Thursday, 31 March 2016

नहीं बन पाती शिला

नहीं बन पाती शिला
पूरी तरह
कोई अहिल्या कभी
उस पाषाणी आवरण के नीचे
हमेशा छलकता रहता है
मीठे जल का एक सोता
गाहे-बगाहे जिसमें
उग आते हैं कभी
इच्छाओं के कमल।
समझ नहीं पाती
हर झरोखे, हर झिरी को
बड़े यत्न से मूँदने के बाद भी
जाने कहाँ से
प्रवेश कर जाती है 
उम्मीद की किरण 
जो बार-बार खिला देती है 
कामना का कमल 
हाँ! कोई अहिल्या 
पूरी तरह 
नहीं बन पाती शिला
~~~~~~~~~~~~~
शालिनी रस्तौगी

अश्वत्थामा

अश्वत्थामा बन गई है वो,
अपने पकते-रिसते घाव को
अंतरात्मा पर ढोती,
मूक पीड़ा को पीती|
शुष्क आँसुओं के कतरों की 
चुभन आँखों में लिए
फिर रही है|
हाँ, अश्वत्थामा बन गई है वो ....

भेद जाती हैं कान
अंतस से उठती आवाजें
अपने ही मन के कुरुक्षेत्र में 
अपना ही रचा महाभारत 
लड़ रही है वो
हाँ, अश्वत्थामा बन गई है वो 
पीड़ा, घुटन, रुदन का 
सदियों तक 
अभिशाप झेलना 
बन चुकी है उसकी नियति 
आखिर क्यों न हो 
परिणाम समान 
जब
पाप भी हुआ था  समान.... 
अपनी मौन, संज्ञाशून्य सहमति को 
बना ब्रह्मास्त्र 
खुद अपने ही गर्भ पर कर प्रहार 
हाँ, बन गई है वो 
अश्वत्थामा........



Tuesday, 23 February 2016

जाने किस बहकावे में

जाने किस बहकावे में आकर
उर्वरा धरती को
चढ़ी है जिद
साबित करने की खुद को ऊसर
अपनी हरियाई कोख को
पीट- पीट कर रही विलाप
अकूत सम्पदा को आँचल में छिपाए
आँखों में आँसू, होंठों पर गुहार लिए
मांगती फिर रही
अनाज के दो दाने
आक्रोश से फटी पड़ती है
कि भीतर के लावे से
सब कुछ ख़ाक कर देने को आतुर
वीर प्रसविनी आज
भक्ष रही निज पूतों को
जाने किस बहकावे में
~~~~~~~~~~~~
शालिनी रस्तौगी

त्रिवेणी


बहुत मुश्किल रहा तोड़ना दीवारें भरम की।
कितने जतन से खुद, चिना था हमने जिन्हें ।
.............
सच है कि अपनी कैद से रिहाई आसाँ नहीं होती।

2.
दिमाग का सुकूँ देके , जिस्म का आराम खरीदा है।
पैसों के एवज रूह बेच, जी का जंजाल खरीदा है
.............
जाने क्यों घाटे की तिजारत में लगी है दुनिया ?

3.
कभी झांकती हैं मन में , कभी सेंध लगाती हैं 
कहीं रहूँ मैं, हर घडी इर्द-गिर्द ही मंडराती हैं 
.......... 
जाने चोर हैं कि जासूस ... तुम्हारी आँखे

4.
यादों के कुएँ से.मशक भरने का 
रोज़गार दिमाग को दे रखा है 
..............
अजीब लम्हे हैं फुर्सत के... एक पल को खाली रहने नहीं देते

साजिश

दिशाओं ने की है साजिश
पूरब के खिलाफ़
भड़काया है बादलों को
कि मत होने दो सुबह
बहुत इतराती है ये प्राची
कि सूरज
इसके दामन से निकलता है
रोक लो रास्ता
उदित होती हर किरण का
चलो छा जाओ
कि दुनिया देख न पाए उजाला
गरजो, बरसों, बिजलियाँ गिराओ
बूँदे नहीं, धरा पर सैलाब बरसाओ
हदें तोड़ने की इजाज़त है
चाहे जहाँ तक जाओ
कि त्रस्त होगी धरती तो
पिघलेगी प्राची
शायद सफल हो जाए
सूरज को कैद करने की
दिशाओं की साजिश
~~~~~~~~~~~~~
शालिनी रस्तौगी

Sunday, 3 January 2016

प्रेम हो या परमात्मा

प्रेम हो या परमात्मा
कौन तुम?
अंतर, बाह्य, चहुदिशि, चहुँओर
आच्छादित तुमसे
अस्तित्व मेरा|
संशय में हूँ
अब मुझमें कितनी
बची शेष मैं?
या आवृत कर डाला है तुमने
सम्पूर्ण मुझे
पर देखो 
कैसा ये आश्चर्य
कि इस संकुलता से
घुटते नहीं प्राण मेरे
न अकुलाते मुक्ति को|
नहीं, देखना भी चाहती नहीं
परे इस आवरण के
कैसा अनंत विस्तार 
भर दिया मेरे अंतस में !
रच दी मात्र मेरे लिए

दुनिया अलग है तुमने
सम्मोहित सी रहूँ विचरती
इसके हर कोने में
आत्मविमुग्ध
रह जाती विस्मित
पाती इतना जो था अज्ञात
क्या था मेरे ही मन में
कैसे और कब रच डाला मुझमें
ये तिलिस्म तुमने?
नहीं , कोई और तो नहीं
कर सकता चमत्कार ये| 
निश्चित ही तुम
या तो प्रेम हो या परमात्मा........
~~~~~~~~~~~~~ 
शालिनी रस्तौगी

Wednesday, 2 December 2015

लगाव


लगाव तुमसे
अलग- सा ही है कुछ
अदृश्य, अपरिभाषित, अपरिमित
अकल्पित हैं सीमायें इसकी
है कौन -सा आकर्षण जो
विकर्षण की हर सीमा तक जाकर भी
फिर - फिर तोड़
समीपता की हर एक सीमा
समाहित कर देता है मुझे तुममें
सोचती ... कुछ तो कहा होगा किसी ने
कुछ नाम तो दिया होगा
इस आकर्षण को
कुछ शब्द परिभाषित इसे
करते तो होंगे
ऐसे ही अनुभव
और भी रखते तो होंगे
पर हर बार .... कोई उत्तर नहीं मिल पता
परिभाषित कैसे करूँ इसे
रूप नया धर
हर बार सामने आता
अब छोड़ दिया इसे कुछ नाम देना
क्योंकि बहुत अलग है
मेरा
तुमसे लगाव।
Shalini rastogi

प्रेम पगे दोहे


बैरी बन बैठा हिया, जाय बसा पिय ठौर ।
गात नहीं बस में रहा, कहूँ करे कुछ और ।।

विद्रोही नैन हुए, सुनें नहीं इक बात ।
बिन पूछे पिय से लड़े, मिली जिया को मात ।।

बन कस्तूरी तन बसा , छूटे गात सुगंध ।
लाख छिपाया ना छिपा, प्रेम बना मकरंद ।।

नैनों से छलकी कभी, फूटी कभी बन बैन ।
प्रीत बनी पीड़ा कभी, कभी बन गई चैन ।।
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