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Monday, 23 March 2026

संबंधों का सफ़र

  

समाप्ति की क़गार पर खड़े

बोझिल संबंधों के कदम,

छटपटाते बेचैन हो,

दहलीज पार करने को,

लुभा रहा जो आकर्षण,

बाहर की दुनिया का,

तो चेता रहे ,

रोक रहे बंधन रिश्तों के

समझाते बार-बार ..

उस ओर बेशक है खुला आसमान

परवाज़ को असीमित दिशाएँ

यह आज़ाद हवा के झोंके

जो खींचते बरबस

देते आमंत्रण

बाहें फैला बुलातीं

क्षितिज की फैली बाहें

पर

आतुर क़दमों को थाम

ज़रा करो तो विचार

धरती आसमाँ का यह आलिंगन

कितना सत्य, कितना है छद्म

सोचो यह आभासित मिलन

रच एक भ्रामक संसार

मृगतृष्णा का फैलाता जाल

जिसमें फँस

लाँघी जाती है जाने कितनी

अलंघ्य दह्लीजें

जिनके पार .... है बस भटकाव

अंतहीन अंतरिक्ष के

शून्य में , निर्वात में

और स्याह घुप्प अँधेरे में पसरे

अजनबी शोरगुल के ब्लैक होल में

गर्क़ हो जाते हैं

सारे संबंध ....

 

 

 

 

 

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