नहीं बन पाती शिला
पूरी तरह
कोई अहिल्या कभी
उस पाषाणी आवरण के नीचे
हमेशा छलकता रहता है
मीठे जल का एक सोता
गाहे-बगाहे जिसमें
उग आते हैं कभी
इच्छाओं के कमल।
समझ नहीं पाती
हर झरोखे, हर झिरी को
बड़े यत्न से मूँदने के बाद भी
जाने कहाँ से
प्रवेश कर जाती है
उम्मीद की किरण
जो बार-बार खिला देती है
कामना का कमल
हाँ! कोई अहिल्या
पूरी तरह
नहीं बन पाती शिला
~~~~~~~~~~~~~
शालिनी रस्तौगी
पूरी तरह
कोई अहिल्या कभी
उस पाषाणी आवरण के नीचे
हमेशा छलकता रहता है
मीठे जल का एक सोता
गाहे-बगाहे जिसमें
उग आते हैं कभी
इच्छाओं के कमल।
समझ नहीं पाती
हर झरोखे, हर झिरी को
बड़े यत्न से मूँदने के बाद भी
जाने कहाँ से
प्रवेश कर जाती है
उम्मीद की किरण
जो बार-बार खिला देती है
कामना का कमल
हाँ! कोई अहिल्या
पूरी तरह
नहीं बन पाती शिला
~~~~~~~~~~~~~
शालिनी रस्तौगी


