Sunday, 15 September 2013

राजनीति ( कुण्डलिया छंद)



राजनीति में चल रहा, लाशों का है खेल |
धूर्त मिले हैं धूर्त से, गिद्धों का है मेल ||
गिद्धों का है मेल,  धर्म की आँच जलाएँ|
पाने सत्ता का लाभ, देश को हैं सुलगाएँ||
लालच का तूफान, फैली हर ओर अनीति |
लोभियों  की जमात, बनी है ये राजनीति ||

Wednesday, 11 September 2013

नारी ( कुण्डलिया छंद)


नारी धुरी समाज की, जीवन का आधार|
बिन नारी जीवन नाव, डूबे रे मंझधार ||
डूबे रे मंझधार, यह गुरु प्रथम बालक की |
संस्कार की दात्री, पोषक है आदर्श की ||
नारी का अपमान, पुरुष की गलती भारी|
मानवता का बीज, सींचे कोख में नारी ||

शब्द तेरे ...


हर शब्द तेरा 
मन ही मन मैं 
गुनती रही 
बार-बार दोहरा के उसे 
खुद ही सुनती रही 
मुँह में उसे घुमाती रही 
कुछ खट्टी मीठी गोली की तरह
घुल-सी गई मिठास 
अंतस में मेरे .....
तेरा कहा हर शब्द 
कभी  साकार बन 
तैरता रहा आँखों के आगे 
नदी की लहर पर 
डूबता- उतरता रहा 
कभी पंख-सा उड़ता रहा 
हवा के परों पर 
हर बार नया रूप धर 
सामने आ खड़ा हुआ 
भरमाने को मुझे 
........ हाँ ..... 
बस यही तो किया अब तक 
शब्दों ने तेरे 
कैसा मोहक जाल फैलाया 
भ्रमित कर मुझे 
बेतरह उलझाया 
तृषित चातक की प्यास बन
मरुस्थल में जल दिखला 
मृग सा मुझे अपने पीछे 
दौड़ाता ही रहा है 
हर शब्द तेरा  



Saturday, 7 September 2013

एक मुट्ठी आसमान

लो फिर 
समेट लिया मैंने 
अपना आसमान
अभी कल ही तो खोली थी 
अपनी मुट्ठी मैंने 
और फैला दिया था 
दूर-दूर तक 
ताने थे सुन्दर वितान 
कुछ ख्वाहिशों के रंग से 
रंग डाला था इन्द्रधनुष 
कुछ उम्मीदों की चमक से 
चमकाया सूरज का आतिशदान 
नन्हीं-नन्हीं हसरतों के सितारे टाँके 
झिलमिला उठा मेरा आकाश 
पर न क्यूँ तुम्हें 
न भाए ... 
ये रंग, ये चमक, ये झिलमिलाहट 
बुझा कर फिर हसरतों के दिए 
बेबसी की काली चादर ढाँप
जब्त कर ली सब रंगीनियाँ फिर 
फ़र्ज़ के अंधेरों में करके गर्त उन्हें फिर 
अपनी मुट्ठी में 
लो फिर 
समेट लिया मैंने अपना आसमान 

Sunday, 25 August 2013

स्नेह पाश


कस लो अपना स्नेह पाश
कब  मुक्ति की आकांक्षी मैं
है प्रिय मुझे 
ऐसा ये बंधन 
रोम- रोम बंध जाती मैं
निज मन पर रहा 
वश कहाँ मेरा 
परवश होकर 
भटके यह बस 
जिस ओर मैं चाहूँ 
जिस ओर मैं जाऊं 
तुम तक पहुँचाते
मेरे ये पग 
दिशा भ्रांत मैं 
विवश अनुगामी
स्वेच्छाचारी मन की बन 
फिर आ जाती पास तुम्हारे 
लो,फिर लो पाश ये कस 








कहाँ हर किसी की तरफ उसकी नज़र जाए है


कहाँ हर किसी की तरफ उसकी नज़र जाए है
एक नज़र देख ले किस्मत उसकी संवर जाए है
    
कुछ ऐसा नूर है उसमें, ऐसी अदा पायी है
जो भी देखे है नज़र, उसपे ठहर जाए है

पिघलते कांच-सा वो बह रहा रगों में मेरी
कभी दिल में तो कभी खूँ में उतर जाए है
     
जिन्दा कहाँ है हम जो तुझे जल्दी है पड़ी     
दो घड़ी रुक ऐ मौत, कि वो ठहर जाए है

अजीब शै है मुहब्बत नींद गई चैन गया
साँस जाने में बस अब, कोई कसर जाए है

है खौफज़दा खुद दहशत भी दहशतगर्दों से
सामने देख इन्हें मुड़ खुद ही कहर जाए है
    
तल्खियों ने किया दुश्वार मयकशी को मेरी
बूंद उतरे गले में तो लगे जैसे जहर जाए है

ऐशाइशें जुड़ीं हों भले दुनिया की घरों में
एक माँ न हो तो परिवार बिखर जाए है

नूर ऐ इलाही है रोशन ज़र्रे-ज़र्रे में जहाँ के
वो ही वो है बस जहाँ तक नज़र जाए है

महफ़िल ऐ शम्मा में ज़िक्र हो परवानों का
सबसे पहले मेरा ही, किया जिकर जाए है

अजब सी ताज़गी है कि तुझे सोच भी लूँ
चहरे से शिकन, जेहन से फिकर जाए है

मरने से पहले एक मुलाकात का वादा था
इन्तेज़ार उनको कब मेरे मरने की खबर आए है

आज शब उसने मिलने का पैगाम दिया है
आँखों ही आँखों में बीता हरेक पहर जाए है 

Saturday, 17 August 2013

विरहा ( सवैया- दुर्मिल)


विरहा  अगनी  तन  ताप  चढ़े, झुलसे  जियरा  हर सांस जले|

जल से जल जाय जिया जब री, हिय की अगनी कुछ और बले|

कजरा  ठहरे  छिन  नैन  नहीं, रहती  अश्रुधार  कपोल ढले|

दिन के चढ़ते इक आस बंधे, दिन बीतत है अरु आस टले ||

Saturday, 10 August 2013

परवाज़


1.
पिंजरे में कैद मगर सोज नहीं सुर से साज़ भरो,

गम अपने छिपाकर हँसी से अपने अंदाज़ भरो,

बड़ा फ़राक दिल है ये सैय्याद देखो इसकी अदा

 ,
पर कैँच करके परिंदों से कहे कि अब परवाज़ भरो.


2
.
मेरी आवारगी को अपनी चाहत का संग दे ज़रा
 
मुद्दतों कैद हसरतों को आज़ादी के पंख दे ज़रा

 
एक बार जो चढ़े रंग तो ता-उम्र न छूटे फिर

 
मेरी रूह को इश्क के रंग में बेपनाह रंग दे ज़रा


3.


पंख हैं न परवाज़ कोई

अंजाम है न आगाज़ कोई

आवारगी फकत एक मकसद

इस मन न सरताज कोई 

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