Sunday, 11 October 2015

मोहन रूप ( कुण्डलिया)


अपनी छवि बना कर जो, दर्पण देखा आज|
देख रूप अपना खुद ही, गोरी करती नाज||
गोरी करती नाज, चली इठला कर रानी|
साजन से मनुहार, कराऊंगी मनमानी||
अपनी छवि को भूल, सजन को ताके सजनी|
मोहन रूप निहार, सखी सुधि खोई अपनी ||

सजना चतुर सुजान ( कुण्डलिया)


बात करे हर ले जिया, बन भोला अनजान |
कौन कहे उनकी सखी, सजना चतुर सुजान ||
सजना चतुर सुजान, करे पल-पल मनमानी|
नैन मिला ठग जाय, ठगी रह जाय सयानी ||
पल में हिय बिध जात, अचूक है उसकी घात|
मीठा-सा हो दर्द, याद कर पिया की बात ||

Monday, 7 September 2015

दो दोहे

 शातिर दो नैना बड़े, लड़ें मिलें दिन रैन|
नैनन के इस मेल में, जियरा खोवे चैन||





पाती अँसुवन से लिखी, बदरा पर दिन-रात|
पवन पीया तक ले गई, बरस सुनाई बात ||

प्यास थी मैं

प्यास थी मैं 
सहरा था तू
शुष्क, रसहीन, विरक्त, निर्मोही-सा 
न... नहीं भरमाया तूने मुझे 
मैं स्वयं को ही भरमाती रही
खुद को ही छलावे दिखलाती रही
दो बूँद पानी की आस मुझे
जाने कहाँ भटकाती रही
हाथ बढ़ा हर बार
छू लेना चाहा ... उस भ्रामक आद्रता को
जो नहीं थी
मेरे भाग्य और तुम्हारे स्वभाव में
ज़िन्दगी से दूर होते
और .. सूखती, चटकती, बिखरती रही
न तृप्त हो पाई कभी
क्योंकि
सहरा थे तुम
प्यास थी मैं
Shalini rastogi

Wednesday, 2 September 2015

ढलते ढलते एक आँसू, (ग़ज़ल)


ढलते ढलते एक आँसू, रुखसार पे यूँ जम गया 
बहते बहते वख्त का दरिया कहीं पे थम गया 

पल्कों पे आके ख्वाब इक यूँ ठिठक के रुक गया,
नींद में जैसे अचानक, मासूम बच्चा सहम गया 

नींद, चैन औ सुकूँ सब लूट कर वो ले गया 
लोग कहते सब्र कर कि जो गया वो कम गया 

वो जान थी जो छोड़कर चुपके से हमको थी गई 
बदगुमानी में लगा यूँ, सीने से जैसे ग़म गया ...

यूँ प्यार ने तेरे किया दुनिया से बेगाना हमें 
छोड़ दुनिया जोग में तेरे ये मनवा रम गया.

रीतापन (क्षणिकाएँ)


1.
कभी छोड़ देना ज़रा
अपनी तन्हाइयों को
मेरी खामोशियों के साथ
फिर देखना दोनों
कितनी बातें करते हैं

2.
अखर जाता है अक्सर 
भावों का न होना 
दुःख, पीड़ा, कसक, बेचैनी 
हाँ, करती तो है 
व्याकुल 
पर कुछ तो होता है
मन के भीतर
पर रीतापन अंतस का अक्सर
जाता है क्यों
अखर ...

नैन ( सवैया )

नैन लड़ें अरु नैन मिलें, कब रार करें कब मीत बनाएँ |

प्रीत सुधा बरसाय कभी, विष बान बनें हिय में बिध जाएँ|


ढीठ बने अड़ जावत तो भर लाज कभी नयना सकुचाएँ|


बैन बने हिय की बतियाँ, रह मौन सखी सगरी बतलाएँ

Shalini Rastogi


Wednesday, 3 June 2015

तल्खियाँ ( gazal)


हालात अक्सर ज़ुबानों पर, तल्खियाँ रख देते हैं,
रेशमी से अहसास पर ये, चिंगारियां रख देते हैं .
मुश्किल नहीं इस कदर यूँ तो, ये बयाँ जज़्बात का
ये लफ्ज़ आ बीच में क्यों, दुश्वारियाँ रख देते हैं.
मासूमियत छीन कर ज़ालिम, दाँव ये ज़माने के
भोले भाले से चेहरों पर, अय्यारियां रख देते हैं.
इक बार फिर जी लें जी भर, बचपन का वो भोलापना.
कुछ पल को इक ओर अपनी, हुशियारियाँ रख देते हैं.
दीवार क्यों ये अना की, आए हमारे बीच में,
कुछ भूल जाओ तुम, परे हम, खुद्दरियाँ रख देते हैं. 
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