर्जे पर क्यों खड़ा रहना पड़ रहा है? हमारी मानसिकता आज भी भाषाई गुलामी में जकड़ी क्यों अंग्रेज़ी के आगे सिर झुकाए हुए है|  “मैम, इसे तो हिंदी बिलकुल ही लाइक नहीं है, इवन ही डस नॉट लाइक टू राईट इन हिंदी. व्हाट तू डू मैम ” – युवा माँ बड़े गर्व के साथ इठलाते हुए हिंदी अध्यापिका को बता रही थी और अध्यापिका दुःख मिश्रित विवशता के साथ उन माता-पिता के अंग्रेजी मिश्रित वार्तालाप को सुन रही थी| ? आज भी अंग्रेजी में संभाषण या कम से कम 50 प्रतिशत अंग्रेजी शब्दों के साथ हिंदी बोलने में लोग अपनी शान समझते हैं? कारण यह है कि जब आप के मन में हिंदी बोलने के प्रति हीनभावना है तो आप कैसे उम्मीद कर सकतीं हैं कि बच्चे के मन में अपनी भाषा के प्रति प्रेम और सम्मान पैदा होगा? जब आपका खुद का हिंदी ज्ञान अधकचरा है तो आप भला बच्चे को हिंदी कैसे पढ़ाएँगी, कैसे उसके उच्चारण को शुद्ध कर सकती हैं? जब प्रारम्भिक कक्षाओं से ही सभी विषयों का अध्ययन अंग्रेजी माध्यम से करवाया जाता है तो बच्चे को हिंदी का अध्ययन निरर्थक लगने लगता है| शिक्षा के माध्यम के रूप में हिंदी को अनुपयुक्त ठहराकर सभी विषयों की शिक्षा के लिए अंग्रेजी का चयन करना कहाँ तक उपयुक्त है?

 वे यक्षप्रश्न हैं जिनके उत्तर हमें शीघ्र ही खोजने होंगे| और इनका उत्तर भी शायद हमें अपनी अंतरात्मा से ही मिलेगा| शिक्षा में  हिंदी को अनिवार्य करने का विरोध करने वाले यह नहीं समझ रहे कि वे अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मार रहे हैं|  जितनी जल्दी हम इस बात को समझ जाएँगे कि हिंदी का तिरस्कार करके हम अपनी जड़ों से कट रहें हैं, अपनी समृद्ध सभ्यता, संस्कृति तथा मूल्यों से दूर जा रहे हैं, हमारे लिए बेहतर होगा| इस दिशा में नई शिक्षा नीति में प्रारंभिक कक्षाओं में मातृभाषा में शिक्षा का प्रावधान करके अपनी भाषाओं के प्रति सम्मान का भाव जागृत करने की पहल सराहनीय है| न केवल हिंदी वरन् अन्य भारतीय भाषाएँ भी अपने उचित स्थान व सम्मान को प्राप्त कर पाएँगी|

Monday, 21 September 2020

विश्व अल्जाइमर दिवस (२१ सितम्बर) पर ; बुजुर्ग

 

विश्व अल्जाइमर दिवस (२१ सितम्बर) पर

बुजुर्ग

अक्सर भूल जाते हैं

छोटी-बड़ी बातों को|


बहुत ज़ोर देकर भी नहीं

कर पाते हैं याद

कुछ बेहद नज़दीकी नामों को|

दवाई खाई या नहीं,

या यूँही रखकर भूल गए कहीं!

अभी कल ही की गुज़री बात

कहाँ आ पाती है याद!

पर ज़माने पहले गुज़रे किस्से हज़ार,

याद रह जाते हैं उन्हें सिलसिलेबार!

क्यों फिर-फिर भटक जाते हैं,

बचपन के उन गलियारों में?

ज़माने पहले गुज़र चुके

कुछ जिगरी यारों में!

धुँधली पड़ती जाती नज़र से

दिखाई देते हैं साफ़-साफ़ ...

वो गाँव-खेत-कुएँ, वो पुराना टूटा हुआ मकान|

बाँटना चाहते हैं तुम्हारे साथ वे

अपनी उस अनमोल थाती को |

अपनी लरजती जुबान से सुनाना चाहते हैं

हज़ारों क़िस्से|

तुम्हारे माथे की त्योरियाँ,

झिड़क कर दूर झटक देती हैं

उनकी इस बचकानी सी ख्वाहिश को|

और उनकी काँपती बूढ़ी उंगलियाँ

खुद ही लाड़ से सहला गले से लगा लेती हैं

अपने गुज़रे कल को!

वे खुद में फिर-फिर जीते हैं

बीते एक-एक पल को  !

खुद से बात करते कभी

झुर्रियों के बीच खिल उठती है मुस्कान ...

कभी बेसबब ही बहे अश्क़,

उन आड़ी-तिरछी नालियों में जम

छोड़ देते हैं अपने निशान !

पर तुम नहीं समझ पाते

कि क्यों बुजुर्ग

भूल अपना आज, बीते कल में गुम जाते?

क्या आज को याद रखने की

कोई वज़ह तुमने उनको दी?

क्यों उन्हें बचपन में लौट,

ढूँढ़नी पड़ती अपनी मुस्कान ?

क्यों कुछ पल उनके साथ बिता,

कर देते नहीं हँसना आसान?

बस थोडा-सा प्यार, थोड़ी-सी अपनाहत ,

दे देगी आज में जीने का हौंसला,

भर देगी मन में जीने की चाहत !

हाँ! याद दिलाने को मेरे अपने हैं मेरे पास

जब यह हौंसला मिल जाएगा,

तब कुछ भूल जाते का डर

बुजुर्गों को न सताएगा ......

 

 

 

 

Monday, 20 July 2020

पतंग


पुरुष ने कहा ,
सुनो! मैं औरों जैसा नहीं हूँ,
संकुचित नहीं हैं विचार मेरे|
बहुत वृहद है सोच मेरी,
मैं नहीं समझता औरत को
जूती पाँव की!
मेरे साथ आओ,
मैं दूँगा तुम्हें ..... अनंत आकाश !
उड़ने को, विचरने को,
खोजने को, रचने को,
मन की कल्पनाओं में ....
मनचाहे रंग भरने को|
तुम आओ तो ज़रा साथ मेरे ..
मैं बदल दूँगा तुम्हारी दुनिया!
‘मैं’ शब्द पर दिए गए विशेष बल को
स्त्री ने भी विशेषकर सुना ...
एक उपेक्षित मुस्कान पुरुष की ओर फेंक कहा –
“मैं” ???
सुनो पुरुष !
तुम्हारी महानता का यह शौक
करने को पूरा,
नहीं हूँ मैं उचित पात्र,
क्योंकि औरत हूँ मैं,
मेरे पास अपने पंख हैं,
और तुम्हें चाहिए
महज
एक पतंग !!!



Monday, 22 June 2020

प्रेम और देह

तुमने बोला... प्रेम लिखो
और मैंने बड़े जतन से
दिल की धड़कन लिख दी....
आँखों की उलझन,
रूह की तड़पन,
प्रीत में डूबे भाव लिखे ...
जो कहे नहीं थे अब तक वो
भीगे-भीगे जज़्बात लिखे।
पलकों पर ठहरा इंतेज़ार लिखा,
उम्र भर का क़रार लिखा,
आँखों के झिलमिल ख़्वाब लिखे,
लब पर ठहरे अल्फ़ाज़ लिखे।
लबों की लरजिश,
गरदन की जुम्बिश,
बेचैन ज़ुल्फ़ों की उलझन लिख दी।
उँगलियों में लिपटते-खुलते
दुपट्टे की सिमटी सिलवट लिख दी...।
जमीन को कुरेदते पैर के अँगूठे की
हर हरकत, हर ग़फ़लत लिख दी ..।
पर पता नहीं क्यों ....
तुम्हें दिखा ही नहीं प्रेम
मेरी इस इबारत में!!!
बोलो न ..... ऐसा क्या छूट गया ,
जो तुम ढूँढ़ रहे थे ....
और मैंने नहीं लिखा ....?
क्या .... देह !!!

मौत से पहले क्या मरना ...


मौत से पहले क्या मरना .....!
माना घनघोर अँधेरा है,
सूरज पर तम का पहरा है,
निराशा घन घनघोर बड़े
अवसाद ने डाला डेरा है......
पर कब तक आशा पुंज छिपेगा?
कब तक तम दम-ख़म भरेगा?
तम के गहरे गह्वर को चीर
कल फिर से सूरज चमकेगा,
अँधेरे से क्या डरना!!
जब तक जीवन है जीना है,
मौत से पहले क्या मरना !!!

कौन किसी को बना सका ..
जो कोई तुम्हें बनाएगा ?
जब बना न पाया कोई तो ..
कोई कैसे तुम्हें मिटाएगा?
तुम खुद अपने निर्माता हो,
खुद अपने भाग्य विधाता हो!
कर्म-डगर हो निडर चलो,
ईश्वर साथ तेरा देगा!
इन्सान के धोखे के कारण,
भगवान पर शंका क्यों करना?
जब तक जीवन है जीना है,
मौत से पहले क्या मरना !!!

तुम सोचो कितने अपने हैं,
उनके भी कितने सपने हैं,
तुम ज्योति कितने नयनों की
तुमसे वे दीपक जलने हैं!!
कलुषित कपटी इंसानों  को
कुछ स्वनिर्मित भगवानों को
मत हक़ दो कि वे रौंदें आकर
सपनों के महल मकानों को |
कमजोर चलन वालों के सम्मुख
कमज़ोर इरादा क्या करना !
जब तक जीवन है जीना है,
मौत से पहले क्या मरना !!!

Sunday, 17 May 2020

लोकल का बल


‘गुच्ची’ ‘अरमानी’ और ऐसे ही कितने बड़े-बड़े ब्रांड्स के पीछे भागती आज की युवा पीढ़ी, लोकल ब्रांड्स के नाम पर नाक-भौं सिकोड़ने वाली पीढ़ी, दिखावे की ख्वाहिश में बड़े-बड़े माल्स के इंटरनेशनल शोरूम्स के चक्कर काटती पीढ़ी| यह चलन जो कुछ समय पहले तक महानगरों का हुआ करता था आज यही चलन छोटे-शहरों और कस्बों तक में पाँव पसारता दिखाई दे रहा है| अमीरों के यह ब्रांड्स के शौक धीरे-धीरे मध्यमवर्ग की युवा पीढ़ी में अपनी पैंठ बना चुके हैं| कभी ‘स्टेटस सिम्बल’ बनकर तो कभी ‘पीयर प्रेशर’ बनकर बड़े-बड़े ब्रांड्स हमारे दिलोदिमाग पर कब्ज़ा करते जा रहे हैं| बास्तव में ग्लोबल ब्रांड्स के प्रति दीवानगी और भारतीय ब्रांड्स को हेय दृष्टि से देखने की प्रवृत्ति ने भारतीय इंडस्ट्रीज पर बहुत बड़ी घात की है| जिसप्रकार ऑनलाइन शॉपिंग के प्रति बढ़ती दीवानगी ने लोकल बाजारों के व्यापार पर प्रभाव डाला है उसी प्रकार बड़े विदेशी ब्रांड नाम की भेडचाल ने स्वदेशी ब्रांड और कुटीर उद्योगों को प्रभावित किया है| लोकल बाज़ार जाना, लोकल वस्तुएं खरीदना आज की पीढ़ी को बहुत निम्नस्तरीय लगता है| वे लोग जो विदेशी ब्रांड के नाम पर किसी भी चीज़ के लिए हजारों लाखों खर्च करने से नहीं हिचकिचाते, यदि लोकल मार्केट से सब्जी भी खरीदने निकलते हैं तो मोल-भाव में लग जाते हैं| बड़े शोरूम्स में बिना हील-हुज्जत किए चुपचाप अपना डेबिट-क्रेडिट कार्ड सरका देने वाला यह वर्ग गरीब दुकानदार से 100-50 रुपए कम करवाने में अपनी शान समझता है| तो ऐसे में प्रधानमंत्री मोदी का लोकल के प्रयोग को बढ़ावा देने का आह्वान इस संकटकाल में प्रासंगिक ही नहीं अनिवार्य हो जाता है| समय आ गया है जब हम घर के मंदिरों तक में घुसपैंठ कर चुके चीनी सामान को बाय-बाय कर देसी को अपनाने की शुरुआत करें| लघु एवं कुटीर उद्योगों को बचाने की कवायद में यह पहल जरूरी भी है| बड़े-बड़े ब्रांड्स को टक्कर देने की क्षमता पैदा करने के लिए लघु एवं कुटीर उद्योगों को सशक्त बनाना होगा| लोगों के सहयोग और लोकल सामान के ज्यादा से ज्यादा प्रयोग के बिना यह संभव नहीं हो पाएगा|
लोकल को ग्लोबल बनाने का सफ़र इतना आसान तो नहीं होगा| लोगों के मन से लोकल सामान के प्रयोग के प्रति जो हीन भावना घर कर चुकी है उसे निकालना आसान नहीं होगा| पर कहीं न कहीं तो शुरुआत करनी ही होगी|  ज़रूरत है मानसिकता बदलने की| जब हमें देसी पहनने पर शर्मिंदगी नहीं गर्व होगा, जब विदेशी ब्रांड लोगों की पहचान और उनके परिचायक नहीं बनेंग, जब हम गर्व से स्वदेशी को अपनाएँगे,  तब मिलेगा लोकल को बल और तभी ग्लोबल बनेगा ... लोकल|

Saturday, 16 May 2020

दिल को दरिया कि सहरा बना लूँ


‘आ अब लौट चलें



‘आ अब लौट चलें’ ......  जाने कितनी बार मन ने यह कहा|
‘घर आजा परदेसी तेरा देस बुलाए है’ ...... कितनी ही बार अपनी ज़मीन ने तड़प कर पुकारा| पर रोज़ी-रोटी की चिंता ने जो एक बार अपनी ज़मीन छुड़वाई तो वापसी दिन व दिन मुश्किल ही होता गया| पर ये निष्ठुर शहर कभी उनके न हुए| इन महानगरों के लिए वे केवल सस्ते मजदूर थे, जिन्होंने उनकी मेहनत का फायदा तो उठाया पर हमेशा उन्हें देखकर नाक भौं सिकोड़ते रहे और अपने खूबसूरत शहरों पर बदनुमा दाग मानते रहे| यह जानते हुए भी इन सस्ते मजदूरों के बिना हमारे शहरों के बहुत से काम रुक जाएँगे| फिर आया यह संकटकाल ‘कोरोना काल’ और ऐसे में इन महानगरों ने अपना असली चेहरा दिखा दिया| जिस रोटी का सपना दिखा शहरों ने उन्हें ललचाया था उसी रोटी को तरसा दिया| कोरोना के कहर ने इन गरीबों के सामने दोहरा संकटखड़ा कर दिया है। उनके लिए पहला संकट अपने को जिंदा रखना है और दूसरा संकट महानगरों में फैले कोरोना के संक्रमण से अपने को बचाना। न रहने की समुचित जगह, जो सामाजिक दूरी के नियमों का पालन कर पाएँ, न समुचित जानकारी न ही रोजी-रोटी का ठिकाना| जो मजदूर रोटी की तलाश में यहाँ आये थे वे अपने सामान की सिर पर लाद छोटे छोटे बच्चों को साथ लिए भूखे प्यासे पैदल ही अपने गाँवों की तरफ लौट चले|  कोई पैदल सैकड़ों किलोमीटर चला तो कोई साईकिल रिक्शा या जो भी साधन उपलब्ध हो पाया| इस बेमुरव्वत शहर से वे जल्दी जल्दी अपने गाँवों की अपनाहत भरी छाँव में लौट जाना चाहते थे| पता नहीं कितने अपने गाँव तक पहुँच पाए और कितनों ने रस्ते में दम तोड़ दिया| 
अगर आंकड़े देखें तो भारत में लगभग 14 करोड़ के आस-पास देशांतरिक प्रवासी हैं। इनमें करीब दो करोड़ प्रवासी मजदूर दो बड़े राज्यों उत्तर प्रदेश एवं बिहार से हैं। माना जाता है कि हिंदी पट्टी के चार राज्यों उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान से लगभग 50 प्रतिशत प्रवासी मजदूर आते हैं। दिल्ली एवं मुंबई इन प्रवासी मजदूरों के पसंदीदा शहर हैं, जहां बड़ी संख्या में प्रवासी श्रमिक कार्यरत हैं।
सवाल यह है कि जिस कमाई के भरोसे उन्होंने अपना गाँव छोड़ा था, वह इतनी नाकाफी थी कि कुछ दिन तक भी उनके परिवारों के पेट की भूख नहीं बुझा पाई| इन मजदूरों के भरोसे करोड़ों का कारोबार करने वाले उद्यमी, ठेकेदार और मालिकों ने  उनकी तरफ से मुँह फेर लिया| अब शहरों से पलायन करने के अलावा इनके पास और चारा भी क्या था| लाखों की भीड़ जत्थे बनाकर लौटने की सूरत खोज रही थी| पुलिस और प्रशासन एक-दूसरे पर इस सबकी ज़िम्मेदारी डाल कर अपना दामन झटकना चाहते थे | शहरों का यह संवेदनहीन चेहरा बावजूद सारी चमक-दमक के छिप नहीं पाया|
बहुत संभव से कि शहरों की इस बेरुखी से अब इन प्रवासी मजदूरों का मोहभंग हो गया हो, शायद अब अपनी ज़मीन छोड़कर वापस शहर का रुख़ करने में वे हज़ार बार सोचेंगे| पर अभी तो फिलहाल वे अपने वतन में अपने गांवों में जाकर भी गैर ही हो गए हैं| शहरों से लौट रहे मजदूरों को उनके गृह नगर और गांवों के लोग संदिग्ध दृष्टि से देख रहे हैं| उनके समीप जाते यह सोच रहे हैं कि कहीं वे इस महामारी के संवाहक बनकर तो नहीं लौटे हैं?

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