Sunday, 20 July 2014

चाहे न दो प्रत्युत्तर तुम,


चाहे न दो प्रत्युत्तर तुम, 
मन में मेरे संतोष यही,
विनती अपने आकुल हिय की, 
तुम तक मैंने पहुँचाई सही| 

कुछ पीड़ा कुछ संताप लिखे,
कुछ प्रीत भरे उदगार लिखे
हर अक्षर में जिसके मैं थी,
पाती तुम तक पहुँचाई वही|

संदेश नहीं, न संकेत कोई ,
न आस मिलन की लेश कोई ,
सुन एक पुकार आओगे तुम,
मन में प्रतिपल विशवास यही |

न, विरहन न कहना मुझको ,
हर ओर मेरे तुम ही तुम हो ,
हर क्षण तुम में मैं जीती हूँ
है मेरे लिए संजोग यही |

कविता अपनी साकार करूँ


निज सुख, निज पीड़ा से कैसे 
तुमको एकाकार करूँ 
उद्द्वेलित, आडोलित मन के 
संप्रेषित कैसे विचार करूँ 

मैं अपनी करुणा जीती हूँ,
उल्लास रहे तुम जी अपना |
मैं मानूँ ठोस धरातल है
तुम मानो जग निरा सपना |
सुख निद्रा से झंझोड़ तुम्हारे, क्यों सपने निराधार करूँ |

हैं साथ तुम्हारे वे पल-छिन,
जो मेरे जीवन में न आए |
मैंने भी अपनी स्मृति में,
निज दुःख,निज उल्लास छिपाए |
तुम्हारे ह्रदय के भावों का, कैसे मैं साक्षात्कार करूँ |

जो मेरी बातों में अपने से
कुछ पल तुमको मिल जाएँ
तुम चुन कर उनको रख लेना
जो बातें ह्रदय को छू जाएँ
कुछ पल जी कर मैं तुम में, कविता अपनी साकार करूँ

दोहे

1.

जोड़ी जुगल निहार मन, प्रेम रस सराबोर|
राधा सुन्दर मानिनी, कान्हा नवल किशोर||
२.
हरे बाँस की बांसुरी, नव नीलोत्पल गात|
रक्त कली से अधर द्वय,दरसत मन न अघात ||
आकुल हिय की व्याकुलता, दिखा रहे हैं नैन|
प्रियतम नहीं समीप जब, आवे कैसे चैन||

4.
मानव प्रभु से पाय के, मनुज देह अनमोल |
सजा सुकर्मों से इसे, सोने से मत तोल ||

5. 
ह्रदय अश्व की है अजब , तिर्यक सी ये चाल 
विचार वल्गा थाम के, साधो जी हर हाल ||

6.
मात पिता दोनों चले , सुबह छोड़ घर द्वार |
बालक नौकर के निकट, सीखे क्या संस्कार ||

7.
चिंतन मथनी से करें , मन का मंथन नित्य |
पावन  बनें विचार तब , निर्मल होवें कृत्य ||

8.
इज्ज़त पर हमला कहीं, कहीं कोख में वार |
मत आना तू लाडली, लोग यहाँ खूंखार ||

9.
बन कर शिक्षा रह गई, आज एक व्यापार |
ग्राहक बच्चे हैं बने, विद्यालय बाज़ार  || 

10.
इधर बरसते मेघ तो , उधर बरसते  नैन |
इस जल बुझती प्यास औ, उस जल जलता चैन || 

11.
सावन आते सज गई , झूलों से लो डाल|
पिया गए परदेस हैं, गोरी हाल बेहाल ||

12
कोयल कूके  बाग़ में, हिय में उठती हूक |
सुन संदेसा नैन का, बैन रहेंगे मूक ||

13. 
संस्कृति जड़ इंसान की, रखें इसे सर-माथ |
पौधा तब तक है बढ़े, जब तक जड़ दे साथ ||

14.
नाजुक-सी  है चीज़ ये , ग़र आ जाए  खोट |
जीभ तेज़ तलवार सी, करे मर्म पर चोट ||

15.
रखा गर्भ में माह नौ , दिए देह औ प्रान |
वो माँ घर में अब पड़ी, ज्यों टूटा सामान ||

16
संग निभाने हैं हमें , कर्त्तव्य व अधिकार |
हो स्वतंत्रता का तभी, स्वप्न  पूर्ण साकार ||

17
नारी धुरी समाज की, जीवन का आधार |

डूब जायगी सभ्यता, बिन नारी मझधार ||

18 
ऊपर बातें त्याग की, मन में इनके  खोट |
दुनिया को उपदेश दें , आप कमाएँ नोट ||

19.
नैनन अश्रु धार ढरै, हिय से उठती भाप|
दिन के ढलते आस ढले, रात चढ़े तन ताप||

20.
कर्म देख इंसान के , सोच रहा हैवान|
काहे को इंसानियत, खुद पे करे गुमान ||

21. 
कोसे अपनी कोख को , माता करे विलाप |
ऐसा जना कपूत क्यों, घोर किया है पाप ||

22.
अपनी संस्कृति सभ्यता, लोग रहे हैं छोड़ |
हर कोई है कर रहा , पश्चिम की ही होड़  ||
23
धरती माँ की कोख में, पनप रही थी आस |
अग्नि बन नभ से बरसा, इंद्रदेव का त्रास ||
24

व्याकुल हो इक बूँद को, ताके कभी आकास|
कभी बरसते मेह से, टूटे सारी आस ||

अंदाज़



अंदाज़ से चलते हो, अंदाज़ से रुकते हो
बड़े ही अंदाज़ से बात, अपनी ही पलट देते हो ,
अंदाज़ा नहीं तुम्हें कि इस कातिल अदा से
जान कितने दीवानों की लिए जाते हो

मिजाज़ उस शोख का है, बिल्कुल मौसम की तरह
अंदाजा ही नहीं लगता कि कब, अंदाज़ बदल लेता है.

अंदाज़-ए-बयाँ उस जान-ए गज़ल का है सबसे जुदा-सा
कि कहानी में उसकी हरेक, अपना फ़साना ढूँढ लेता है

आँखे हैं मानिंद-ए-आइना कि जिसमें
हर कोई नक्श अपना तलाश लेता है .

शोखी कहो, अदा कहो, नजाकत या कि अंदाज़
आँखों की डोर तो कभी, ज़ुल्फ़-ए-ख़म में बाँध लेता है.

बादल की तरह है, न जाने कब बरस जाए
महबूब मेरा आँखों में, सावन भरे बैठा  है .

Tuesday, 1 July 2014

भंवरे, परवाने, चकोर सब इश्क़-मारे आ गए ( ग़ज़ल )

भंवरे, परवाने, चकोर सब इश्क़-मारे आ गए,
दिलजले महफ़िल में तेरी, आज सारे आ गए.

शोर, सरगोशी, ठहाके, रक्स औ मै हर तरफ,
ज़िक्र जब तेरा छिड़ा हम, बिन पुकारे आ गए.

दीप, शम्मा, फूल, जुगनू से कसर बाक़ी रही,
तो तेरी महफ़िल सजाने चाँद-तारे आ गए.

फूल, मखमल मोतियों से राह उनकी सज गई,
अपनी राहों में फ़कत जलते शरारे आ गए .

तंज तानों औ सज़ा से साफ़ वो तो बच गया
जितने भी इलज़ाम थे सब सर हमारे आ गए .

शोखियाँ, अंदाज, चितवन से कहाँ वाकिफ़ थीं ये
आज आँखों को तेरी कितने इशारे आ गए .
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